Friday, 29 April 2016

न्याय में देरी स्वयं अन्याय है -----

न्याय में देरी स्वयं अन्याय है -----
8 सितंबर 2006 महाराष्ट्र का नासिक जिला मुम्बई से 290 कि मी दूर  "मालेगाव " दिन के सवा एक बजे हमीदिया मस्जिद के पास शबे बारात के जुलूस में बम विस्फोट हुए जिसमें 37 लोग मारे गए और 125 घायल हुए।29 सितम्बर 2008 मालेगांव पुनः दहला इस बार 8 लोगों की मृत्यु हुई और 80 घायल हुए।
25 अप्रैल 2016 सेशन जज वी वी पाटिल की अध्यक्षता वाली विशेष मकोका अदालत ने इस मामले में गिरफ्तार सभी नौ मुस्लिम आरोपियों को सुबूतों के आभाव में रिहा कर दिया।शुरू में इस केस की छानबीन महाराष्ट्र की ए टी एस द्वारा की गई जिसे बाद में सी बी आई को सौंपा गया और 2011 में इस केस को एन आई ए के अधीन किया गया और आज कोर्ट का फैसला पूरे देश के सामने है।



2006 के मुकदमे के फैसले के बाद अब सभी को 2008 के मुकदमे में फैसले का इंतजार है।दरअसल पिछली यू पी ए सरकार द्वारा "हिन्दू आतंकवाद" नाम के जिस शब्द का नामकरण किया गया था अब उसकी हकीकत सामने आने लगी है।जिस इशारत जहाँ को तत्कालीन केन्द्रीय ग्रहमंत्री द्वारा एक बेगुनाह नागरिक कहा गया जबकि उन्हें सरकारी दस्तावेजों एवं खुफिया जानकारी के आधार पर पता था कि वह एक आत्मघाती आतंकवादी थी जिसके निशाने पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा लाल कृष्ण आडवाणी समेत बी जे पी के अन्य बड़े नेता थे फिर भी तत्कालीन यूपीए सरकार ने  मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर एक झूठे एनकाउन्टर द्वारा इशारत की हत्या का आरोप लगाया था । आज यह सच्चाई देश के सामने है।
26/11  को भी आप भूले नहीं होंगे इस हमले में शामिल हफीज़ सैयीद और आई एस आई को भी तत्कालीन सरकार द्वारा क्लीन चिट दे दी गई थी और कहा गया था कि आरोपियों का सम्बन्ध पाक से नहीं हिन्दू संगठनों से है।
याद कीजिए 2007 के समझौता एकस्प्रेस के धमाके जिसमें कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया गया  तब जबकि यूनाइटेड स्टेटस ने इसमें अरीफ उसमानी नाम के पाकिस्तानी नागरिक एवं लश्कर के हाथ होने की घोषणा कर दी थी आज तक इस मामले में उपर्युक्त नामों में से एक की भी गिरफ्तारी नहीं हुई है।
क्या सभी जानकारियों के बावजूद उपयुक्त कदम नहीं उठाना देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं है?
विकिलिक्स द्वारा जारी दस्तावेजों में कहा गया है कि जुलाई 2009 में राहुल गाँधी ने यू एस  एमबैसेडर टिमोथी रिओमार से कहा था कि भारत को असली खतरा लश्कर से नहीं संघ से है (शायद वे कांग्रेस कहना चाह रहे थे) ।
आइये  अब  2008 के मालेगांव के आरोपियों की बात करें 10 अक्तूबर  2008 को महाराष्ट्र पुलिस ने साध्वी प्रज्ञा को पूछताछ के लिए बुलाया और आज तक पूरे देश को उनके लिए  न्याय का इंतजार है ।इनकी गिरफ्तारी स्वामी असीमानन्द के बयान के आधार पर की गई थी जिसे वह स्वयं कह चुके हैं कि वह बयान उनसे जबरदस्ती दिलवाया गया था।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि साध्वी प्रज्ञा आज तक बिना किसी FIR और सुबूत के जेल में हैं (इंडिया ओपिनीस के अनुसार) ।  एन आई ए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के पास साध्वी के खिलाफ पुख्ता  सुबूत नहीं होने के कारण उसने उन्हें रिहा करने का प्रस्ताव दिया है।इतना ही नहीं 15 अप्रैल  2015 को एपेक्स कोर्ट में जस्टिस एफ एम कालीफूला की अध्यक्षता वाली बेंच ने भी फैसला सुनाया था कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित के खिलाफ ऐसे सुबूत नहीं हैं जिनमें उनके ऊपर मकोका के तहत मुकदमा चलाया जाए इसलिए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए  लेकिन आज तक कैंसर जैसी बीमारी और शरीर के निचले हिस्से के पक्षाघात के बावजूद वे जेल में हैं।यह जानकारी आपके लिए अत्यंत पीड़ा दायक होगी कि उनका यह पैरेलेसिस पुलिस द्वारा दी गई प्रताड़नाओं का नतीजा है।टाइम्स आफ इंडिया के अनुसार वेद खुशीलाल आयुर्वेदिक कालेज जहाँ उनका इलाज चल रहा है , राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में साध्वी द्वारा दर्ज शिकायत के बाद उनका बयान दर्ज किया गया जिसमें  उन्होंने अपने ऊपर महाराष्ट्र पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों का खुलासा किया है इसके  बावजूद उन्हें आज तक न्याय की आस है।आज वो मानवाधिकार कार्यकर्ता कहाँ हैं जो इशारत जहाँ के लिए आगे आए थे, कहाँ है महिला आयोग जो महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ता है?
भारतीय न्याय प्रणाली का आधार यह है कि भले सौ  गुनहगार छूट जाए किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए कोर्ट अपना काम करता है लेकिन जब तक पुलिस द्वारा आरोपी बनाए व्यक्ति पर आरोप साबित नहीं होते उसे इस प्रकार की शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना कहाँ तक उचित है? कल अगर साध्वी प्रज्ञा को अदालत दोषमुक्त करार देकर रिहा कर भी दे तो इतने सालों की उनकी पीड़ित आत्मा  को  क्या न्याय मिल पाएगा?अंग्रेजी में एक कहावत है --जस्टिस डीलेड इज जस्टिस डिनाइड अर्थात् न्याय में देरी स्वयं अन्याय है -----

डॅा नीलम महेंद्र

Monday, 25 April 2016

एक घर के सपने की कीमत तुम क्या जानो दिले नादाँ !

 एक घर के सपने की कीमत तुम क्या जानो दिले नादाँ !

रोटी कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी जरूरतें!आम आदमी की जरूरत --एक छोटा सा घर।
सर पे छत क्या होती है यह  वो ही शख्स समझ सकता है जिसके सिर पर उसकी खुद की छत नहीं हो।आज जो देश में रीयल एस्टेट के हालात हैं उन्होंने आम आदमी की इस बुनियादी आवश्यकता को एक एैसे महंगे स्वप्न में तब्दील कर दिया है जिसे देखने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ती है।अव्वल तो शहर में जमीन है ही नहीं -सब भू-माफिया बड़े बड़े उद्योगपतियों अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठानों के कब्जे में है और इस तलाश में जब शहर से दूर एक अदद जमीन का टुकड़ा मिलता भी है तो उसकी कीमत आम आदमी को यह एहसास दिलाने के लिये काफी होती है एक घर के सपने की कीमत तुम क्या जानो दिले नादाँ !

