Friday, 26 August 2016

ये कहाँ आ गए हम

ये  कहाँ आ गए हम ?
“फ़रिश्ता बनने की  चाहत न करें तो बेहतर है , इन्सान हैं  इन्सान ही बन जाये यही क्या कम है  !”
तारीख़ :   25 अगस्त 2016
स्थान   :   ओड़िशा के कालाहांडी जिले का सरकारी अस्पताल
अमंग देवी  टी बी के इलाज के दौरान जीवन से अपनी जंग हार जाती हैं । चूँकि वे एक आदिवासी, नाम , दाना माँझी ' की पत्नी हैं  , एक गुमनाम मौत उन्हें गले लगाती है।

 लेकिन हमारी सभ्यता की खोखली तरक्की  , राज्य सरकारों की कागज़ी योजनाओं ,पढ़े लिखे सफेदपोशों से भरे समाज की पोल खोलती  इस देश में मानवता के पतन की कहानी कहती एक तस्वीर ने उस गुमनाम मौत को अखबारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ बना दिया 
जो जज्बात एक  इंसान की मौत नहीं जगा पाई वो जज्बात एक तस्वीर जगा गई। पूरे देश में हर अखबार में  हर चैनल में  सोशल मीडिया की हर दूसरी पोस्ट में अमंग देवी को अपनी मौत के बाद जगह मिली लेकिन उनके मृत शरीर को एम्बुलेंस में जगह नहीं मिल पाई ।
पैसे न होने के कारण तमाम मिन्नतों के बावजूद जब अस्पताल प्रबंधन ने शव वाहिका उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई तो लाचार दाना माँझी ने अपनी पत्नी के मृत शरीर को कन्धे पर लाद कर अपनी 12 वर्ष की रोती हुई बेटी के साथ वहाँ से 60 कि. मी. दूर अपने गाँव मेलघारा तक पैदल ही चलना शुरू कर दिया और करीब 10 कि.मी. तक चलने के बाद कुछ स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से और खबर मीडिया में आ जाने के बाद उन्हें  एक एम्बुलेंस नसीब हुई।
पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर जिला कलेक्टर का कहना था कि माँझी ने वाहन का इंतजार ही नहीं किया। वहीं ' द टेलीग्राफ ' का कहना है कि एक नई एम्बुलेंस अस्पताल में ही खड़ी होने के बावजूद सिर्फ इसलिए नहीं दी गई क्योंकि किसी ' वी आई पी ' के द्वारा उसका उद्घाटन नहीं हुआ था।इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि ऐसी ही स्थितियों के लिए नवीन पटनायक की सरकार द्वारा फरवरी माह में  'महापरायण ' योजना की शुरुआत की गई थी  । इस योजना के तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त में परिवहन सुविधा दी जाती है।बावजूद इसके एक गरीब पति ' पैसे के अभाव में ' अपनी पत्नी के शव को 60 कि . मी. तक पैदल ले जाने के लिए मजबूर है 
 
अगर परिस्थिति का विश्लेषण किया जाए तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि बात दाना माँझी के पास धन के अभाव की नहीं है बल्कि बात उस अस्पताल प्रबंधन के पास मानवीय संवेदनाओं एवं मूल्यों के अभाव की है  । बात  एक गरीब आदिवासी की नहीं है बात उस तथाकथित सभ्य समाज की है जिसमें एक बेजान एम्बुलेंस को किसी वी आई पी के इंतजार में खड़ा रखना अधिक महत्वपूर्ण लगता है बनिस्पत किसी जरूरतमंद के उपयोग में लाने के।बात उस संस्कृति के ह्रास की है जिस संस्कृति ने भक्त के प्रबल प्रेम के वश में प्रभु को नियम बदलते देखा है, लेकिन उस देश में सरकारी अफसर किसी मनुष्य के कष्ट में भी नियम नहीं बदल पाते । यह कैसा विकास है जिसके बोझ तले इंसानियत मर रही है जो सरकारें अपने आप को गरीबी हटाने और गरीबों के हक के लिए काम करने का दावा करती हैं उन्हीं के शासन में उनके अफसरों द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है।
किसी की  आँख का आंसू 

