Saturday, 16 September 2017

साहब भारत इसी तरह तो चलता है

साहब भारत इसी तरह तो चलता है


वैसे तो भारत में राहुल गाँधी जी के विचारों से बहुत कम लोग इत्तेफाक रखते हैं (यह बात 2014 के चुनावी नतीजों ने जाहिर कर दी थी)  लेकिन अमेरिका में बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में जब उन्होंने वंशवाद पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में  "भारत इसी तरह चलता है  " कहा, तो सत्तारूढ़ भाजपा और कुछ खास लोगों ने भले ही उनके इस कथन का विरोध किया हो लेकिन देश के आम आदमी को शायद इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा होगा। काबिले तारीफ बात यह है कि वंशवाद को स्वयं भारत के एक नामी राजनैतिक परिवार के व्यक्ति ने अन्तराष्ट्रीय मंच पर बड़ी साफगोई के साथ स्वीकार किया, क्या यह एक छोटी बात है?
यूँ तो हमारे देश में वंश या  'घरानों' का आस्तित्व शुरू से था लेकिन उसमें परिवारवाद से अधिक योग्यता को तरजीह दी जाती थी जैसे संगीत में ग्वालियर घराना,किराना घराना, खेलों में पटियाला घराना,होलकर घराना,रंजी घराना,अलवर घराना आदि लेकिन आज हमारा समाज इसका सबसे विकृत रूप देख रहा है।
अभी कुछ समय पहले उप्र के चुनावों में माननीय प्रधानमंत्री को भी अपनी पार्टी के नेताओं से अपील करनी पड़ी थी कि नेता अपने परिवार वालों के लिए टिकट न मांगें। लेकिन पूरे देश ने देखा कि उनकी इस अपील का उनकी अपनी ही पार्टी के नेताओं पर क्या असर हुआ। आखिर पूरे देश में ऐसा कौन सा राजनैतिक दल है जो अपनी पार्टी
के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले एक साधारण से कार्यकर्ता को टिकट देने का जोखिम उठाता है?
क्या यह सही नहीं है कि आज भी एक साधारण या निम्न परिवार के किसी भी नौजवान के लिए किसी भी क्षेत्र के सिंडीकेट को तोड़ कर सफलता प्राप्त करना  इस देश में आम बात नहीं है? क्योंकि अगर ये आम बात होती तो ऐसे ही किसी युवक या युवती की सफलता अखबारों की हेडलाडन क्यों बन जाती हैं कि एक फल बेचने वाले के बेटे या बेटी ने फलाँ मुकाम हासिल किया?
क्या वाकई में एक आम प्रतिभा के लिए और किसी 'प्रतिभा' की औलाद के लिए, हमारे समाज में समान अवसर मौजूद हैं?
क्या कपूर खानदान के
रणबीर कपूर और बिना गोडफादर के रणवीर सिंह या नवाजुद्दीन सिद्दीकी  जैसे किसी नोन फिल्मी बैकग्राउंड वाले लड़के या लड़की को फिल्मी दुनिया में समान अवसर प्राप्त हैं?
क्या अभिषेक बच्चन को भी अमिताभ बच्चन जितना संघर्ष अपनी पहली फिल्म के लिए करना पड़ा था?
भले ही कल भारत वो देश था जहाँ राजा भरत ने अपने नौ पुत्रों के होते हुए भी अपना उत्तराधिकारी अपनी प्रजा के एक सामान्य युवक भूमन्यू को बनाया क्योंकि उन्हें अपने बाद अपने देश और प्रजा की चिंता अपने वंश से अधिक थी। लेकिन आज का कटु सत्य तो यही है कि हमारे समाज में आज हर क्षेत्र में आपकी तरक्की आपकी प्रतिभा से नहीं आपकी पहचान से होती है। आपकी योग्यता और बड़ी बड़ी डिग्रीयाँ बड़े बड़े नामों से हार जाती हैं।