फिर भी हिम्मत करके जब कोई  इन्साँ इस टुकड़े पर अपने छोटे से घर का ख्वाब पूरा कर लेता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है जैसे उसने अपने जीवन के सबसे बड़े युद्ध में विजय प्राप्त कर ली हो।छोटे शहरों में इस युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले कुछ खुशनसीब होते भी हैं किन्तु महानगरों में तो यह एक अन्तहीन दुखदायी दिवास्वपन बनकर रह जाता है।वहाँ जमीन के  टुकड़े पर सपनों का एक घर नहीं हजारों घरों के सपने बेचे जाते हैं जी हाँ आप सही समझ रहे हैं -फ्लैट !एक के ऊपर एक,एक के सामने अनेक,अगल बगल में सटे कई  अरमान !आज के परिवेश में इन्हें सपने कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि ये घरोंदे हवा में ही बनते हैं जिसमें  अपनी कमाई का तिनका तिनका जोड़कर आम आदमी अपने आशियाने की मंजिल तलाशता है वहाँ उसकी  न तो जमीं होती है न आसमां बस रहने की जगह होती है --यही आज के विकास की हकीकत है,महानगरीय सच्चाई।अब घरों में आँगन,आँगन में खेलते बच्चे,बच्चों से बढ़ते परिवार बीते कल की बात  बनकर रह गए हैं । आज 2BHK का एक फ्लैट आम आदमी को EMI के ऐसे चक्रव्यूह में उलझा देता है जिसमें से निकलने में उसका आधा जीवन निकल जाता है।लेकिन असली मुद्दा यह नहीं है पीड़ा तो यह है कि हवा में बनने वाले इस फ्लैट की भारी कीमत चुकाने के बाद भी यह  कागजों पर ही सिमटा रह जाता है।बिलडरों द्वारा आम आदमी को जब उनके अपने एक छोटे से घर का ख्वाब बेचा जाता है तब उसे  दिलोदिमाग़ में यह अंदाजा नहीं होता कि   इसकी  कीमत सिर्फ पैसे से नहीं चुकानी है बल्कि अभी तो बहुत लम्बी मानसिक, आर्थिक,कानूनी लड़ाई भी बाकी  है।नाम कोई भी हो मि० शर्मा या मि०देशपान्डे या मि० भदौरिया या मि० गुप्ता चेहरा कोई भी हो पहचान सिर्फ़ एक --"आम आदमी" ।यद्यपि यह व्यथा देश के हर कोने की है लेकिन दिल्ली एन सी आर की बात करें तो यहाँ पानी सर से ऊपर जा चुका है और लोगों के सब्र का बांध टूटता जा रहा है। हर महीने घर के किराये और बच्चों की फीस के साथ साथ घर के खर्च के अलावा बैंक की ई एम आई देते देते बिलडर को 90% कीमत चुकाने के बाद तय सीमा निकल जाने के बाद भी अपनी छत आम आदमी के लिए हकीकत से कोसों दूर  है और    उसे उसका ड्रीम होम बेचने वाले बिलडर खुद गहरी नींद की आगोश में हैं।12 मार्च 2015 टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित सौरभ सिन्हा की रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्लैट मिलने की औसत देरी 29 -30 महीने है अर्थात् कम से कम दो साल गुड़गाँव में तो यह 34 महीने की है और फरीदाबाद में 44 महीने।दरअसल अपना काम फैलाने के चक्कर में बिलडर द्वारा एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे में और दूसरे का तीसरे में लगाने की प्रक्रिया में सभी प्रोजेक्ट अधूरे रह जाते हैं और आम आदमी अपने हक के लिए लड़ता रह  जाता है ।

इस लड़ाई को अकेले लड़ते लड़ते जब वह थक गया तो संगठित हुआ --नोएडा एक्श्टेनशन फ्लैट ओनर्स असोशिएशन , नोएडा फ्लैट बायर वोलफेयर असोसिएशन ,सनब्रीज़ अपार्टमेन्ट बायर वेलफेयर एसोसिएशन,शरनम बायर वेलफेयर एसोसिएशन अनेकों संगठन बने कभी राहुल गांधी,अखिलेश यादव सरीखे नेताओं से अपनी व्यथा कही कभी बिलडर के आफिस के बाहर धरना प्रदर्शन,कभी अदालत का दरवाजा खटखटाया तो कभी मीडिया की मदद मांगी।आखिर बिलडर भी तो समझदार हैं उन्हें पता है कि नौकरी पेशा आम आदमी रोज रोज दफतर से न तो छुट्टी ले सकता है और न ही ऐसे संगठित हो सकता है। अपने अपने तरीके से    सोई सरकार को नींद से जगाने की असफल कोशिश में हताश इस आम आदमी की पीड़ा को आज सुनने वाले भी बहुत हैं और सुनाने वाले भी बहुत हैं किन्तु  आवश्यकता इन्हें समझने वाले की है।
एक छोटे से घर का सपना देखता आम आदमी है लेकिन इसे सजाता बिलडर है  आम आदमी को लुभाने के लिए अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन, शहर में लुभावने होर्डिंग ,कोई सेलिब्रिटी को पेश करता है तो कोई घर के साथ टी वी कार अथवा छुट्टियों का पैकेज दिखाकर अपनी ओर आकर्षित करता है।आम्रपाली बिलडरस ने तो धोनी को अपना ब्रांड एम्बैसेडर के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यहाँ क्रिकेट एकेडमी खोली जाएगी।2010 में लाँच हुए इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य छ एकड़ एरिया में छ हजार फ्लैट बनाकर 2013 तक पूर्ण करने का था ।2016 के अप्रैल महीने तक प्रोजेक्ट की दयनीय स्थिति और आम आदमी के बढ़ते दबाव के मद्देनजर महेंद्र सिंह धोनी ने स्वयं को इससे अलग कर लिया है।
बिलडोंरों द्वारा प्रोजेक्ट की तस्वीरों में आस पास हरे भरे बगीचे दिखाए जाते हैं, प्राकृतिक नजारों के बीच एक खूबसूरत स्विमिंग पूल सजाया जाता है कुल मिलाकर आपका सपना आप ही के सामने ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि आप को अपनी मंजिल यहीं दिखने लगती है और ऐसा लगता है कि इस मौके को हाथ से निकलना नहीं चाहिए।हमारे देश में इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि सर पे छत जीवन की ऐसी बुनियादी जरूरत होती है जिसमें जीवन का सबसे बड़ा निवेश लगता है बावजूद इसके यह सौदे जल्दबाजी में किए जाते हैं और कई बार तो बिलडरों द्वारा उपलब्ध काग़ज़ातों को पूरी तौर पर पढ़ा भी नहीं जाता जिसका नतीजा यह होता है कि भुगतान के समय आम आदमी कारपेट एरिया और सुपर बिल्ट अप एरिया जैसे शब्दों के जाल में उलझ के रह जाता है ।दरअसल आज रीयल एस्टेट अनियन्त्रित एवं असंगठित है इसको नियंत्रित करना बेहद आवश्यक हो गया है ताकि इस उद्योग से हमारी अर्थव्यवस्था और समाज को एक स्थायित्व मिले।हालांकि संसद में बिलडरों पर शिकंजा कसने के लिए रीयल एस्टेट रेगुलेरिटि बिल पास किया जा चुका है लेकिन कानून लागू होने में समय लगेगा।
इस बिल के लागू होने से आम आदमी को यकीनन राहत प्रदान होगी।आज बिलडर केवल जमीन के टुकड़े पर प्रोजेक्ट लाँच करते हैं उनके पास न कोई नक्शा होता है और न ही अनुमति भ्रामक विज्ञापनों के जरिए फलैटों को बुक करना शुरू कर देते हैं ज्यों ही इस मायाजाल में आप फँस जाते हैं आप एक अन्तहीन इन्तजार को अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं लेकिन रीयल एस्टेट रेगुलेरिटि बिल के लागू।  होने से  प्रोजेक्ट के लाँच से पहले ही बिलडर को सरकारी और कानूनी अनुमति लेनी होगी और इस अनुमति को अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करना भी अनिवार्य होगा।अभी बिलडर द्वारा विज्ञापन में प्रकाशित तसवीरें ग्राफिक डिजिइनिंग द्वारा निर्मित होती थीं लेकिन इस बिल के बाद    बिलडर केवल साइट की असली तसवीरों का ही प्रयोग कर पाएंगे।सबसे अहम बात जो कि उपभोक्ता के लिए बेहद लाभदायक सिद्ध होगी वह यह कि बिलडर प्रोपर्टी की कीमत कार्पे्ट एरिया के आधार पर ही वसूल पाएंगे न कि सुपर बिल्ट अप एरिया से।कारपेट एरिया वह एरिया होता   है जिसका उपयोग आप स्वयं कर सकते हैं जबकि सुपर बिल्ट अप एरिया में गार्डन स्विमिंग पूल पार्किंग समेत वह पूरा हिस्सा होता है जिस पर बिलडिंग बनती है।
कानून लागू होने में तो समय लगेगा लेकिन जागरूकता तो हमारे हाथ है।जिस दिन आम आदमी अपने अधिकारों के प्रति समय रहते जागरूक हो जाएगा बिलडर उसके सपनों को हकीकत में बदलने को मजबूर हो जाएगा।