मेरी आँखों में आ छलके;
किसी की साँस थमते देख
मेरा दिल चले   थम  के;
किसी के जख्म की टीसों पे ;
मेरी रूह तड़प जाये;
किसी के पैर के छालों से
मेरी आह निकल जाये;
प्रभु ऐसे  ही भावो से मेरे इस दिल को तुम भर दो;
मैं कतरा हूँ मुझे  इंसानियत का दरिया तुम कर दो.
किसी का खून बहता देख
मेरा खून जम जाये;
किसी की चीख पर मेरे
कदम उस ओर बढ़ जाये;
किसी को देख कर भूखा
निवाला न निगल पाऊँ;
किसी मजबूर के हाथों की
मैं लाठी ही बन जाऊं;
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो;
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत का दरिया तुम कर दो  ( डॉ  शिखा कौशिक)
बात हमारे देश के एक पिछड़े राज्य ओड़िशा के एक आदीवासी जिले की अथवा सरकार या उसके कर्मचारियों की नहीं है बात तो पूरे देश की है हमारे समाज की है हम सभी की है 
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अगस्त 2016  : भारत की राजधानी दिल्ली 

एक व्यस्त बाजार  , दिन के समय एक युवक सड़क से पैदल जा रहा था और वह अपनी सही लेन में था। पीछे से आने वाले एक लोडिंग औटो की टक्कर से वह युवक गिर जाता है, औटा वाला रुकता है  औटो से बाहर निकल कर अपने औटो को टूट फूट के लिए चेक करके बिना एक बार भी उसकी टक्कर से घायल व्यक्ति को देखे निकल जाता है  । सी सी टीवी फुटेज अत्यंत निराशाजनक है क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक पल रुक घायल की मदद करने के बजाय उसे देखकर सीधे आगे निकलते जाते हैं।
कहाँ जा रहे हैं सब ? कहाँ जाना है ? किस दौड़ में  हिस्सा  ले रहे हैं  ? क्या जीतना चाहते हैं सब ? क्यों एक पल ठहरते नहीं हैं  ? क्यों जरा रुक कर एक दूसरे की तरफ प्यार से देखने का समय नहीं है, क्यों एक दूसरे की परवाह नहीं कर पाते  ,क्यों एक दूसरे के दुख दर्द के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते , क्यों दूर से देख कर दर्द महसूस नहीं कर पाते ? क्यों हम इतने कठोर हो गए हैं कि हमें केवल अपनी चोट  ही तकलीफ देती है  ? क्या हम सभी भावनाशून्य मशीनों में तो तब्दील नहीं हो रहे ?
विकास और तरक्की की अंधी दौड़ में हम समय से आगे निकलने की चाह में मानव भी नहीं रह पाए  । बुद्धि का इतना विकास हो गया कि भावनाएं पीछे रह गईं । भावनाएं ही तो मानव को पशु से भिन्न करती हैं  । जिस विकास और तरक्की की दौड़ में मानवता पीछे छूट जाए , भावनाएँ मृतप्राय हो जांए ,मानव पशु समान भावना शून्य हो जाए उस विकास पर हम सभी को आत्ममंथन करने का समय आ गया है 
डॉ नीलम महेंद्र


Monday, 22 August 2016

जम्मू और लद्दाख भारत में खुश हैं तो कश्मीर क्यों नहीं है

जम्मू और लद्दाख भारत में खुश हैं तो कश्मीर क्यों नहीं है 
"घर को ही आग लग गई घर के चिराग से "
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जुलाई 2016 को कश्मीर के एक स्कूल के प्रिंसिपल का बेटा और हिजबुल मुजाहिदीन का दस लाख रुपए का ईनामी आतंकवादी बुरहान वानी की मौत के बाद से आज तक लगातार सुलगता कश्मीर कुछ ऐसा ही आभास कराता है 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर को मुद्दा बनाने के मकसद से घाटी में पाक द्वारा इस प्रकार की प्रायोजित हिंसा कोई पहली बार नहीं है।

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अगस्त  1947 में भारत की आज़ादी के महज़ दो महीने के भीतर 22 अक्तूबर  1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला करके अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। तब से लेकर आज तक कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच तीन युद्ध हो चुके हैं  1947 , 1965 ,और 1999 में कारगिल। आमने सामने की लड़ाई में हर बार असफल होने पर अब पाक  इस  प्रकार से बार बार पीठ पीछे वार करके   अपने नापाक  इरादों को सफल करने की असफल कोशिशों में लगा है   