आगे बढ़ने के लिए  'बस नाम ही काफी है '
शेखस्पीयर ने बरसों पहले कहा था कि  "नाम में क्या रखा है" लेकिन सच्चाई यह है कि नाम अगर भारत देश में गाँधी हो, मध्यप्रदेश या राजिस्थान में सिंधिया हो, पंजाब में बादल हो,यूपी और बिहार में यादव हो,महाराष्ट्र में ठाकरे हो,कश्मीर में अब्दुल्ला या मुफ्ती मुहम्मद हो,हरियाणा में चौटाला हो ( लिस्ट बहुत लम्बी है) तो इंसान के नसीब ही बदल जाते हैं।
नाम की बात जीवित इंसानों तक ही सीमित हो ऐसा भी नहीं है। अभी हाल ही में अन्नाद्रमुक ने अपनी ताजा बैठक में दिवंगत जयललिता को पार्टी का स्थायी महासचिव बनाने की घोषणा की। यानी कि वे मृत्यु के उपरांत भी पार्टी का नेतृत्व करेंगी  !
संभवतः दुनिया में मरणोपरांत भी किसी पार्टी का नेतृत्व करने की इस प्रकार की पहली घटना का साक्षी बनने वाला भारत पहला देश है और जयललिता पहली नेत्री।
कदाचित यह वंशवाद केवल राजनीति में ही हो ऐसा भी नहीं है। कला संगीत सिनेमा खेल न्यायपालिका व्यापार डाक्टरों हर जगह इसका आस्तित्व है।
सिनेमा में व्याप्त वंशवाद के विषय में कंगना बोल ही चुकी हैं।
देश में चलने वाले सभी प्राइवेट अस्पतालों को चलाने वाले डाक्टरों के बच्चे आगे चलकर डाक्टर ही बनते हैं।क्या आज डाक्टरी सेवा कार्य से अधिक एक पारिवारिक पेशा नहीं बन गया है? क्या इन अस्पतालों को चलाने वाले डाक्टर अस्पताल की विरासत अपने यहाँ काम करने वाले किसी काबिल डाक्टर को देते हैं ? जी नहीं वो काबिल डाक्टरों को अपने अस्पताल में नौकरी पर रखते हैं और अपनी नाकाबिल संतानों को डाक्टर की डिग्री व्यापम से दिलवा देते हैं।
आज जितने भी प्राइवेट स्कूल हैं वो शिक्षा देने के माध्यम से अधिक क्या एक
खानदानी  पेशा नहीं बन गए हैं? इनकी विरासत मालिक द्वारा क्या अपने स्कूल के सबसे योग्य टीचर को दी जाती है या फिर अपनी औलाद को?
क्या न्यायपालिका में कोलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति परिवारवाद और भाई भतीजावाद के आधार पर नहीं होती?
और जब वंशवाद और परिवारवाद के इस तिलिस्म को तोड़ कर एक साधारण से परिवार का व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का जज बनता है या फिर कोई अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बनता है या
कोई चाय बेचने वाला  प्रधानमंत्री बनता है या  फिर स्मृति ईरानी मानव संसाधन मंत्री बनी थीं या फिर निर्मला सीतारमन रक्षा मंत्री बनती हैं तो वो हमारे न्यूज़ चैनलों की  "ब्रेकिंग न्यूज़"  बन जाती है, यही सच्चाई है।
डॉ नीलम महेंद्र