Friday, 15 April 2016

दूध की नदीयाँ बहती थी आज पानी को मोहताज़ हे!

" रहीमन पानी राखिए बिन पानी सब सून "

अगर रहीमदास के इस दोहे को हम समझ लेते जिसे हमें बचपन में पढ़ाया गया था तो आज न हमारी धरती प्यासी होती न हम ।जल हरियाली और खुशहाली दोनों लाता है।
लेकिन आज हमारे देश का अधिकांश हिस्सा पिछले चालीस सालों के सबसे भयावह सूखे की चपेट में है।महाराष्ट्र का मराठवाड़ा आन्ध्र का रायलसीमा उत्तरप्रदेश का बुन्दुलखण्ड मध्यप्रदेश का टीकमगढ़ एवं शिवपुरी झारखंड ऐसे अनेकों इलाकों की धरती की सूखी मिट्टी सूखे तालाब खाली कुँए हमारे खोखले विकास की गाथा गा रहे हैं।आजादी के 70 साल बाद भी हमारे गांव ही नहीं देश की राजधानी दिल्ली तक में पेयजल की उपलब्धता एक चुनौती है।गाँवों की स्थिति तो यह है कि पहले खेत सूखे फिर पेट सूखे अब हलक सूखने लगे हैं।टीकमगढ़ में तो पानी की सुरक्षा के लिए बाकायदा बंदूकधारी तैनात किए गए हैं
इस महीने की 12 ता० को जब दस वैगनों से भरी पानी की ट्रेन लातूर पहुँची तो स्थानीय लोगों के चेहरे उनके सूखे गलों की दास्ताँ बयाँ कर रहे थे।गांव के बुजुर्गों का पटरियों पर रात की शांति में  जाग कर पानी के आने का इंतजार उनके खाली बर्तनों का शोर सुना रहा था।पानी से भरे डब्बों को देखकर स्त्रियों की आँखों में आने वाला पानी उनके सूखे हलक की प्यास की कहानी सुना रहा था।अभी इस पानी के इस्तेमाल के लिए उन्हें और इंतजार करना था लेकिन पानी को मात्र देख कर उनके चेहरों की खुशी क्या हमें कुछ


समझा नहीं रही? हम ऐसे क्यों सोचते हैं कि आज हमारे नलों में पानी आ रहा है तो कल भी आयेगा?क्या हमने पानी के प्रबंधन की दिशा में कोई कदम उठाया है यदि नहीं तो हमारे नल हमेशा यूँ ही हमें पानी परोसते रहेंगे ऐसा हम कैसे सोच सकते हैं?
वातानुकूलित कमरों में बैठकर मिनरल वाटर से अपनी प्यास बुझाने वाले क्या इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि गाँव में लोगों का पूरा दिन पानी की व्यवस्था करने में निकलता है महिलाएं आधी रात से जाग कर पानी भरने में लग जाती हैं ताकि दिन की धूप में नहीं जाना पड़े ! सुधा (परिवर्तित नाम) उम्र 22 वर्ष, दो बार गर्भपात हो चुका है डाक्टर ने भारी वजन उठाने से मना किया है लेकिन पानी भरने लगभग चार किलोमीटर की दूरी तय करती है!
महाराष्ट्र की बात करें तो मराठवाढ़ा के सूखाग्रस्त इलाकों से किसानों एवं खेतीहर मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है।2016 में हर महीने करीब 90 किसानों ने आत्महत्या की।खरीफ के मौसम में पूरे महाराष्ट्र में लगभग 15750 गांव सूखे से बुरी तरह प्रभावित हैाकई तालाबों और नदियों का पानी 4% से भी कम बचा है।महाराष्ट्र लगातार चौथी बार सूखे की चपेट में है सबसे ज्यादा असर औरंगाबाद लातूर और विदर्भ में पड़ा है।लातूर में तो पानी को लेकर धारा 144 लगी है।केंद्र सरकार ने 3049 करोड़ रुपये सूखा राहत के लिए मंजूर किए हैं।
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घंटों का सफर तय करके दस वैगन पानी से भरी ट्रेन 342 कि मी चलकर राजस्थान के कोटा से चलकर पश्चिमी महाराष्ट्र के मिराज से 2.75 लाख लीटर पानी लेकर लातूर पहुँची "पानी एक्सप्रेस" पानी लाने वाली पहली ट्रेन बनी ।इस पूरे प्रोजेक्ट में 1.84 करोड़ रुपए का खर्च आया ।इसमें कोई संशय नहीं कि लातूर को  केन्द्र सरकार के इस कदम ने बहुत राहत दी है।लेकिन समस्या को जड़ से मिटाकरउसके स्थाई समाधान में वक्त लगेगा। यह सूखा एक साल की अल्पवर्षा की देन नहीं है।लगातार चार पांच सालों के खराब मौनसून से इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई है अगर समय रहते पूर्ववर्ती सरकारें ने इस विषय को गंभीरता से लेकर ठोस कदम उठाए होते तो आज लातूर ही नहीं पूरे देश में  स्थिति बेहतर होती।लातूर की बात करें तो भौगोलिक कारणों से यह इलाका अल्पवर्षा का क्षेत्र हैऔर न ही इसमें कोई नदी प्रवाहित होती है।लगातार दोहन के फलस्वरूप भू जल स्तर गिरता जा रहा है।शहर को पानी की आपूर्ति मन्जारा डैम से होती है जो कि अपनी जलापूर्ति के लिए अच्छे मौनसून पर निर्भर है किन्तु लगातार चार सालों के खराब मौनसून से लातूर का यह जलस्रोत भी सूख चुका है। 
लातूर की यह स्थिति किसी भी सरकार से छिपी नहीं थी इसलिए 1972 में जब इस क्षेत्र ने सूखे का सामना किया था तब यहाँ पर गन्ने की खेती पर रोक लगा दी गई थी।यह सर्वविदित है कि गन्ने की खेती में पानी बहुत लगता है तो तत्कालीन सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि लोगों को पीने का पानी मिलता रहे गन्ने की खेती पर रोक लगाने का कदम उठाया था।जब 2014 से लातूर सूखे की मार झेल रहा है तो इस साल फिर से गन्ना क्यों बोया गया? क्या उससे उत्पादित गुड़ शक्कर और अलकोहोल की उपयोगिता हमारे किसानों के जीवन से अधिक है?इस सब का सबसे दुखद पहलू यह है कि इस बार की गन्ने की फसल भी पानी के अभाव में बरबादी की कगार पर है और अब शायद जानवरों के चारे के काम आए।
यह जानकारी भी आपको आश्चर्य में डाल देगी कि 2005 मे"महाराष्ट्र वाटर रिसोर्स रुगुलेटरी ओथोरिटी "
का निर्माण हुआ था जो कि महाराष्ट्र में भूमिगत जल एवं नदियों के जल एवं तालाबों के जल के प्रबंधन एवं आपूर्ति के लिए बनाया गया था।अगर इस संस्था ने जल प्रबंधन की ओर थोड़ा भी ध्यान दिया होता तो खेती न सही महाराष्ट्र के गाँवों को कम से कम पीने का पानी तो उपलब्ध होता।इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह तथ्य है कि 2005 में बनने के बावजूद इनके बोर्ड की पहली बैठक 2013 में हुई थी वो भी बाहरी दबाव में।क्या यह संस्था 2014 में गन्ने की खेती पर रोक नहीं लगा सकती थी पानी के प्रबन्धन की दिशा में ठोस कदम समय रहते नहीं उठा सकती थी?
 
