Wednesday, 30 March 2016

आज के सामाजिक परिवेश में यह वाकई में चिंतनीय विषय है कि valentine day पर युवा वर्ग एक अलग ही दुनिया में खो जाना चाहता है और हिन्दू वादी संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ता है।
यह वर्ग विशेष या संगठन या पीढ़ियों की लड़ाई नहीं यह विचारों की लड़ाई है।
दो पीढ़ियों के बीच विचारों में मतभेद आरंभ से ही चले आ रहे हैं, हम अपने ऊपर भी देखें तो पायेंगे कि जब हम बच्चे थे, तो किन्हीं किन्हीं विषयों पर माता पिता से मतभेद होते थे और आज जब हम माता पिता बन गए तो हमारे बच्चों के हमसे होते हैं -इसी को generation gap कहते हैं किन्तु एक सबसे बड़ा अंतर जो तब के बच्चों और आज के बच्चों में है वो यह कि उस जमाने के बच्चे मतभेदों को मनभेदों में बदलने नहीं देते थे उनके संस्कार जो उन्हें विरासत में मिलते थे वो उन्हें विद्रोह करने से रोक लेते थे इसी को शायद बड़ों का लिहाज भी कह सकते हैं।पर यह लिहाज़ बोलने से या भाषण देने से बच्चों में पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित नहीं होता क्योंकि यह अनुवांशिक गुण नहीं है,यह तो व्यवहार में लाने से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता है क्यूंकि यह एक व्यवहारिक गुण है।आज की पीढ़ी में हम संस्कार डाल नहीं पाए और लिहाज उन्हें सिखा नहीं पाए।
देखा जाए तो इसमें दोष हमारे बच्चों का नहीं है, बच्चे तो कच्ची मिट्टी होते हैं उन्हें जिस परिवेश में बड़ा किया जाता है वे वैसे ही विचारों वाले युवक युवती बनेंगे।
हम में से कुछ आज चेते हैं जब तक काफी देर हो चुकी है और दुख की बात यह है कि कुछ तो अभी भी नहीं चेते।
हम लोगो ने परिवार और समाज के महत्व को स्वयं ही खत्म कर लिया,संयुक्त परिवार इतिहास बनने की कगार पर है और समाज की परवाह करना हम छोड़ चुके हैं आज हम खुद ही सोचते हैं कि हमें जो सही लगे हम वो ही करेंगे समाज की नज़र में गलत हो तो क्या!पहले गांव के गांव सांझे होते थे किसी भी मुद्दे पर पंचायत बैठती थी समाज के बढ़े बूढ़ों से सलाह ली जाती थी आज घर के बढ़े बूढ़ों से सलाह लेना तो दूर कोई बात करना भी पसंद नहीं करता।संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवारों ने ले ली है जिसमें माता पिता दोनों को काम करना पड़ता है,बच्चों के लिए माता पिता के पास पैसे तो है लेकिन समय नहीं है जो बच्चे पहले दादी नानी की कहानियां सुन कर बड़े होते थे वे आज स्मार्ट फोन और इंटरनेट की दुनिया में बड़े हो रहे हैं।जो बच्चे पहले बड़ों के आगे शादी के दिन तक बच्चे रहते थे आज स्कूल में पहला कदम रखते ही कहते हैं कि मैं बड़ा हो गया हूँ।पहले जिस बच्चे का जीवन साथी भी माता पिता तय करते थे आज वो बच्चा अपने स्कूल का पहला बैग भी अपनी खुद की पसंद से लेता है।
पहले बच्चे शुरू से बंधन के महत्व को समझते थे -परिवार का बन्धन ,समाज का बन्धन, एकता का बन्धन आज उन्हें स्वतंत्रता की राह भी तो हमीं ने दिखाई है जब एक छोटा सा बच्चा कपड़े तक अपने पसंद के पहनता है तो वह बड़ा हो कर आपसे किस बात की सलाह मांगेगा?अगर समस्या का समाधान निकालना है तो जड़ को समझना होगा।
नई पीढ़ी को बदलने से पहले पुरानी पीढ़ी को बदलना होगा। संयुक्त परिवार के परिवेश में अपनों के सुरक्षित हाथों में इन फूलों को खिलने दो,प्रकृति को करीब से देखने दो, नेट और स्मार्ट फोन से दूर रखो (एक  निश्चित आयु तक)।अपना अनमोल समय इनके साथ व्यतीत करो।बच्चे तो शुरु से प्यार के भूखे रहे हैं अगर माता पिता का प्यार और समय इन्हें मिलेगा तो क्यों ये प्यार की तलाश में बाहर भटकेंगे।
लेकिन आज बच्चा रोता है,तो टीवी का रिमोट हाथ में दे दिया जाता है,फोन दे दिया जाता है क्योंकि हमारे पास इतना समय नहीं है कि उसे गोद में उठा कर बगीचे के फूल दिखाएँ,प्रकृति से मिलाएँ,अपने देवी देवताओं के किस्से सुनाकर बहलाएँ।हम समय के अभाव में उन्हें न तो प्यार दे पाते हैं और न ही ज्ञान।अपना समय बचाने के लिए जो उपकरण (फोन और कम्प्यूटर)उन्हें थमा देते हैं वो उन्हें एक अलग ही ज्ञान देकर हमसे दूर कर देते हैं।नतीजा हमारे सामने हैं-
दोष किसका?
@डॅा नीलम महेंद्र

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