Tuesday, 12 September 2017

देश में न्याय की उम्मीद जगाते हाल के फैसले

देश में न्याय की उम्मीद जगाते हाल के फैसले


अभी हाल ही में भारत में कोर्ट द्वारा जिस प्रकार से फैसले दिए जा रहे हैं वो देश में निश्चित ही एक सकारात्मक बदलाव का संकेत दे रहे हैं।
24
साल पुराने मुम्बई बम धमाकों के लिए अबु सलेम को आजीवन कारावास का फैसला हो या 16 महीने के भीतर ही बिहार के हाई प्रोफाइल गया रोडरेज केस में आरोपियों को दिया गया उम्र कैद का फैसला हो , देश भर में लाखों अनुनाईयों और राजनैतिक संरक्षण प्राप्त डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम का केस हो या फिर देश के अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े तीन तलाक का मुकदमा हो।
इन सभी में कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों ने देश के लोगों के मन में न्याय की धुंधली होती तस्वीर के ऊपर चढ़ती धुंध को कुछ कम करने का काम किया है।
देश के जिस आम आदमी के मन में अबतक यह धारणा बनती जा रही थी कि कोर्ट कचहरी से न्याय की आस में जूते चप्पल घिसते हुए पूरी जिंदगी निकाल कर अपनी भावी पीढ़ी को भी इसी गर्त में डालने से अच्छा है कि कोर्ट के बाहर ही कुछ ले दे कर समझौता कर लिया जाए।
वो आम आदमी जो लड़ने से पहले ही अपनी हार स्वीकार करने के लिए मजबूर था आज एक बार फिर से अपने हक और न्याय की आस लगाने लगा है।
जिस प्रकार आज उसके पास उम्मीद रखने के लिए कोर्ट के हाल के फैसले हैं इसी प्रकार कल उसके पास उम्मीद खोने के भी ठोस कारण थे।
उसने न्याय को बिकते और पैसे वालों को कानून का मजाक उड़ाते देखा था।
उसने एक अभिनेता को अपनी गाड़ी से कई लोगों को कुचलने के बाद और हिरण का शिकार करने के बावजूद उसे कोर्ट से बाइज्जत बरी होते देखा था।
उसने दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड में 18 साल बाद आए फैसले में आरोपियों को सज़ा देने के बजाए दिल्ली सरकार को मुआवजा देकर छोड़ने का फैसला  देखा था।
उसने भोपाल गैस त्रासदी में लाखों लोगों के प्रभावित होने और 3787 लोगों के मारे जाने के बावजूद ( हालांकि अनाधिकृत संख्या 16000 के ऊपर है) उस पर आने वाला बेमतलब का फैसला देखा था।
उसने जेसिका लाल की हत्या के हाई प्रोफाइल आरोपीयों को पहले कोर्ट से बरी होते लेकन फिर मीडिया और जनता के दबाव के बाद उन्हें दोषी मानते हुए अपना ही फैसला पलट कर दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाते देखा था।
उसने न्यायालयों में मुकदमों के फैसले आते तो बहुत देखे थे लेकिन न्याय होता अब देख रहा है।
उसने इस देश में एक आम आदमी को न्याय के लिए संघर्ष करते देखा है।
उसने इस देश की न्यायिक प्रणाली की दुर्दशा पर खुद चीफ जस्टिस को  रोते हुए देखा है।
जिस कानून से वह न्याय की उम्मीद लगाता है उसी कानून के सहारे उसने अपराधियों को बच के निकलते हुए देखा है।
दरअसल हमारे देश में कानूनों की कमी नहीं है लेकिन उनका पालन करने और करवाने वालों की कमी जरूर है।
कल तक हम कानून से खेलने वाला एक ऐसा समाज बनते जा रहे थे जहाँ पीड़ित का संघर्ष पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाने के साथ ही शुरू हो जाता था।
राम रहीम से पीड़ित साधवी का उदाहरण हमारे सामने है।उन्हें अपनी पहचान छिपाते हुए देश के सर्वोच्च व्यक्ति माननीय प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी पीड़ा बयान करनी पड़ी थी फिर भी न्याय मिलने में 15 साल और भाई का जीवन लग गया।
यह वो देश है जहाँ बलात्कार की पीड़ित एक  अबोध बच्ची को कानूनी दाँवपेंचों का शिकार हो कर 10 वर्ष की आयु में एक बालिका को जन्म देना पड़ता है।
जहाँ साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को सुबूतों के अभाव के बावजूद सालों जेल में रहना पड़ता है ।
जान मार्शल जो कि अमेरिका के चौथे चीफ जस्टिस थे,उनका कहना था कि ' न्याय व्यवस्था की शक्ति प्रकरणों का निपटारा करने,फैसला देने या किसी दोषी को सजा सुनाने में नहीं है,यह तो आम आदमी का भरोसा और विश्वास जीतने में निहित है।'
जबकि भारत में इसके विपरीत मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति किरुबकरन को एक अवमानना  मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय न्याय व्यवस्था के विषय में कहना पड़ा कि देश की जनता पहले ही न्यायपालिका से कुण्ठित है अतः पीड़ित लोगों में से मात्र 10% अर्थात अतिपीड़ित ही न्यायालय तक पहुँचते हैं।
बात केवल अदालतों से न्याय नहीं मिल पाने तक सीमित नहीं थी, बात न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाले समय की भी है लेकिन यह एक अलग विषय है जिस पर चर्चा फिर कभी।
जब कोर्ट में न्याय के बजाय तारीखें मिलती हैं तो सिर्फ उम्मीद नहीं टूटती हिम्मत टूटती है, सिर्फ पीड़ित व्यक्ति नहीं हारता उसका परिवार नहीं हारता लेकिन यह हार होती है उस न्याय व्यवस्था की जो अपने देश के हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की भी रक्षा नहीं कर पाती।
कहते हैं कानून अँधा होता है लेकिन  हमारे देश में तो पिछले कुछ समय से वो अंधा ही नहीं बहरा भी होता जा रहा था। उसे न्याय से महरूम हुए लोगों की चीखें भी सुनाई नहीं दे रही थीं।
किन्तु  आज फिर से इस देश के जनमानस को इस देश की कानून व्यवस्था पर भरोसा होने लगा है कि न्याय की देवी की आँखों पर जो  पट्टी अबतक  इसलिए  बंधी थी  कि वह सबकुछ देख कर अनदेखा कर देती थी  लेकिन अब  इसलिए बंधी होगी कि उसके सामने कौन खड़ा है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होगा और उनकी नज़र में सब बराबर हैं यह   केवल एक जुमला नहीं यथार्थ होगा।
डॉ नीलम महेंद्र