12 अगस्त 2016 , प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है। वह जम्मू कश्मीर के चार हिस्सों  : जम्मू  , कश्मीर घाटी  , लद्दाख और पीओके में शामिल है और बातचीत में इन सभी को शामिल करना होगा  । इससे पहले भारतीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी इसी प्रकार का वक्तव्य दे चुके हैं 
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अक्तूबर 1947 से इस बात को कहने के लिए इतने साल लग गए  ।पहली बार भारत ने कश्मीर मुद्दे पर दिए जाने वाले अपने बयान में मूलभूत बदलाव किया है  ।भारत सरकार ने पहली बार कश्मीर मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाये आक्रामक शैली अपनाई है .प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने  कश्मीर मुद्दे पर पाक को स्पष्ट रूप से यह सन्देश दे  दिया है  कि अब बात केवल पाक अधिकृत कश्मीर पर एवं घाटी में पाक द्वारा प्रयोजित हिंसा  पर  ही होगी .साथ ही  बलूचिस्तान एवं पी ओ के में  रहने वाले लोगों की  दयनीय स्थिति एवं वहाँ होने वाले  मानव अधिकारों के हनन के मुद्दे को भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठा कर न सिर्फ भारतीय राजनीति में  बल्कि पाक एवं वैश्विक स्तर पर  भी राजनैतिक परिद्रश्य बदल दिया है .

बीते अक्तूबर में यूनाइटेड नेशनस जनरल एसेम्बली में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से कहा था कि मुद्दा  "पीओके " है न कि जम्मू कश्मीर।
कश्मीर  हमारे देश की जन्नत है भारत का ताज है और हमेशा रहेगा लेकिन क्यों  आज तक   हमने कभी अपने ताज के उस हिस्से के बारे में जानने की कोशिश नहीं  करी जो पाकिस्तान के कब्जे में है  ? हमारे अपने ही देश से कश्मीर में मानव अधिकार हनन का मुद्दा कई बार उठा है लेकिन क्या कभी एक बार भी राष्ट्रीय अथवा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पाक अधिकृत कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन पर चर्चा हुई है  ? इसे पाक सरकार की कूटनीतिक चातुरता और अब तक की भारतीय सरकारों की असफलता ही कहा जा सकता है कि पाक द्वारा लगातार प्रायोजित आतंकवाद , सीमा पर गोली बारी और घुसपैठ के कारण कश्मीर में होने वाली मासूमों की मौतों के बावजूद अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर एक मुद्दा है लेकिन पीओके पर किसी का कोई बयान नहीं आता  , उसकी कोई चर्चा नहीं होती    
दरअसल कश्मीर समस्या की जड़ को समझें तो शुरुआत से ही यह एक राजनैतिक समस्या रही है जिसे पंडित नेहरू ने यू एन में ले जाकर एक अन्तराष्ट्रीय समस्या में तब्दील कर दिया था । यह एक राजनैतिक उद्देश्य से प्रायोजित समस्या है जिसका हल राजनीति कूटनीति और दूरदर्शिता से ही निकलेगा।
कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में स्वीकार किया है कि कुल दो प्रतिशत लोग हैं जो कश्मीर की आज़ादी की मांग करते हैं और अस्थिरता फैलाते हैं जबकि वहाँ का आम आदमी 

