Sunday, 24 July 2016

भारतीय राजनीति के रंगमंच मायावती जी लड़ाई अब माँ से है

भारतीय राजनीति के रंगमंच मायावती जी लड़ाई अब माँ से है

भाषा के विषय में निर्मला जोशी जी के बेहद खूबसूरत शब्द 
'माता की ममता यही  , निर्मल गंगा नीर 
इसका अर्चन कर गए तुलसी सूर कबीर '
आज भारत की राजनीति ने उस भाषा को जिस स्तर तक गिरा दिया है वह वाकई निंदनीय है।
उत्तर प्रदेश   बीजेपी के वाइस प्रेसीडेन्ट दयाशंकर सिंह ने 20 जुलाई को मायावती को वेश्या से भी बदतर कहा।
जवाब में बसपा कार्यकर्ताओं ने जगह जगह रैलियाँ निकाल कर हिंसात्मक प्रदर्शन किए बेहद आपत्तिजनक नारे लगाए दया शंकर की बेटी व्  बहन का अभद्रता के साथ जिक्र किया। इतना ही नहीं सड़कों पर प्रदर्शन के दौरान लड़किओं एवं महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। उनके साथ भी अभद्रता की गई। 

इस सबको मायावती सही मानती हैं यानी खून के बदले खून और गाली के बदले गाली उनकी नीति है।
अभद्र भाषा का प्रयोग एक पुरुष ने एक महिला के खिलाफ किया। बात महिलाओं के सम्मान की थी मौसम चुनाव का था। बात निकली तो दूर तलक गई और मुकदमा दलित को आधार बनाकर दर्ज हुआ।
वो मुद्दा ही क्या जो खत्म हो जाए ! बात और दूर तलक निकली और दया शंकर की बेटी ने पूछा
  " नसीम अंकल बताएं मुझे कहाँ पेश होना है।"
हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और अनेक देशों के लिए एक मिसाल भी है  किन्तु आज भारत में  राजनीति जिस स्तर तक गिर चुकी है वह अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है। 
भाषा ही वह माध्यम है जिससे हम अपने आप को एवं अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। आपके शब्दों का चयन आपके व्यक्तित्व को दर्शाता है।
आज भारतीय राजनीति में जिस प्रकार की भाषा शैली का प्रयोग हो रहा है वह बहुत ही चिंताजनक एवं निराशाजनक है। जिस तरह की भाषा हमारे नेता बोल रहे हैं उससे उनकी दूषित शब्दावली ही नहीं अपितु दूषित मानसिकता का भी प्रदर्शन हो रहा है।
उससे भी अधिक खेद