Monday, 4 September 2017

35A जैसे दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए

35A जैसे दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए


भारत का हर नागरिक गर्व से कहता कि कश्मीर हमारा है लेकिन फिर ऐसी क्या बात है कि आज तक हम कश्मीर के नहीं हैं?
भारत सरकार कश्मीर को सुरक्षा सहायता संरक्षण और विशेष अधिकार तक  देती है लेकिन  फिर भी भारत के नागरिक के कश्मीर में कोई मौलिक अधिकार भी नहीं है?
आज पूरे देश में 35A पर जब बात हो रही हो और मामला कोर्ट में विचाराधीन हो तो कुछ बातें देश के आम आदमी के जहन में अतीत के साए से निकल कर आने लगती हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के यह शब्द भी याद आते हैं कि,
" कश्मीरियत जम्हूरियत और इंसानियत से ही कश्मीर समस्या का हल निकलेगा " ।
किन्तु बेहद निराशाजनक तथ्य यह है कि यह तीनों ही चीजें आज कश्मीर में कहीं दिखाई नहीं देती।
कश्मीरियत, आज आतंकित और लहूलुहान है।
इंसानियत की कब्र आतंकवाद बहुत पहले ही खोद चुका है
और जम्हूरियत पर अलगवादियों का कब्जा है।
और मूल प्रश्न यह है कि जम्मू कश्मीर राज्य को आज तक विशेष दर्जा प्रदान करने वाली  धारा 370 और 35A लागू होने के बावजूद कश्मीर
आज तक  'समस्या' क्यों है? कहीं समस्या का मूल ये ही तो नहीं हैं?
जब भी देश में इन धाराओं पर कोई भी बात होती है तो फारूख़ अब्दुल्लाह हों या महबूबा मुफ्ती कश्मीर के हर स्थानीय नेता का रुख़ आक्रामक और भाषण भड़काऊ क्यों हो जाते हैं?