इजरायल जैसे देश ने जल संकट को विज्ञान से हरा दिया एक समय था जब इजरायल के नल सूखे थे वहाँ लोग पानी की एक एक बूँद को तरसते थे लेकिन वहाँ की सरकार की जल प्रबंधन नीतियों ने समस्या की जड़ पर प्रहार करके आज अपने देश को सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मिसाल के रूप में पेश किया है।भले ही आज हम इजरायल की तर्ज पर समुद्री जल का विलवणीकरण करने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन घरेलू अपशिष्ट जल को पुनः चक्रित करके कृषि के उपयोग में लेने जैसी पानी प्रबंधन की नीतियाँ अवश्य बना सकते हैं।
किन्तु हमारी विकास नीति के केंद्र में पानी  प्रबंधन न हो कर मुआवजा प्रबन्धन  है इसीलिए पी सांई नाथ को किताब लिखनी पढ़ी "एवरीबडी लव्स अ गुड डौट"(सभी को सूखे से प्रेम है) उनके अनुसार सूखा राहत भारत का सबसे बड़ा विकास उद्योग है।

क्या इस देश  में आज जो पानी की स्थिति है उसके लिए कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार नहीं हैं!विकास के नाम पर जो अर्थव्यवस्था की रचना हुई उसमें हमने अपने परम्परागत जलस्रोतों जैसे तालाब बावड़ी कुंओं के विकास की न सिर्फ उपेक्षा की अपितु उन्हें खत्म कर कान्क्रीट के जंगल उगा दिए जो पानी वर्षा के दिनों में यहां इकट्ठा हो कर साल भर ठहर कर उस इलाके के भूजल स्तर को ऊपर उठाने का काम करता था उसे हमने नष्ट कर दिया।भारतीय किसान यूनियन के शिवनारायण परिहार कहते हैं कि बुन्देलखण्ड पाँच नदियों का क्षेत्र रहा है जिसे पंचनद के नाम से जाना जाता था इस क्षेत्र में कई छोटी नदियाँ और काफी संख्या में पोखर हुआ करते थे लेकिन अवैध बालू उत्खनन से छोटी नदियों का गला घोंटा गया और भू माफिया ने पोखरों को मारकर इमारतें खड़ी कर दी।पर्यावरणविदों का कहना है कि दिल्ली जैसे शहर में सैकड़ों तालाब थे जो वहाँ के भू जल स्तर को बनाए रखते थे लेकिन हमने विकास की अन्धी दौड़ में विनाश का रास्ता पकड़ लिया।भले ही हम जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डालें लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है कई बार फैक्टरियाँ एक ही बार में उतना पानी खींच लेती हैं जितना पूरा गाँव एक महीने में भी नहीं खींचता।
हमारा समाज बहुत रचनात्मक समुदाय है एवं इसमें सामाजिक बदलाव लाने की अद्भुत क्षमता है हम सभी ने मिलकर बड़ी से बड़ी आपदाओं का सफलतापूर्वक सामना किया है।राजस्थान के गाँवों की सफलता की कहानी समाज की सफलता की कहानी है।आसमान से गिरने वाली बूंदों को सहेज कर धरती की गोद भरकर जिस प्रकार राजस्थान जैसे इलाके की नदियों को पुनर्जीवित किया गया वह यह बताता है कि पर्यावरण को सहेज कर, बेहतर बनाकर ही हम पर्यावरण का लुत्फ़ उठा पाएंगे।समाज में बदलाव भाषणों से नहीं जमीनी स्तर पर काम करने से आता है।।पानी से ही धरती का पेट भरता हैं जिस दिन हम उसका पेट भरने के उपाय खोज लेंगे हमारी नदियाँ हमारे खेत सब भर जाँएगे ।हम धरती को जितना देते हैं वह उसे कई गुना कर के लौटाती है इस बात को उस किसान से बेहतर कौन समझ सकता है जो कुछ बीज बोकर कई गुना फसल काटता है।जब हम धरती का ख्याल नहीं रखेंगे तो धरती हमारा ख्याल कैसे रखेगी?

Thursday, 7 April 2016

किस जुर्म की सज़ा हैं यह ?