पूर्ण यह है कि परिवार की महिलाओं एवं बेटियों को भी नहीं बख्शा जा रहा।
हर बात पर वोट बैंक की राजनीति , चुनावों का अंकगणित  , सीटो का नफा नुकसान ! इससे ऊपर क्यों नहीं उठ पा रहे हम ?
नेताओं द्वारा दूषित भाषा का प्रयोग पहली बार नहीं हो रहा। इससे पहले भी चुनावी मौसम में अनेक आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग हो चुका है। कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं है। चाहे वो कांग्रेस के सलमान खुर्शीद हों जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को 'नपुंसक ' तक कह डाला हो या भाजपा के वी के सिंह हों जो पत्रकारों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हों। चाहे साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ हों या फिर ओवेसी हों जो एक दूसरे के लिए स्तर हीन भाषा का प्रयोग करते हों। चाहे समाज वादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव हों अथवा आर जे डी के लालू प्रसाद यादव हों ।चाहे मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह हों जिन्होंने अपने ही पार्टी की महिला सांसद को 'टंच माल ' की उपाधि देते हुए खुद को पुराना जौहरी बताया हो।
बात महिला अथवा पुरुष तक सीमित नहीं है , जाती अथवा धर्म की नहीं है आप पत्रकार हैं या नेता हैं इसकी भी नहीं है। बात है मर्यादाओं की , नैतिकता की , सभ्यता की , संस्कारों की  ,शिक्षित होने के मायने की  , समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की।बात है भावी पीढ़ी के प्रति हमारे दायित्वों की ! हम उन्हें क्या सिखा रहे हैं ? हम उन्हें कैसा समाज दे रहे हैं  ? 
सोचिए क्या बीती होगी एक बारह वर्ष की लड़की पर जब उसने बसपा महा सचिव नस्लिमुद्दीन से वह प्रश्न पूछा होगा !
क्या बीती होगी उस माँ पर जिसकी   नाबालिग  बेटी ऐसा सवाल पूछ रही हो  ? 
एक नेता के रूप में एक महिला के लिए प्रयोग किये गये शब्दों की  कीमत एक पिता को चुकानी होगी इस बात की कल्पना तो निःसंदेह दया शंकर ने भी नहीं करी होगी  
दया शंकर को तो शायद अब कहे हुए शब्दों की कीमत पता चल गई होगी  किन्तु मायावती  ? 
कहते हैं बेटियाँ तो साँझी होती हैं   क्या एक बेटी के लिए उनके कार्यकर्ताओं द्वारा उपयोग किए गए इन शब्दों को वह सही मानती हैं  ?
क्या इसी आचरण से वे स्वयं को देवी सिद्ध करेंगी  ?
एक महिला होने के नाते कम से कम उन्हें  महिलाओं को इस मुद्दे से अलग ही रखना चाहिए था   महिलाओं का सम्मान जब एक महिला ही नहीं करेगी तो वह इस सम्मान की अपेक्षा पुरुषों से कैसे कर सकती है ?  शायद वह भी नहीं जान पाईं कि जिस बात को उन्होंने महिला सम्मान से  जोड़ कर दलित रंग में रंग कर वोट बटोरने चाहे , वह उन्हीं की अति उग्र प्रतिक्रिया के फलस्वरूप एक बेटी द्वारा पूछे गए प्रश्न से 'बेटी के सम्मान ' का मुद्दा बन जाएगा।
एक सवर्ण पुरुष   से एक दलित महिला तो शायद  जीत भी जाती लेकिन मैदान में सामना एक महिला और एक बेटी से होगा यह तो शायद मायावती ने भी नहीं सोचा होगा।
एक  महिला से भी वो शायद जीत  जातीं लेकिन भारतीय राजनीति के रंगमंच पर उनका सामना अब एक माँ से है  !
क्रिया की प्रतिक्रिया करते समय संयम रखने का पाठ संभवतः मायावती को भी मिल ही गया होगा।
आज बशीर बद्र की पंक्तियों से हमारे नेताओं को नसीहत लेनी चाहिए
'दुश्मनी जम कर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा  होना पड़े '
हम कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं यह स्वयं हम पर निर्भर करता है। भाषा की मर्यादा की सीमा रेखा भी हमें स्वयं ही खींचनी हे । यह नैतिकता एवं स्वाध्याय का प्रश्न है। जिस समाज में भाषा की मर्यादाओं का पालन कानून की धाराएँ अथवा राज नैतिक लाभ और हानि कराएँ यह उस समाज के लिए  अत्यंत ही चिंतन का विषय होना चाहिए। 
डा नीलम महेंद्र 

 