आज सोशल मीडिया के इस दौर में धारा 370 और  37A 'क्या है' यह तो अब तक सभी जान चुके हैं लेकिन यह 'क्यों हैं ' इसका उत्तर अभी भी अपेक्षित है।
धारा  370 जो कि भारतीय संविधान के 21 वें भाग में समाविष्ट है और जिसके शीर्षक शब्द हैं  "जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध है अस्थायी प्रावधान" ,
वो 370 जो खुद एक अस्थायी प्रावधान है,उसकी  आड़ में 14 मई 1954 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अनुशंसा पर तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा 35A को 'संविधान के परिशिष्ट दो ' में स्थापित किया गया था।
2002 में अनुच्छेद 21 में संशोधन करके 21A को उसके बाद जोड़ा गया था तो अनुच्छेद 35A को अनुच्छेद 35 के बाद क्यों नहीं जोड़ा गया उसे परिशिष्ट में स्थान क्यों दिया गया?
जबकि संविधान में अनुच्छेद 35 के बाद 35a भी है लेकिन उसका जम्मू कश्मीर से कोई लेना देना नहीं है।
इसके अलावा जानकारों के अनुसार जिस प्रक्रिया द्वारा 35 A को संविधान में समाविष्ट किया गया वह प्रक्रिया ही अलोकतांत्रिक है एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का भी उल्लंघन है जिसमें निर्धारित प्रक्रिया के बिना संविधान में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
एक तथ्य यह भी कि जब भारत में विधि के शासन का प्रथम सिद्धांत है कि  'विधि के समक्ष' प्रत्येक व्यक्ति समान है और प्रत्येक व्यक्ति को  'विधि का समान ' संरक्षण प्राप्त होगा तो क्या देश के एक राज्य के  "कुछ" नागरिकों को विशेषाधिकार देना क्या शेष नागरिकों के साथ अन्याय नहीं है?
यहाँ  "कुछ" नागरिकों का ही उल्लेख किया गया है क्योंकि 35 A राज्य सरकार को यह अधिकार देती है कि वह अपने राज्य के  'स्थायी नागरिकों ' की परिभाषा तय करे।  इसके अनुसार  जो व्यक्ति 14 मई 1954 को राज्य की प्रजा था या 10 वर्षों से राज्य में रह रहा है वो ही राज्य का स्थायी नागरिक है।
इसका दंश झेल रहे हैं गोरखा समुदाय के लोग।
इसका दंश झेल रहे हैं वो परिवार जो 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से भारत में आए थे।
जहाँ देश के बाकी हिस्सों में बसने वाले ऐसे परिवार आज भारत के नागरिक हैं वहीं जम्मू कश्मीर में बसने वाले ऐसे परिवार आज 70 साल बाद भी शरणार्थी हैं।
इसका दंश झेल रहे हैं 1970 में प्रदेश सरकार द्वारा सफाई के लिए  विशेष आग्रह पर पंजाब से बुलाए जाने वाले वो सैकड़ों दलित परिवार जिनकी संख्या आज दो पीढ़ियाँ बीत जाने के बाद हजारों में हो गई है लेकिन ये आज तक न तो जम्मू कश्मीर के स्थाई नागरिक बन पाए हैं और न ही इन लोगों को सफाई कर्मचारी के आलावा कोई और काम राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है।
जहाँ एक तरफ जम्मू कश्मीर के नागरिक विशेषाधिकार का लाभ उठाते हैं इन परिवारों को उनके मौलिक अधिकार भी नसीब नहीं हैं।
जहाँ पूरे देश में दलित अधिकारों को लेकर तथाकथित मानवाधिकारों एवं दलित अधिकार कार्यकर्ता बेहद जागरूक हैं और मुस्तैदी से काम करते हैं वहाँ कश्मीर में दलितों के साथ होने वाले इस अन्याय पर सालों से मौन क्यों हैं?
ये परिवार जो सालों से राज्य को अपनी सेवाएं दे रहे हैं विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डाल सकते, इनके बच्चे व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं ले सकते।
क्या यही कश्मीरियत है?
क्या यही जम्हूरियत है?
क्या यही इंसानियत है?
वक्त आ गया है इस बात को समझ लेने का कि संविधान का ही उपयोग संविधान के खिलाफ करने की यह कुछ लोगों के स्वार्थों को साधने वाली पूर्व एवं सुनियोजित राजनीति है ।
क्योंकि अगर इस अनुच्छेद को हटाया जाता है तो इसका सीधा असर राज्य की जनसंख्या पर पड़ेगा और चुनाव में उन लोगों को वोट देने का अधिकार  मिलने से जिनका मत अभी तक कोई मायने नहीं रखता था निश्चित ही इनकी राजनैतिक दुकानें बन्द कर देगा।
आखिर ऐसा क्यों है कि जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा होते हुए भी एक कश्मीरी लड़की अगर किसी गैर कश्मीरी लेकिन भारतीय लड़के से शादी करती है तो वह अपनी जम्मू कश्मीर राज्य की नागरिकता खो देती है लेकिन अगर कोई लड़की किसी गैर कश्मीरी लेकिन पाकिस्तानी लड़के से निकाह करती है तो उस लड़के को कश्मीरी नागरिकता मिल जाती है।
समय आ गया है कि इस प्रकार के कानून किसके हक में हैं इस विषय पर खुली एवं व्यापक बहस हो।
कश्मीर के स्थानीय नेता जो इस मुद्दे पर भारत सरकार को कश्मीर में विद्रोह एवं हिंसा की बात करके आज तक विषय वस्तु का रुख़ बदलते आए हैं बेहतर होगा कि आज इस विषय पर ठोस तर्क प्रस्तुत करें कि इन दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए ?
इतने सालों में इन कानूनों की मदद से आपने कश्मीरी आवाम की क्या तरक्की की?
क्यों आज कश्मीर के हालात इतने दयनीय है कि यहाँ के नौजवान को कोई भी 500 में पत्थर फेंकने के लिए खरीद पाता है?
देश आज जानना चाहता है कि इन विशेषाधिकारों का आपने उपयोग किया या दुरुपयोग?
क्योंकि अगर उपयोग किया होता तो आज कश्मीर खुशहाल होता
खेत खून से नहीं केसर से लाल होते
डल झील में लहू नहीं शिकारा बहती दिखतीं
युवा एके 47 नहीं विन्डोज़ 7 चला रहे होते
और चारु वलि खन्ना जैसी बेटियाँ आजादी के 70 साल बाद भी अपने अधिकारों के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए विवश नहीं होतीं।
डॉ नीलम महेंद्र