श्रीनगर के एन आई टी में जो हुआ क्या उसके बाद हम अपने बच्चों से आँख मिलाने की स्थिति में हैं!क्या हम में इतनी नैतिकता शेष है कि हम अपने बच्चों और एक दूसरे के आगे व्यर्थ के तर्क प्रस्तुत करने के बजाय अपनी भूल को स्वीकार कर पाएँ ।क्या हममें इतना साहस है कि अपनी भूल को सुधारने की दिशा में कदम उठा पाएँ ! कदम उठाना तो दूर की बात है हममें से अधिकांश तो सेक्यूलरिज्म का मुखौटा ओड़े इस विषय पर एक रहस्यमयी मौन साधे बैठे हैं।
किसी भी देश के लिए इससे अधिक दुर्भाग्य की बात क्या होगी कि उसके बच्चे अपने ही देश में अपने ही देश के जयघोष करने के कारण अपने ही देश की पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटे गए हों ? इससे अधिक निर्लज्जता क्या होगी कि देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों का विरोध करके देश समर्थक नारे लगाने वाले छात्रों पर ही निशान साधा गया हो!ये कौन से मोड़ हैं? ये राहें किस मंजिल की ओर जाती हैं?
विश्व के मानचित्र पर एक विकासशील देश भारत जो विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है, उसका एक राज्य जम्मू कश्मीर, उसकी राजधानी श्रीनगर,उसमें एक कालेज" एन आई टी" अर्थात् नेशनल इन्टीट्यूट औफ टेकनोलोजी --20% विद्यार्थी कश्मीरी शेष पूरे भारत के विभिन्न राज्यों से।ता० 31 मार्च -भारत वेस्ट इन्डीज से टी 20 विश्व कप में हार जाता है सभी विद्यार्थी (कश्मीरी विद्यार्थियों को छोड़ कर) मायूस हो कर बैठे थे कि उन्हें कालेज कैम्पस में पटाखे चलने की आवाजें आती हैं,वे बाहर निकल कर देखते हैं कि कश्मीरी छात्र खुशियाँ मना रहे हैं और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगा रहे हैं।नारा यहीं तक सीमित होता तो ठीक था लेकिन नारा आगे बढ़ाया गया -- "पाकिस्तान जिन्दाबाद भारत मुर्दाबाद " और "हम क्या चाहें आजादी" कशमीरी छात्र ऐसे नारे लगाकर हरे रंग का झण्डा फहरा रहे थे।बिना चाँद सितारों का हरा झण्डा फहराकर बड़ी चालाकी से कानूनी तौर पर स्वयं को बचाकर अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का जश्न मना रहे थे!
क्या यह सब पढ़कर    आपको कुछ महसूस हुआ? कहना मुश्किल है ना ! क्योंकि इस देश के आम आदमी को इन बातों की आदत हो चुकी है यह तो इस देश में पहले भी हो चुका है हैदराबाद विश्वविद्यालय में और जे एन यू में तो फिर इसमें नया क्या है?और जिस प्रदेश की बात यहाँ हो रही है वहाँ तो यह रोज की बात है तो इतनी हाय तौबा क्यों?तो जनाब इस बात पर कोई हाय तौबा  मचा भी नहीं रहा ,अगर ऐसे    पहले ही मामले में  कोई ठोस कदम उठा लिया गया होता तो आज हमें अपने बच्चों के घावों पर मरहम नहीं लगाना पड़ता !
इस देश का आम आदमी तो बेहद सहिष्णु है और वह न्याय के लिए ईश्वर के ऊपर ही निर्भर रहता है तो इस दिन भी विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद प्रशासन मौन था उनके लिए यह एक साधारण बात थी लेकिन हमारे बच्चे जो इस देश का भविष्य हैं जो कि देश के विभिन्न राज्यों से थे और जिन पर हमें गर्व है लेकिन आज उनके आगे हम शर्मिंदा हैं, वो मासूम कोरा कागज़ थे उनमें अपनी मातृभूमि के प्रति नैसर्गिक प्रेम की भावना थी।उनमें वो क्षत्रिय खून था जो अपनी आँखों के सामने अपनी माँ का अपमान होते नहीं देख पाया  उनमें सही और गलत का एहसास था उनमें गलत का विरोध करने का साहस था जो कि उन्होंने किया देश  विरोधी नारे लगाने वाले कश्मीरी छात्रों का विरोध !
जब देश विरोधी नारे लग रहे थे तो कालेज प्रशासन शान्त था लेकिन जैसे ही गैर कश्मीरी छात्रों ने कश्मीरी छात्रों का विरोध किया और भारत का तिरंगा फहरा कर भारत माता की जय के नारे लगाने शुरू किए प्रशासन हरकत में आगया और पुलिस को बुला लिया गया।पुलिस को देख कर गैर कश्मीरी छात्रों को राहत महसूस हुई और वे सोच रहे थे कि पुलिस आ गई है तो बात संभल जाएगी लेकिन यह क्या? पुलिस ने तो उन्हें ही मारना शुरू कर दिया!लड़कों ही नहीं लड़कियों को भी! कोई महिला कान्सटेबल नहीं होने के बावजूद लड़कियों पर हाथ उठाया गया यहाँ तक कि सेकन्ड ईयर के इलेकट्रिकल ब्रांच के एक दिव्यांग छात्र को भी नहीं छोड़ा! पुलिस की बरबर्ता यही नहीं रुकी वो इन्डस होस्टल के भीतर तक जा कर बच्चों को बाहर निकाल निकाल कर मारने लगी।यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन्डस होस्टल प्रथम वर्ष के बच्चों का होस्टल है और इनमें कई छात्र तो 18 वर्ष से कम उम्र के हैं।इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका एक सरकारी संस्था की न होकर  स्थानीय नागरिकों के समूह सी थी। वे बच्चों को मारते समय कह रहे थे कि तुमने 25 साल बाद तिरंगा फहराने की हिम्मत की है सजा तो मिलेगी (जैसा वहीं के एक विद्यार्थी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया) ।
बात यहाँ खत्म नहीं हुई कालेज प्रशासन ने वाय फाय को प्रतिबंधित कर दिया ताकि बच्चे फेसबुक ,ट्विटर और इन्टरनेट के अन्य माध्यमों द्वारा बाहर की दुनिया के सम्पर्क में न रहें।
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मार्च को क्रिकेट के एक मैच के बाद की झड़प 5 अपरैल को यह मोड़ ले लेगी किसने सोचा था वो भी तब जब 2 ता० को एन आई टी के डायरेक्टर  रजत गुप्ता ने बच्चों एवं उनके माता पिता को सबकुछ सामान्य करने का आश्वासन दिया था।4 ता० को मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने घोषणा की थी कि बच्चों को पूरा न्याय मिलेगा और डायरेक्टर का कहना था कि बच्चों की सुरक्षा हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है! इन घोषणाओं के बाद 5ता० को हमारे बच्चों के साथ स्थानीय पुलिस द्वारा इस प्रकार का व्यवहार कहाँ तक उचित है?क्या यहाँ पर यह प्रश्न नहीं उठता कि पुलिस किसके इशारे पर कार्य कर रही है उसकी देशद्रोह की परिभाषा बाकी के देश की परिभाषा से भिन्न क्यों है ? उसकी नज़र में अपराधी तिरंगा फहराने वाले छात्र क्यों हुए बजाय हरा झण्डा फहराने वालों के ? उसने भारत माता की जय बोलने वाले छात्रों को निशाना क्यों बनाया बजाय पाकिस्तान जिन्दाबाद कहने वाले छात्रों के? वह किसकी तरफ से डण्डे बरसा रही थी? क्यों पाँच दिन तक स्थानीय सरकार द्वारा स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की गई?क्यों केंद्र सरकार को दखल देकर कालेज में सी आर पी एफ के जवान तैनात करने पड़े?
एक प्रश्न यह भी कि दशकों से भारत सरकार कश्मीर सरकार की मदद कर रही है वहाँ की कानून व्यवस्था सुचारु रखने के लिए फिर ऐसे क्या कारण हैं कि वहाँ के स्थानीय लोग भारत से आजादी चाहते हैं?आतंकवादियों का समर्थन करते हैं और हमारी सेनाओं पर पत्थर बरसाते हैं?उन्हें हिन्दूओं से नफरत है लेकिन हिन्दुओं द्वारा दिए टैक्स से मिलने वाले पैसे से नहीं?
जे एन यू में कन्हैया जैसे छात्रों के हितों के लिए आगे आने वाले ,उनके अधिकारों की परवाह करने वाले नेताओं को इन गैर कश्मीरी छात्रों के अधिकारों की परवाह क्यों नहीं है? क्यों इन बच्चों 
के घावों से बहने वाले खून से इनकी आँखें नम नहीं हुई?
ये हमारे देश का कैसा राज्य है जिसमें जब भी भूकंप और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं 
तो भारत सरकार के झण्डे तले मिलने वाली सहायता इन्हें स्वीकार है लेकिन भारत का तिरंगा नहीं!
एक देश में  देशप्रेम की अलग अलग परिभाषाएँ स्वीकार्य नहीं हो सकतीं समय आ गया है कि कुछ ठोस कदम उठाकर समस्या की जड़ पर प्रहार किया जाए ।
डाँ नीलम महेंद्र 