Sunday, 17 July 2016

जुल्म तो हमारी सेना पर हो रहा है

जुल्म तो हमारी सेना पर हो रहा है 
"गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त,हमीं अस्त,हमीं अस्त,हमीं अस्त ।"  --फारसी में मुगल बादशाह जहाँगीर के शब्द ! 
कहने की आवश्यकता नहीं कि इन शब्दों का उपयोग किसके लिए किया गया है --जी हाँ कश्मीर की ही बात हो रही है  लेकिन धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह स्थान आज  सुलग रहा है  प्राचीन काल में हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों के पालन स्थान के चिनार आज जल रहे हैं  वो स्थान  जो सम्पूर्ण विश्व में केसर की खेती के लिए मशहूर था आज बारूद की फसल उगा रहा है। 
हिजबुल आतंकवादी बुरहान वानी की 8 जुलाई 2016 को भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मार दिए जाने की घटना के बाद से ही घाटी लगातार हिंसा की चपेट में है  
खुफिया सूत्रों के अनुसार अभी भी कश्मीर में 200 आतंकवादी सक्रिय हैं  इनमें से 70% स्थानीय हैं और 30% पाकिस्तानी  बुरहान ने 16 से 17 साल के करीब 100 लोगों को अपने संगठन में शामिल कर लिया था  बुरहान की मौत के बाद हिजबुल मुजाहिदीन ने महमूद गजनवी को अपना नया आतंक फैलाने वाला चेहरा नियुक्त किया है। 
किसी आतंकवादी की मौत पर घाटी में इस तरह के विरोध प्रदर्शन पहली बार नहीं हो रहे। 
1953 में शेख मोहम्मद अब्दुला जो कि यहाँ के प्रधानमंत्री थे , उन्हें जेल में डाला गया था तो कई महीनों तक लोग सड़कों पर थे। 
कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष की शुरुआत करने वालों में शामिल जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापकों में से एक मकबूल बट को 11 फरवरी 1984 को फाँसी दी गई थी तो कश्मीरी जनता ने काफी विरोध प्रदर्शन किया था। 
1987 में चुनावों के समय भी कश्मीर हिंसा की चपेट में था। 
2013 में भारतीय संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को जब फाँसी दी गई तब भी कश्मीर  सुलगा था। 
यहाँ पर गौर करने लायक बात यह है कि यह सभी आतंकवादी पढ़े लिखे हैं और कहने को अच्छे परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। यह सभी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त थे बावजूद इसके इन्हें कश्मीरी जनता का समर्थन प्राप्त था। 
बुरहान एक स्कूल के प्रिन्सिपल का बेटा था । मकबूल कश्मीर यूनिवर्सिटी से बी ए और पेशावर यूनिवर्सिटी से एम ए करने के बाद शिक्षक के तौर पर तथा पत्रकार के तौर पर काम कर चुका था।अफजल गुरु ने एम बी बी एस की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी और भारत में आई ए एस अफसर बनने का सपना देखा करता था। 