Monday, 28 August 2017

जनता तो भगवान बनाती है साहब लेकिन शैतान आप

जनता तो भगवान बनाती है साहब लेकिन शैतान आप  
         
13 मई 2002 को एक हताश और मजबूर लड़की, डरी सहमी सी देश के प्रधानमंत्री को एक गुमनाम ख़त लिखती है। आखिर देश का आम आदमी उन्हीं की तरफ तो आस से देखता है जब वह हर जगह से हार जाता है।
निसंदेह इस पत्र की जानकारी उनके कार्यालय में तैनात तमाम वरिष्ठ नौकरशाहों को भी निश्चित ही होगी।
साध्वी ने इस खत की कापी पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों और प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को भी भेजी थी।
खैर मामले का संज्ञान लिया पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने जिसने 24 सितंबर 2002 को इस खत की सच्चाई जानने के लिए सीबीआई को डेरा सच्चा सौदा की जांच के आदेश दिए।
जांच 15 साल चली, चिठ्ठी में लगे तमाम इलजामात सही पाए गए और राम रहीम को दोषी करार दिया गया। इसमें जांच करने वाले अधिकारी और फैसला सुनाने वाले जज बधाई के पात्र हैं जिन्होंने दबावों को नजरअंदाज करते हुए सत्य का साथ दिया।
देश भर में आज राम रहीम और उसके भक्तों पर बात हो रही है लेकिन हमारी उस व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा जिसमें राम रहीम जैसों का ये कद बन जाता है कि सरकार भी उनके आगे घुटने टेकने के लिए मजबूर हो जाती है।
उस हिम्मत की बात क्यों नहीं हो रही जब ऐसे व्यक्ति से विद्रोह करने का बीड़ा एक अबला जुटाती हैउसके द्वारा उठाए गए जोखिम की बात क्यों नहीं होती?
उस व्यवस्था के दोष की बात क्यों नहीं होती जिसमें एक  बेबस लड़की द्वारा लिखा गया एक पत्र जिसमें उन तमाम यातनाओं का खुलासा होता है जो उस जैसी अनेक साध्वियाँ भुगतने के लिए मजबूर हैं देश के बड़े से बड़े अधिकारियों के पास जाता तो है लेकिन उस पर कार्यवाही नहीं होती।
उस भावनाशून्य सिस्टम पर बात क्यों नहीं होती जिसमें  कोई भी इस पत्र में बयान की गई पीड़ा को  महसूस नहीं कर पाता है?

क्योंकि अगर इनमें से कोई भी जरा भी विचलित होता तो क्या यह राम रहीम को उसी समय सलाखों के पीछे डालने के लिए एक ठोस सबूत नहीं था?
हम उस सिस्टम को दोष क्यों नहीं देते जिसमें यही आरोप अगर किसी आम आदमी पर लगा होता तो वह न जाने किन किन धाराओं के आधार पर आधे घंटे के भीतर ही जेल में डाल दिया गया होता?
हम उस समाज में जी रहे हैं जिसमें जब 24 अक्तूबर 2002 को सिरसा से निकलने वाले एक सांध्य दैनिक  "पूरा सच" अपने अखबार में इस खत को छापता है तो उसी दिन उस पत्रकार को उसके घर के बाहर गोलियों से भून दिया जाता है और कहीं कोई आवाज नहीं उठाई जाती।
हम उस दौर से गुजर रहे हैं जिसमें इस खत की प्रतिलिपि इस मामूली अखबार के अलावा उन मीडिया घरानों के पास भी थी जिन्होंने न सिर्फ इस खत को अनदेखा किया बल्कि अपने साथी पत्रकार की हत्या पर भी तब मौन रहे लेकिन आज बाबा का चिठ्ठा खोल रहे हैं।
क्या यह हमारी न्याय व्यवस्था का मजाक नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री को पत्र लिखे जाने के पन्द्रह साल बाद तक एक आदमी कानून की खिल्ली उड़ाता रहा,सबूतों के साथ खिलवाड़ करता रहा और गवाहों की हत्या करवाता गया?
सुनवाई के दौरान न्याय मांगने वाली साधवी सिरसा से 250 किमी का सफर तय करके पंचकुला कोर्ट पहुँचती थीं और गुरमीत सिंह वीडियो कांफ्रेन्सिंग के जरिए सिरसा से ही गवाही देता था? इसके बावजूद वह आधी से अधिक गवाहियों में पेश नहीं हुआ और जब आया तो ऐसे काफिले के साथ कि जैसे हिन्दुस्तान में कोई क़ानून व्यवस्था नहीं है और देश में उसी का राज है?