Saturday, 2 April 2016

पिंजरे में कैद सोने की चिड़िया‏

पिंजरे में कैद सोने की चिड़िया

आजादी के 69 साल बाद भी हमारे देश का नागरिक आजाद नहीं है।देश आजाद हो गया लेकिन देशवासी अभी भी बेड़ियों के बन्धन में बन्धे हैं,ये बेड़ियाँ हैं अज्ञानता की,जातिवाद की,धर्म की,आरक्षण की,गरीबी की,सहनशीलता की,मिथ्या अवधारणाओं की आदि आदि।
किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है जब तक वहाँ के नागरिक आजाद न हों।आज क्यों इतने सालों बाद भी हम गरीबी में कैद हैं क्यों जातिवाद की बेड़ियाँ हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं क्यों आरक्षण का जहर हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है क्यों धर्म जो आपस में प्रेम व भाईचारे का संदेश देता है आज हमारे देश में वैमनस्य बढ़ाने का कार्य कर रहा है क्यों हम इतने सहनशील हो गये हैं कि कायरता की सीमा  कब लांघ जाते हैं इसका एहसास भी नहीं कर पाते?क्यों हमारे पूर्वजों द्वारा कही बातों के गलत प्रस्तुतीकरण को हम समझ नहीं पाते क्यों हमारे देश में साक्षरता आज भी एक ऐसा लक्ष्य है जिसको हासिल करने के लिए योजनाएँ बनानी पड़ती हैं क्यों हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश चले जाते हैं। आज हम एक युवा देश हैं ,जो युवा प्रतिभा इस देश की नींव है वह पलायन को क्यों मजबूर है?
क्या वाकई में हम आजाद है?क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है?आज आजादी के इतने सालों बाद भी हम आगे न जा कर पीछे क्यों चले गए वो भारत देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था जिसका एक गौरवशाली इतिहास था उसके आम आदमी का वर्तमान इतना दयनीय क्यों है?क्या हममें इतनी  क्षमता है कि अपने पिछड़ेपन के कारणों की विवेचना कर सकें और समझ सकें!दरअसल जीवन पथ में आगे बढ़ने के लिए बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है।इतिहास गवाह है युद्ध सैन्य बल की अपेक्षा बुद्धि बल से जीते जाते हैं।किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करते हैं।पुराने जमाने में सभ्यता इतनी विकसित नहीं थी तो एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए बाहुबल एवं सैन्य बल का प्रयोग होता था विजय रक्त रंजित होती थी जैसे जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया मानव व्यवहार सभ्य होता गया।जिस मानव ने बुद्धि के बल पर सम्पूर्ण सृष्टि पर राज किया आज वह उसी बुद्धि का प्रयोग एक दूसरे पर कर रहा है।कुछ युद्ध  
आर पार के होते हैं आमने सामने के होते हैं जिसमें हम अपने दुश्मन को पहचानते हैं लेकिन कुछ युद्ध छद्म होते हैं जिनमें हमें अपने दुश्मनों का ज्ञान नहीं होता,वे कैंसर की भाँति हमारे बीच में हमारे समाज का हिस्सा बन कर बड़े प्यार से अपनी जड़े फैलाते चलते हैं और समय के साथ हमारे ऊपर हावी होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।इस रक्तहीन  बौद्धिक युद्ध को आप बौद्धिक आतंकवाद भी कह सकते हैं।कुछ अत्यंत ही सभ्य दिखने वाले पढ़े लिखे सफेद पोश तथाकथित सेकुलरों द्वारा अपने विचारों को हमारे समाज हमारी युवा पीढ़ी हमारे बच्चों में बेहद खूबसूरती से पाठ्यक्रम,वाद विवाद,सेमीनार,पत्र पत्रिकाओं,न्यूज़ चैनलों आदि के माध्यम से प्रसारित करके हमारी जड़ों पर निरन्तर वार किया जा रहा है।इस प्रकार तर्कों को प्रस्तुत किया जाता है कि आम आदमी उन्हें सही समझने की भूल कर बैठता है बौद्धिक आतंकवाद का यह धीमा जहर पिछले 69 सालों से भारतीय समाज को दिया जा रहा है और हम समझ नहीं पा रहे।आइए इतिहास के झरोखे में झांकें -----
यह एक कटु सत्य है कि 1947 में जब देश आजाद हुआ तो हमारे देश की सत्ता उन हाथों में थी जिन्हें अपने हिन्दू होने का गर्व कदापि नहीं था ।आज से दो साल पहले तक हमारे देश के सर्वोच्च पदों पर ऐसे हिन्दू आसीन थे जिन्हें सेक्यूलरिज्म के कीड़े ने काटा था उन्हें अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता हिन्दुओं के हितों से ज्यादा थी ।आज यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारी सरकार हमारी न्याय व्यवस्था हमारा संविधान सभी के द्वारा छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिन्दू से अधिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान किया जाता रहा (कारण वोट बैंक की गंदी राजनैती )।
इस बौद्धिक आतंकवाद के परिणाम को आप एक बहुत ही सरल उदाहरण से अवश्य समझ लेंगे कि जब हमारा देश आजाद हुआ था इस देश में काम करने के लिए युसुफ ख़ान जैसी शखसियतों  को दिलिप कुमार और  महजबीन बानो जैसी अदाकारा को मीना कुमारी बनना पड़ा था   जबकि आज सलमान खान,आमिर खान ,शकहरुख खान अपने नामों के साथ सफलता के चरम पर हैं फिर भी हम असहिष्णु हैं!
मद्रास स्टेट से रोमेश थापर की पत्रिका" क्रौस रोडस "ने तत्कालीन प्रधानमंत्री की आर्थिक एवं विदेश नीतियों के खिलाफ एक लेख छापा था तो उसे प्रतिबंधित कर दिया गया था यद्यपि रोमेश थापर ने न्यायालय में मुकदमा जीत लिया था फिर भी 12 मई 1951 को संविधान का गला घोंटा गया था तब हमारे प्रधानमंत्री और सरकार असहिष्णु नहीं हुए किन्तु आज की सरकार है!
आज देश हित में बोलना, देश की संसद पर हमला करने वाले और जेहाद के नाम पर मासूम लोगों की