शांति चाहता है रोजगार चाहता है तरक्की चाहता है और अपने बच्चों के लिए एक सुनहरा भविष्य चाहता है।कहने की आवश्यकता नहीं कि यह दो प्रतिशत लोग वे ही हैं जो पाकिस्तान के छिपे एजेन्डे  को ही आगे बढ़ा रहे हैं । प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा कि जिन हाथों में लैपटॉप होने चाहिए थे उनमें पत्थर थमा दिए अब उन हाथों से पत्थर छुड़ा कर  लैपटॉप थमाने की राह निश्चित ही आसान तो नहीं होगी।
कश्मीर भारत के उत्तरी इलाक़े का वो राज्य है जिसमें जम्मू  , कश्मीर और लद्दाख आता है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि आज़ादी के बाद से ही जम्मू और लद्दाख भारत में खुश हैं तो कश्मीर क्यों नहीं है  ?
क्यों आज कश्मीर का उल्लेख भारत के एक राज्य के रूप में न होकर समस्या के रूप में होता है।
क्यों आज कश्मीर की  जब हम बात करते हैं तो विषय होते हैं आतंकवाद  , राजनीति  , कश्मीरी पंडित या लाइन आफ कंट्रोल पर होने वाली गोलाबारी ? वहाँ की खूबसूरती , वहाँ का पर्यटन उद्योग क्यों नहीं होता ? हम केवल अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले कश्मीर की बात करते आये हैं वो भी बैकफुट पर  ! लेकिन  क्या हमने कभी पाक अधिकृत कश्मीर की बात करी ? कश्मीर में आतंकवादियों तक के मानव अधिकारों की बातें तो बहुत हुई लेकिन क्या कभी पीओके अथवा तथाकथित आज़ाद कश्मीर में रहने वाले कश्मीरियों  की हालत के बारे में हमने जानने की कोशिश की ? क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की कि  कितना " आज़ाद " है
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आज़ाद कश्मीर ' ! हाल ही में ब्रिटिश थिंक टैंक "चथम हाउस  " द्वारा  पीओके में कराए गए एक सर्वेक्षण में यह तथ्य निकल कर आया है कि वहाँ के 98% स्थानीय कश्मीरी पाकिस्तान में विलय नहीं चाहते हैं। 
कश्मीरी नागरिक अरीफ शहीद द्वारा उर्दू में लिखी उनकी पुस्तक  "कौन आज़ाद कौन ग़ुलाम " में उन्होंने तथाकथित आज़ाद कश्मीरियों के दर्द को बखूबी प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार भारत में रहने वाले कश्मीरी आर्थिक एवं राजनैतिक रूप से उसी प्रकार आज़ाद हैं जैसे भारत के किसी अन्य राज्य के लोग  । किन्तु पाक अधिकृत कश्मीर में आने वाले गिलगित और बाल्टिस्तान के लोगों की स्थिति बेहद दयनीय है।
जहाँ भारत सरकार आज तक इस बात को सुनिश्चित करती है कि किसी भी दूसरे राज्य का व्यक्ति कश्मीर में रह नहीं सकता  , वहाँ का नागरिक नहीं बन सकता  , वहीं दूसरी ओर पीओके आतंक का अड्डा बन चुका है  । वहाँ पर आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैम्प चलते हैं और वह लश्कर ए तैयबा का कार्य स्थल है।इन ट्रेनिंग कैम्पों के कारण वहाँ का स्थानीय नागरिक बहुत परेशान है ।उनमें से कुछ ने तो वहाँ से पलायन कर लिया है और भारत में शरणार्थी बन गए हैं । सबसे दुखद पहलू यह है कि 26/11 के आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाला अजमल कसाब की ट्रेनिंग भी यहीं हुई थी 
आज जब पश्चिमी मीडिया और भारतीय मीडिया के कुछ गिने चुने लोगों द्वारा पीओके की सच्चाई दुनिया के सामने आ रही है तो प्रश्न यह उठता है कि अगर अब तक इस मुद्दे की अनदेखी एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था तो यह भारत के ख़िलाफ एक बहुत ही भयानक साजिश थी लेकिन यदि यह नादानी अथवा अज्ञानता वश हुआ तो यह हमारी अत्यधिक अक्षमता ही कही जाएगी।
पाकिस्तान द्वारा अन्तराष्ट्रीय मंचों पर बार बार कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग उठाई जाती रही है । उसकी इस मांग पर अखबारों एवं टीवी चैनलों पर अनेकों वाद विवाद हुए लेकिन यह भारतीय मीडिया एवं अब तक की सरकारों की अकर्मण्यता ही है कि आज तक  13 अगस्त  1948 के उस यू एन  रेसोल्यूशन का पूरा सच देश के सामने नहीं रखा गया कि किसी भी प्रकार के जनमत संग्रह के बारे में  'सोचने ' से भी पहले पाकिस्तान को कश्मीर के उस हिस्से को खाली करना होगा। 
समस्या कोई भी हो हल निकाला जा सकता है आवश्यकता इच्छाशक्ति की होती है। यह  सर्वविदित है कि कश्मीर मुद्दा पाक नेतृत्व के लिए संजीवनी बूटी का काम करता है  इसी मुद्दे के सहारे वे सरकारें बनाते हैं और इसी के सहारे अपनी नाकामयाबियों से वहाँ की जनता का ध्यान हटाते हैं तो कश्मीर समस्या का हल पाक कभी  चाहेगा नहीं , सबसे पहले इस तथ्य को भारत को समझना चाहिए । अत:  इस समस्या का समाधान तो भारत को ही निकालना होगा।
सबसे पहले भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान की रोटियाँ कश्मीर की आग से सिकनी बन्द हों  । कुछ ऐसी कूटनीति करनी होगी कि जिस आग से वह अपना घर आज तक रोशन करता आया है  , वही आग उसका घर जला दे । कश्मीर का राजनैतिक लाभ तो अब तक बहुत उठा लिया गया है अब समय है राजनैतिक हल निकाल कर अपने ताज के टूटे  हुए हिस्से को वापस लाने का  ।