पाकिस्तान वानी को शहीद का दर्जा देकर 19 जुलाई को काला दिवस मनाने का एलान कर चुका है। 
जम्मू कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस के लीडर  उमर अब्दुलाह ने ट्वीट किया कि "वानी की मौत उसकी जिंदगी से ज्यादा भारी पड़ सकती है।" 
क्या एक साधारण सी घटना को अनावश्यक तूल नहीं दिया जा रहा? क्या एक देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त एक भटके हुए लड़के को स्थानीय नौजवानों का आदर्श बनाने का षड्यंत्र नहीं किया जा रहा  ?क्या यह हमारी कमी नहीं है कि आज देश के बच्चे बच्चे को बुरहान का नाम पता है लेकिन देश की रक्षा के लिए किए गए अनेकों  ओपरेशन  में शहीद हमारे बहादुर सैनिकों के नाम किसी को पता नहीं ?  
हमारे जवान जो दिन रात कश्मीर में हालात सामान्य करने की कोशिश में जुटे हैं उन्हें कोसा जा रहा है और आतंकवादी हीरो बने हुए हैं  ?  
एक अलगाववादी नेता की अपील पर एक आतंकवादी की शवयात्रा में उमड़ी भीड़ हमें दिखाई दे रही है लेकिन हमारे सैन्य बलों की सहनशीलता नहीं दिखाई देती जो एक तरफ तो आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं और दूसरी तरफ अपने ही देश के लोगों के पत्थर खा रहे हैं । 
कहा जा रहा है कि कश्मीर की जनता पर जुल्म होते आए हैं कौन कर रहा है यह जुल्म ? सेना की वर्दी पहन कर ही आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं तो यह तय कौन करेगा कि जुल्म कौन कर रहा है  ? अभी कुछ दिन पहले ही सेना के जवानों पर एक युवती के बलात्कार का आरोप लगाकर कई दिनों तक सेना के खिलाफ हिंसात्मक प्रदर्शन हुए थे लेकिन बाद में कोर्ट में उस युवती ने स्वयं बयान दिया कि वो लोग सेना के जवान नहीं थे स्थानीय आतंकवादी थे  ।इस घटना को देखा जाए तो जुल्म तो हमारी सेना पर हो रहा है!  
यह संस्कारों और बुद्धि का ही फर्क है कि कश्मीरी नौजवान" जुल्म "के खिलाफ हाथ में किताब छोड़कर बन्दूक उठा लेता है और हमारे जवान हाथों में बन्दूक होने के बावजूद उनकी कुरान की रक्षा करते आए हैं। ? 
कहा जाता है कि कश्मीर का युवक बेरोजगार है तो साहब बेरोजगार युवक तो भारत के हर प्रदेश में हैं क्या सभी ने हाथों में बन्दूकें थाम ली हैं  ? 
क्यों घाटी के नौजवानों का आदर्श आज कुपवाड़ा के डाँ शाह फैजल नहीं हैं जिनके पिता को आतंकवादियों ने मार डाला था और वे 2010 में सिविल इंजीनियरिंग परीक्षा में टाप करने वाले पहले कश्मीरी युवक बने ? उनके आदर्श 2016 में यू पी एस सी में द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले कश्मीरी अतहर आमिर क्यों नहीं बने ? किस षड्यंत्र के तहत आज बुरहान को कश्मीरी युवाओं का आदर्श बनाया जा रहा है  ? 
पैसे और पावर का लालच देकर युवाओं को भटकाया जा रहा है।  
कश्मीर की समस्या आज की नहीं है इसकी जड़ें इतिहास के पन्नों में दफ़न हैं। आप इसका दोष अंग्रेजों को दे सकते हैं जो जाते जाते बँटवारे का नासूर दे गए। नेहरू को दे सकते हैं जो इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए।पाकिस्तान को भी दे सकते हैं जो इस सब को प्रायोजित करता है। लेकिन मुद्दा दोष देने से नहीं सुलझेगा ठोस हल निकालने ही होंगे। 
आज कश्मीरी आजादी की बात करते हैं क्या वे अपना अतीत भुला चुके हैं ? राजा हरि सिंह ने भी आजादी ही चुनी थी लेकिन 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने हमला कर दिया था।तब उन्होंने सरदार पटेल से मदद मांगी थी और कश्मीर का विलय भारत में हुआ था। 
कश्मीरी जनता को भारत सरकार की मदद स्वीकार है लेकिन भारत सरकार नहीं  ! प्राकृतिक आपदाओं में मिलने वाली सहायता स्वीकार है भारतीय कानून नहीं  ? केंद्र सरकार के विकास पैकेज मन्जूर हैं केंद्र सरकार नहीं  ?  इलाज के लिए भारतीय डाक्टरों की टीम स्वीकार हैं भारतीय संविधान नहीं ? 
क्यों हमारी सेना के जवान  घाटी में जान लगा देने के बाद भी कोसे  जातें  है  ? क्यों हमारी सरकार आपदाओं में कश्मीरियों की मदद करने के बावजूद उन्हें अपनी सबसे बड़ी दुशमन दिखाई देती है ? अलगाववादी उस घाटी को उन्हीं के बच्चों के खून से रंगने के बावजूद उन्हें अपना शुभचिंतक क्यों दिखाई देते हैं ? 
बात अज्ञानता की है दुषप्रचार की है । 
हमें  कश्मीरी की जनता को जागरूक करना ही होगा। 
अलगाववादियों के दुषप्रचार को रोकना ही होगा। 
कश्मीरी युवकों को अपने  आदर्शों को बदलना ही होगा। 
कश्मीरी जनता को भारत सरकार की मदद स्वीकार करने से पहले भारत की सरकार को स्वीकार करना ही होगा। 
उन्हें सेना की वर्दी पहने  आतंकवादी और एक सैनिक के भेद को समझना ही होगा। 
एक भारतीय सैनिक की इज्जत करना सीखना ही होगा। 
कश्मीरियों को अपने बच्चों के हाथों में कलम चाहिए या बन्दूक यह चुनना ही होगा। 
घाटी में चिनार खिलेंगे या जलेंगे चुनना ही होती। 
झीलें पानी की बहेंगीं या उनके बच्चों के खून की उन्हें चुनना ही होगा। 
यह स्थानीय सरकार की नाकामयाबी कही जा सकती है जो स्थानीय लोगों का विश्वास न स्वयं जीत पा रही है न हिंसा रोक पा रही है। 
चूँकि कश्मीरी जनता के दिल में अविश्वास आज का नहीं है और उसे दूर भी उन्हें के बीच के लोग कर सकते हैं तो यह वहाँ के स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे कश्मीरी बच्चों की लाशों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकनी बन्द करें और कश्मीरी जनता को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में सहयोग करें। 

डाँ नीलम महेंद्र