जान लेने वाले आतंकियों को सज़ा देना,भारत माता की जय बोलना,शहीद सैनिकों के हितों की बात करना असहिष्णुता की श्रेणी में आता है किन्तु इशारत जहाँ और अफजल गुरु सरीखों को शहिद बताना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता!
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बयान भगवा आतंकवाद की श्रेणी में आते हैं लेकिन 26/11 के हमले में आतंकवाद का रंग बताना असहिष्णु होना हो जाता है।दादरी मे अखलाक की हत्या साम्प्रदायिक हिंसा थी लेकिन दिल्ली में डाँ नारंग की हत्या"मासूमों "द्वारा किया एक साधारण अपराध जिसे साम्प्रदायिकता के चश्मे से न देखने की सलाह दी जा रही है।तथाकथित सेक्यूलर इसे भी अभिव्यक्ति की आजादी कहें तो कोई आश्चर्य नहीं। हो सकता है कि वे कहें कि मुद्दा स्वयं को अभिव्यक्त करने का था सो कर दिया केवल तरीका ही तो बदला है,इस बार हमने स्वयं को शब्दों से नहीं कर्मों से अभिव्यक्त किया है यह स्वतंत्रता हमारा अधिकार है!
स्वतंत्रता संग्राम में बापू और चाचा ने अहम भूमिका निभाई यह पढ़ाया एवं प्रचारित किया जाता है लेकिन वासुदेव बलवन्त फड़के ,चापेकर बन्धु ,लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ,खुदीराम बोस ,अश्फाकउल्लाखान   ,भगतसिंह ,सुखदेव ,राजगुरु, सुभाष चन्द्र बोस,विनायक दामोदर सावरकर,जैसे शहीदों के बलिदान और योगदान को क्यों भुला दिया गया?क्यों हमारे बच्चों को इन दो नामों के अलावा तीसरा नाम याद नहीं आ पाता ?क्यों हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप,शिवाजी महाराज,विक्रमादित्य,चन्द्रगुप्त,बाजीराव पेशवा की वीर गाथाएँ न होकर अकबर महान होता है?यह बौद्धिक आतंकवाद नहीं है तो क्या है?
हमारे बच्चों को इतिहास में पढ़ाया जाता है कि भारत पर मुग़लों ने बार बार आक्रमण किया इस विषय में चेन्नई में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डाँ एम डी श्रीनिवास ने लिखा है कि इसलाम ने यूरोप,अफ्रीका ,इजिप्ट और एशिया के कुछ भागों पर कब्जा कर लिया था किन्तु हिन्दू सभ्यता का 600  ई ० से 1200  ई  ० तक बाल भी बाँका नहीं कर पाए थे।आसाम , ओड़िशा ,मराठा साम्राज्य,बुन्देला ,सिख ,जाट ,विजय नगर साम्राज्य,इन सभी की अद्भुत सैन्य क्षमता के आगे इसलाम ने हर बार घुटने टेके थे।300 से1400 ई० तक इस्लाम ने कई बार भारत में पैर जमाने की कोशिश की लेकिन भारतीय क्षत्रिय खून से हर बार मुँह की खानी पड़ी ।आज जो इस्लाम भारत में पैर पसार रहा है वो जेहादी इस्लाम है एक तरह का बौद्धिक आतंकवाद ।दुख इस बात का है कि इस बौद्धिक आतंकवाद के परिणाम स्वरूप हमारा क्षत्रिय खून भुला दिया गया है,हम स्वयं को असहिष्णु कहलाने से डरने लगे ।वसुदैव कुटुम्बकं समाज सेवा एवं छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में दूसरे धर्मों एवं संस्कृतियों को भारत में न सिर्फ स्वीकार किया जा रहा है अपितु फैलाने में भी सहयोग किया जा रहा है।धर्म की आड़ में बौद्धिक आतंकवाद के सहारे योजनाबद्ध तरीके से जो
धर्म परिवर्तन का खेल जारी है क्या हम इस कूटनीति को समझने की बौद्धिक क्षमता रखते हैं ?
अनेक संस्कृतियों का मिलन केवल भारत में ही क्यों स्वीकार्य है पाश्चात्य देशों जैसे आस्ट्रेलिया ,अमेरिका,ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष क्यों दूसरे देशों के नागरिकों से अपने देश की भाषा और संस्कृति अपनाने के लिए कहते हैं?आज से दो साल
पहले जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तो क्यों उन्हें अमेरिका ने वीज़ा जारी करने से मना कर दिया था? यह वहाँ रहने वाले भारतीयों को सख्त संदेश था कि अगर आपको अमेरिका में रहना है तो हिन्दूवादी सोच एवं संस्कृति से दूरी बनाकर रखनी होगी।पेरिस में आतंकवादी हमले के बाद हम सभी जानते हैं वहाँ की प्रधानमंत्री ने क्या एक्शन लिए थे तब उन्हें असहिष्णु की उपाधि नहीं दी गई क्या हम लोग इन दोहरे मापदंडों को देख और समझ पा रहे हैं?किसी भी देश को सम्पन्न बनाने का एक ही तरीका होता है, वहाँ के नागरिकों को सम्पन्न बनाना अगर भारत को सम्पन्न बनाना था तो इस देश के हर नागरिक को केवल भारतीय रहने देते,आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए नीतियों के द्वारा  इतने सालों में भारत के आम आदमी का विकास निश्चित ही हो जाता फिर क्यों हमें जातिगत आरक्षण का मीठा जहर दिया गया?भारत का विभाजन होने के बाद भी क्यों आजाद भारत के समाज को विभिन्न जातियों में विभाजित करके जाती प्रथा को जीवित रखा गया इस मीठे जहर से हमारे देश की या इन पिछड़ी जातियों की कितनी तरक्की हुई है? आज जातियाँ वोट बैंक में तब्दील हो चुकी हैं जो बौद्धिक आतंकवाद का परिणाम है।1947 में जो भारत का विभाजन हुआ था वो रक्त रंजित था और आजादी के बाद जो आज तक के सफर में भारतीय समाज का विभाजन हुआ वो बौद्धिक आतंकवाद के मीठे जहर से बिना रक्त पात के सफल हुआ।
अगर हम बुद्धिजीवी हैं तो हमें यह सिद्ध करना होगा।कुछ मुठ्ठी भर लोग हम सवा करोड़ भारतीयों की बुद्धि को ललकार रहे हैं आइए उन्हें जवाब बुद्धि से ही दें।जिस दिन हम सवा करोड़ भारतीयों के दिल में यह अलख जगेगी कि हमें अपने क्षेत्रों और जातियों से ऊपर उठ कर सोचना है,उस दिन उसकी रोशनी  केवल भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में भी फैलेगी।जब हम स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो विश्व गुरु बनने से हमें कौन रोक पायेगा?
जय हिंद जय भारत