डाँ नीलम महेंद्र 

Sunday, 7 August 2016

याद करो कुर्बानी

याद करो कुर्बानी 
'' शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा ।
 
कभी वह दिन भी आयेगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी जब अपना आसमां होगा ।।''
पंडित जगदम्बा प्रसाद मिश्र की इस कालजायी कविता के ये शब्द हमें उन दिनों में आज़ादी की महत्ता एवं उसे प्राप्त करने के लिए चुकाई जाने वाली कीमत का एहसास कराने के लिए काफी हैं ।
यह वह दौर था जब देश का हर बच्चा बूढ़ा और जवान  देश प्रेम की अगन में जल रहे थे।

गोपाल दास व्यास द्वारा सुभाष चन्द्र बोस के लिए लिखी गई कविता के कुछ अंश आगे प्रस्तुत हैं जो उस समय देश के नौजवानों को उनके जीवन का लक्ष्य दिखाती थीं 
  "
वह ख़ून कहो किस मतलब का
   
जिस में उबाल का नाम नहीं
   
वह ख़ून कहो किस मतलब का
    
आ सके जो देश के काम नहीं "
इस  समय  जब देश का हर वर्ग देश के प्रति अपना योगदान दे रहा था तब हिन्दी सिनेमा भी पीछे नहीं था। 1940 में निर्देशक ज्ञान मुखर्जी की फिल्म  "बन्धन  " के गीत  " चल चल रे नौजवान  " ने आज़ादी के दीवानों में एक नया जोश भर दिया था।
याद कीजिए फिल्म  "जागृति  " का गीत  " हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के " हमारे बच्चों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराता था ।