प्रशासन मौन साधे खड़ा था और हम जनता को अंधभक्त कह रहे हैं?
आखिर 15 साल तक हमारा प्रशासन क्या देखता रहा या फिर देखकर भी आँखें क्यों मूंदता रहा?
इस पर भी जनता अंधभक्त है?
हुजूर जनता बेचारी क्या करे जब प्रधानमंत्री को लिखा उसका पत्र भी उसे न्याय दिलाने में उससे उसके भाई की जान और उसके जीवन के 15 साल मांग लेता है?
जनता बेचारी क्या करे जब उसके द्वारा चुनी गई सरकार के राज में उसे भूखे पेट सोना पड़ता है लेकिन ऐसे बाबाओं के आश्रम उन्हें भरपेट भोजन और नौकरी दोनों देते हैं।
जनता बेचारी क्या करे जब वह आपके बनाए समाज में अपने से ऊँचे पद प्रतिष्ठा और जाती वालों से अपमानित होते हैं लेकिन इन बाबाओं के आश्रम में उन सबको अपने बराबर पाते हैं,
जनता बेचारी क्या करे जब वह बड़े से बड़े नेता को इनके दरबार में माथा टेकते देखती है?
साहब, जनता को तो आपने ही अपनी आँखें मूँद कर अँधा बना दिया!
जनता को इन बाबाओं की हकीकत समझाने से पहले अपने समाज की हकीकत तो समझें कि  जनता तो इन्हें केवल भगवान ही बनाती है लेकिन हमारा सिस्टम तो इन्हें शैतान बना देता है! यह बाबा अपने अनुयायियों की संख्या बनाते हैं,इस संख्या को चुनावों में हमारे नेता वोट बैंक बनाते हैं,
चुनाव जीत कर सरकार भले ही ये नेता बनाते हैं पर इस सरकार को यह बाबा चलाते हैं।
जनता की अंधभक्ती को देखने से पहले उसकी उस हताशा को महसूस कीजिए जो वह अपने नेताओं के आचरण में देखती है उसकी बेबसी को महसूस कीजिए जो वह पैसे वालों की ताकत के आगे हारते हुए महसूस करते हैं उस दर्द को समझिये जो ताकतवर लोग अपनी ताकत के बल पर उन्हें अक्सर देते रहते हैं उस असहायपन का अंदाजा लगाइए जब वे रोज अपनी आँखों के सामने कानून को चेहरों और रुतबे के साथ बदलते देखते हैं।
सोचिए कि क्यों आम लोगों का राजनीति कानून और इंसाफ से विश्वास उठ गया?
सोचिए कि क्यों इस मुकदमे में सजा सुनाने के बाद जज को सुरक्षा के मद्देनजर किसी गुमनाम जगह पर ले जाया गया?
क्या इस सब के लिए जनता दोषी हैं या फिर वो नेता जो इन बाबाओं की अनुयायी जनता को वोट बैंक से अधिक कुछ नहीं समझती तब भी जब वो इन बाबाओं के आश्रम में होती है और तब भी जब बाबा जेल में होते हैं और जनता सड़कों पर होती है।
काश कि हमारे नेता जनता के  वोट बैंक  को खरीदने के बजाये जनता के वोट कमाने की दिशा में कदम उठाना शुरू करे और धरातल पर ठोस काम करें जिस दिन हमारे देश की जनता को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करना पडेगा जिस दिन ‘देश के संविधान में सब बराबर हैं’ यह केवल क़ानून की किताबों में लिखा एक वाक्य  नहीं यथार्थ होगा उस दिन ऐसे सभी बाबाओं की दुकानें खुदबखुद बंद हो जायेंगी जनता को इन बाबाओं में नहीं हमारी सरकार और हमारे सिस्टम में भगवान दिखने लगेगा   