डाँ नीलम महेंद्र

Friday, 1 April 2016

राष्ट्रवाद का अर्थ सम्पूर्ण राष्ट्र के नगरिकों का कर्तव्यबोध

भारत का आम आदमी आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह अचम्भित है  कि इतनी विविध प्रकार की जो घटनाएँ घटित हो रही हैं उन्हें वह किस रूप में देखे।वह वैसे ही जिंदगी द्वारा दी गई जिम्मेदारियों के बोझ तले कभी कभी शान्ति के कुछ पल चुराने की कोशिश में लगा हुआ अपनी रफ्तार में चला जा रहा था कि अचानक देश में ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई कि वह व्याकुल हो उठा।एक ओर विश्व में भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाई देने लगा  ,हमारे प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में न केवल एन आर आई बल्कि उस देश के नागरिक भी"मोदी मोदी" के नारे लगाने पर विवश हो गए,भारत निवेश के लिए विश्व को एक फायदेमंद जगह दिखने लगी,स्वच्छता अभियान के द्वारा देश की स्वच्छता में आम आदमी को अपने योगदान का एहसास होने लगा,शौचालयों के निर्माण से गावों में आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार होता दिखा,देश के हर नागरिक का बैंक खाता खुलवाकर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की दिशा में एक ठोस कदम दिखने लगा,मेक इन  इंडिया के द्वारा देश में रोजगार के अवसर उपलब्ध होते दिखने लगे , देश के बुनियादी ढांचे में सुधार के द्वारा भारत को एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते देख रहा था कि अचानक कई विवादों के बादलों ने उसकी दृष्टि धूमिल कर दी।
उत्तर प्रदेश में दादरी कांड,अवार्ड वापसी अभियान,हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का राजनीतिकरण ,जे एन यू परिसर में देश विरोधी नारों का लगना ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तर्क हीन मुद्दों को उछालना, भारत माता के जयघोष को ही विवाद बना देना आदि आदि।
आश्चर्य इस बात का है कि ये सभी मुद्दे बुद्धि जीवी वर्ग द्वारा उठाए जाने के बावजूद तर्कहीन हैं क्योंकि इनका राष्ट्रीय अथवा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देश के विकास या उसकी मूलभूत समस्याओं मसलन गरीबी,बेरोजगारी,राष्ट्रीय सुरक्षा आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन सभी मुद्दों ने भारतीय समाज को न सिर्फ भीतर से तोड़ कर बाँटने का काम किया है अपितु अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल भी की है।
लेकिन कहते हैं न कि बुराई में भी अच्छाई छिपी होती है तो यह अच्छा हुआ कि इन घटनाओं ने देश में राष्ट्रवाद और देश भक्ति पर एक ऐसी बहस को जन्म दिया जिसमें केवल बुद्धि जीवी ही नहीं बल्कि आम आदमी भी शामिल हो गया है ।देश के इस बुद्धिजीवी वर्ग ने जो तर्कहीन मुद्दे उठाए,अनजाने में मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया।दरअसल पिछले दो सालों में विपक्ष और मीडिया को सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का मामला अथवा घोटाला नहीं मिला तो इन तर्कहीन मुद्दों को ही परोस दिया।भूल यह हुई कि चूँकि यह मुद्दे आम आदमी से जुड़े थे इसलिए जनमानस आहत हुआ।आज वह जानना चाहता है कि हमारे देश में आखिर कितने प्रतिशत लोग हैं जो गोमांस का सेवन करते हैं (मात्र  20%)--!अवार्ड वापसी अभियान जो देश के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा चलाया गया घोषणा तो बहुत हुई लेकिन कितनों ने लौटाए (मात्र 33) और क्यों यह खोज का विषय है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र द्वारा आत्महत्या का राजनीतिकरण करके उसको दलित उत्पीड़न का मामला बनाकर क्यों प्रस्तुत किया गया जबकि वह छात्र दलित था ही नहीं!जे एन यू में जब राष्ट्र विरोधी नारे लगे तो पूरा देश एकजुट क्यों नहीं था क्यों राष्ट्रवाद पर एक बहस शुरू कर दी गई क्यों देश बँटा हुआ नज़र आने लगा?यह बात भी आश्चर्य जनक है कि 9 तारीख को जो जे एन यू में हुआ वह पहली बार नहीं हुआ था इस प्रकार की घटनाएँ वहाँ आम बात थी तो देश के सामने पहली बार क्यों आईं?क्यों देश की राजधानी में स्थित एक अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की बातें इतने सालों तक देश से छिपी रहीं?इन सभी बातों को संविधान का सहारा लेकर सही ठहराने की कोशिश और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रस्तुत किए गए तर्कहीन बातों ने आम आदमी को झकझोर दिया। अभी देश का आम आदमी इन बातों को समझने की कोशिश में लगा था कि ओवेसी ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि मैं भारत माता की जय नहीं बोलूँगा ?आज देश में  न सिर्फ  नए शब्दों की उत्पत्ति हो रही है जैसे --"असहिष्णुता" अपितु राष्ट्रवाद और देशप्रेम की नई नई परिभाषाएँ भी गढ़ी जा रही हैं।आज जितने लोग हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं!इन सभी को पढ़ने व सुनने के बाद यदि समझ शेष बचे,तो अपने अन्तरमन में आप भी अपने लिए एक नई परिभाषा को जन्म दीजिए नहीं तो इनमें से एक का चयन कर लीजिए।
आम आदमी बेहद सरल होता है उसे कानून की ज्यादा समझ नहीं होती लेकिन सही और गलत का ज्ञान अवश्य होता है उसे पता है कि राष्ट्र का हित क्या है और राष्ट्र विरोध क्या है।आज आचार्य चाणक्य की कही बात का उल्लेख उचित होगा जिसमें वह स्पष्ट करते हैं कि देश  के प्रति निष्ठा और देश के प्रमुख के प्रति निष्ठा दो अलग अलग बातें हैं।आज यही बात हमें समझनी होगी कि  देश पहले आता है --नेशन कमस् फर्सट ।आज अगर राष्ट्रवाद  मुद्दा  बना है तो इस पर बहस होनी ही चाहिए  न कि विवाद और साजिश!
राष्ट्रवाद अर्थात राष्ट्रीयता अर्थात् उस देश के नागरिकों का अपने देश के प्रति पायी जाने वाली स्वाभाविक सामूहिक भावना।जब बात देश की होती है तो वह केवल एक अन्तराष्ट्रीय भौगोलिक नक्शे पर बना जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता।देश बनता है वहाँ वास करने वाले नागरिकों से।भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है,वह एक ऐसी संस्कृति है जो अनेक संस्कृतियों का मिलन है,सम्पूर्ण विश्व में शायद भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें इतनी विविधता है -धर्म,संस्कृति,भाषा,परम्परा ,सभ्यता में इतनी अनेकता के बावजूद एकता!भारत में रहने वाला हर नागरिक भारतीय हैं हिन्दू धर्म को ही लें तो इसमें अनगिनत सम्प्रदाय है,देवी देवताओं हैं,जातियाँ हैं,सबकी अपनी अपनी संस्कृति अपना अपना रहन सहन है और यही हिन्दू धर्म की विशालता  है कि आप चाहें किसी भी भगवान को मानें,आप मन्दिर में या गुरुद्वारे में जाएं किसी भी जाति या सम्प्रदाय से जुड़े हों (जैन,कृष्ण,आर्यसमाज आदि)अन्त में आप हिन्दू ही है।यह धर्म से जुड़ी बात न होकर जन्म से जुड़ी बात है।भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति हिन्दू हैं,हिन्दुस्तान का हर नागरिक हिन्दू हैऔर  हिन्दू धर्म में इतनी विविधता को स्वीकार करना उसके मूलभूत संस्कारों में शामिल है ।बहुत कम लोग जानते होंगे कि केरल में जब मुस्लिम आए तो दुनिया की सबसे प्राचीन मसजिद (चेरमन मसजिद) के लिए जगह देने वाला एक हिन्दू राजा ही था।
अंग्रेजी के लेखक कैरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक"द असेन्शियल टीचिंगस् आफ हिन्दुइज्म " में लिखा है --"आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते है वह उस मजहब से बढ़ा सिद्धांत है जिस मजहब को पश्चिम के लोग समझते हैं।कोई किसी भगवान में विश्वास करे या ना करे फिर भी हिन्दू है,यह जीवन की एक पद्धति है।"
हम बात कर रहे थे राष्ट्रवाद की देश प्रेम की देश भक्ति की,।एक अंग्रेजी कहावत है"ऐवरीथिंग इज फेयर इन लव एंड वार"।प्रेम और भक्ति की कोई सीमाएँ नहीं होती और जहाँ सीमाएं होती हैं वहाँ प्रेम और भक्ति नहीं हो सकते।प्रेम और भक्ति में समर्पण होता है,अपना स्वयं का आस्तित्व मिटाकर प्रेम होता है भक्ति होती है इसमें कर्तव्यबोध होता है न कि अधिकार बोध! प्रेम वह होता है जो भगत सिंह ने किया था,भक्ति वह होती है जो सीमा पर हनुमनथप्पा जैसे सैनिक करते हैं।हमारे देश की अनेकता में एकता ही हमारी शक्ति है सभी धर्मों के लोगों का मिलकर रहना ही हमारी ताकत है।यह हमें सुनिश्चित करना है कि हमारी इस ताकत को कमजोरी में न बदला जाए।यह तभी संभव है जब सभी धर्मों के  लोग आपस में मिलकर प्रेम से रहें 
,
यह तभी संभव जब वे एक दूसरे के धर्म को सम्मान दें सिर्फ मेरा धर्म महान है यह कहने कि बजाय मेरा धर्म भी महान है और तुम्हारा धर्म भी महान है ऐसा कहें।एक दूसरे को स्वीकार करना ही राष्ट्रवाद है! मैं भी हूँ, तुम भी हो, यह राष्ट्रवाद है।वो कहते हैं ना --
"
हमीं हम हैं तो क्या हम हैं
तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो"
मैं से हम होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधना राष्ट्रवाद है।