ऐसे अनेकों गीत हैं जो देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत हैं । देश के बच्चों एवं युवाओं में इस भावना की अलख को जगाए रखने में देश भक्ति से भरे गीत  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता।
राम चंद्र द्विवेदी / कवि प्रदीप द्वारा लिखित गीत
''
ऐ मेरे वतन के लोगों  , ज़रा आँख में भर लो पानी  , जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी  ''   सुनने से आज भी  आँख नम हो जाती है 
आज़ादी के आन्दोलन में उस समय की युवा पीढ़ी कि  भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। शहीद भगत सिंह  ,चन्द्र शेखर आजाद , अश्फाक उल्लाह ख़ान जैसे युवाओं ने अपनी जान तक न्योछावर कर दी थी देश के लिए। ये जांबाज सिपाही भी अपनी भावनाओं को गीतों में व्यक्त करते हुए कहते थे ,
"
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है।" अथवा
"
मेरा रंग दे बसन्ती चोला " 
लेकिन आज उसी युवा पीढ़ी को न जाने किसकी नज़र लग गई । बेहद अफसोस होता है जब दिल्ली के हाई कोर्ट की जस्टिस प्रतिभा रानी एक मुकदमे के दौरान कहती हैं  " छात्रों में इंफेक्शन फैल रहा है रोकने के लिए ओपरेशन जरूरी है।" यह टिप्पणी आज के युवा की दिशा और दशा दोनों बताने के लिए काफी है।
शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में 9 अगस्त से 23 अगस्त तक " आज़ादी 70 याद करो कुर्बानी  " नाम से स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में 15 दिनों का उत्सव मनाने का फैसला लिया है ताकि देश के युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत हो सके ।आने वाली पीढ़ी में मातृभूमि के प्रति लगाव पैदा कर सकें।उन्होंने ऐलान किया है कि अब देश में नहीं होगा कोई आतंकी बुरहान पैदा  , हम बनाएंगे देश भक्तों की नई फौज 
बहुत सही सोच है और आज की आवश्यकता भी है क्योंकि इतिहास गवाह है कि जिस देश के नागरिकों की अपने देश के प्रति प्रेम व सम्मान की भावना ख़त्म हो जाती है उस दिन देश एक बार फिर गुलाम बन जाता है।
दरअसल बात केवल युवाओं की नहीं है हम सभी की है  । आज हम सब देश की बात करते हैं लेकिन यह कभी नहीं सोचते कि देश   है क्या  ? केवल कागज़ पर बना हुआ एक मानचित्र अथवा धरती का एक अंश  ! जी नहीं देश केवल भूगोल नहीं है वह केवल सीमा रेखा के भीतर सिमटा ज़मीन का टुकड़ा नहीं है ! वह तो भूमि के उस टुकड़े पर रहने वालों की कर्मभूमी हैं  , जन्म भूमि है,उनकी पालनहार है , माँ है , उनकी आत्मा है  ।देश बनता है वहाँ रहने वाले लोगों से ,आप से  , हम से  ,बल्कि हम सभी से ।
देश की आजादी के 70 वीं समारोह पर यह बातें और भी प्रासंगिक हो उठती हैं । आज यह जानना आवश्यक है कि अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने राष्ट्रपति बनने के बाद अपने प्रथम भाषण में कहा था  " अमेरिका वासियों तुम यह मत सोचो कि अमेरिका तुम्हारे लिए क्या कर रहा है अपितु तुम यह सोचो कि तुम अमेरिका के लिए क्या कर रहे हो  " 
आज हम सबको भी अपने देश के प्रति इसी भावना के साथ आगे बढ़ना होगा।
चार्ल्स एफ ब्राउन ने कहा था  " हम सभी महात्मा गांधी नहीं बन सकते लेकिन हम सभी देशभक्त तो बन ही सकते हैं  "
आज देश को जितना खतरा  दूसरे देशों से है उससे अधिक खतरा देश के भीतर के असामाजिक तत्वों से है जो देश को खोखला करने में लगे हैं ।
आज स्वतंत्रता दिवस का मतलब  ध्वजारोहण  , एक दिन की छुट्टी और टीवी तथा एफ एम पर दिन भर चलने वाले देश भक्ति के गीत  ! थोड़ी और देश भक्ति दिखानी हो तो फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया में देशभक्ति वाली दो चार पोस्ट डाल लो या अपनी प्रोफाइल पिक में भारत का झंडा लगा लो । सबसे ज्यादा देशभक्ति दिखाई देती है भारत पाक क्रिकेट मैच के दौरान  , अगर भारत जीत जाए तो पूरी रात पटाखे चलते हैं लेकिन यदि हार जाए क्रिकेटरों की शामत आ जाती है।  सोशल मीडिया पर हर कोई देश भक्ति में डूबा हुआ दिखाई देता है।
लेकिन जब देश के लिए कुछ करने की बात आती है तो हम ट्रैफिक सिग्नलस जैसे एक छोटे से कानून का पालन भी नहीं करना चाहते क्योंकि हमारा एक एक मिनट बहुत कीमती है। गाड़ी को पार्क करना है तो हम अपनी सुविधा से करेंगे कहीं भी क्योंकि हमारे लिए कानून से ज्यादा जरूरी वही है। कचरा फैंकना होगा तो कहीं भी फेंक देंगे चलती कार बस या ट्रेन कहीं  से भी और कहाँ गिरा हमें उससे मतलब नहीं है बस हमारे आसपास सफाई होनी चाहिये देश भले ही गंदा हो जाए ! 
देश  चाहे किसी भी विषय पर कोई भी कानून बना ले हम कानून का ही सहारा लेकर और कुछ  " ले दे कर " बचते आए हैं और बचते रहेंगे क्योंकि देश प्रेम अपनी जगह है लेकिन हमारी सुविधाएं देश से ऊपर हैं। इस सोच को बदलना होगा। 
इकबाल का  तराना ए हिन्द को जीवंत करना होगा
"
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा "
अपने हिन्दुस्तान को सारे जहाँ से अच्छा हमें मिलकर बनाना ही होगा , इसके गुलिस्तान को फूलों से सजाना ही होगा।
देश हमें स्वयं से पहले रखना ही होगा।

डाँ नीलम महेंद्र