वो सुबह कभी तो आयेगी
डॉ नीलम महेंद्र

Sunday, 27 August 2017

अपने बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर से पहले इंसान बनाएं

अपने बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर से पहले इंसान बनाएं

आज पूरी दुनिया ने बहुत तरक्की कर ली है सभी प्रकार के सुख सुविधाओं के साधन हैं लेकिन दुख के साथ यह कहना पड़ रहा  है कि भले ही विज्ञान के सहारे आज सभ्यता अपनी चरम पर है लेकिन मानवता अपने सबसे बुरे समय  से गुजर रही है।
भौतिक सुविधाओं धन दौलत को हासिल करने की दौड़ में हमारे संस्कार कहीं दूर पीछे छूटते जा रहे हैं।
आज हम अपने बच्चों को डाक्टर इंजीनियर सीए आदि कुछ भी बनाने के लिए मोटी फीस देकर बड़े बड़े संस्थानों में दाखिला करवाते हैं और हमारे बच्चे डाक्टर इंजीनियर आदि तो बन जाते हैं लेकिन एक नैतिक मूल्यों एवं मानवीयता से युक्त इंसान नहीं बन पाते।
हमने अपने बच्चों को गणित की शिक्षा दी, विज्ञान का ज्ञान दिया, अंग्रेजी आदि भाषाओं का ज्ञान दिया  , लेकिन व्यक्तित्व एवं नैतिकता का पाठ पढ़ाना भूल गए।
हमने उनके चरित्र निर्माण के पहलू को नजरअंदाज कर दिया।
एक व्यक्ति के व्यक्तित्व में चरित्र की क्या भूमिका होती है इसका महत्व भूल गए।
आज के समाज में झूठ बोलना,दूसरों की भावनाओं का ख्याल नहीं रखना,अपने स्वार्थों को ऊपर रखना, कुछ ले दे कर अपने काम निकलवा लेना,आगे बढ़ने  के लिए 'कुछ भी करेगा ' ये सारी बातें आज अवगुण नहीं  "गुण" माने जाते हैं।
दरअसल हमारा समाज आज जिस  दौर से गुजर रहा है ,वहां  नैतिक मूल्यों की नईं  नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं।
एक समय था जब हमें यह सिखाया जाता था कि झूठ बोलना गलत बात है लेकिन आज ऐसा नहीं है। बहुत ही सलीके से कहा जाता है कि जिस सच से हमारा  नुकसान हो उससे तो झूठ बेहतर है
और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सफेद झूठ बोलने से भी परहेज़ नहीं किया जाता।
रिश्ता चाहे प्रोफेशनल हो या पर्सनल,झूठ आज सबसे बड़ा सहारा है।
एक और बदलाव जो हमारे नैतिक मूल्यों में आया है,वो यह है कि हमें यह सिखाया जाता है कि हमेशा दिमाग से सोचना चाहिए दिल से नहीं।
यानी किसी भी विषय पर या रिश्ते पर विचार करने की आवश्यकता पड़े, तो दिमाग से काम लो दिल से नहीं।

कुल मिलाकर हमारे विचारों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और जो दिल से सोचते हैं आज की दुनिया में उन्हें 'एमोशनल फूलस' कहा जाता हैं।
तो जो रिश्ते पहले दिलों से निभाए जाते थे आज दिमाग से चलते हैं।
हमारे आज के समाज के नैतिक मूल्य कितने बदल गए हैं, इस बात का एहसास तब होता है जब आज के समाज में व्यक्ति को उसके चरित्र से नहीं उसके पद और प्रतिष्ठा से आंका जाता है।
आज धनवान व्यक्ति पूजा जाता है और यह नहीं देखा जाता कि वो धन कैसे और कहाँ से आ रहा है।
ऐसे माहौल में मेहनत से धन कमाने वाला अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस करता है।
समाज के इस रुख को देखते हुए पहले जो युवा अपनी प्रतिभा और योग्यता के दम पर आगे बढ़ने में गर्व महसूस करते थे आज आगे बढ़ने के लिए अनैतिक रास्तों का सहारा लेने से भी नहीं हिचकिचाते।
ऐसी अनेक बातें हैं जो पहले व्यक्ति के चरित्र को और कालांतर में हमारे समाज की नींव को कमजोर कर रही हैं।
जब समाज में नैतिक मूल्यों को ही बदल दिया जाए,
उन्हें नए शब्दों की चादर ओड़ा दी जाए,
एक नई पहचान ही दे दी जाए,
तो समस्या गंभीर हो जाती है।
किसी ने कहा था कि,
यदि धन का नाश हो जाता है तो उसे फिर से पाया जा सकता है,
यदि स्वास्थ्य खराब हो जाता है, तो उसे भी फिर से हासिल किया जा सकता है
लेकिन यदि चरित्र का पतन हो जाता है तो मनुष्य  का ही पतन हो जाता है।
लेकिन आज हम देखते हैं कि लोग चरित्र भी पैसे से खरीदते हैं। "ब्रांड एंड इमेज बिल्डिंग" आज धन के सहारे होती है।
ऐसे में हम एक नए भारत का निर्माण कैसे करेंगे?
वो 'सपनों का भारत' यथार्थ में कैसे बदलेगा?
जिस युवा पीढ़ी पर भारत निर्माण का दायित्व है उसके नैतिक मूल्य तो कुछ और ही बन गए हैं?
अगर हम वाकई में एक नए भारत का निर्माण करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने पुराने नैतिक मूल्यों की ओर लौटना होगा।
जो आदर्श और जो संस्कार हमारी संस्कृति की पहचान हैं उन्हें अपने आचरण में उतारना होगा।
अपनी उस सनातन सभ्यता को अपनाना होगा जिसमें  "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक विचार नहीं है,एक जीवन पद्धति है,
उस परम्परा का अनुसरण करना होगा जहाँ हम यह प्रार्थना करते हैं,
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

डॉ नीलम महेंद्र