Friday, 23 December 2016

“हम भारत के लोग “ और नेताओं के बीच यह अंतर क्यों

“हम भारत के लोग “ और नेताओं के बीच यह अंतर क्यों

लोकतंत्र में  देश  की प्रजा उसका शरीर होती है लोकतंत्र उसकी आत्मा जबकि लोगों के लिए  , लोगों के ही द्वारा  चुनी गई सरकार उस देश का मस्तिष्क होता है उसकी बुद्धि होती है 
यह लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार ही देश की विश्व में दिशा और दशा तय करती है ।
यह एक अनुत्तरित प्रश्न है कि हमारी आज तक की सरकारों ने लोकतंत्र की इस परिभाषा और उसके मकसद को किस हद तक पूरा किया है 
सरकार और उसके पदाधिकारियों ने जो कि देश के मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करते हैं आजादी के बाद से ही देश के भविष्य को ताक पर रखकर स्वयं अपना भविष्य संवारने का कार्य किया  परिणाम स्वरूप आज सम्पूर्ण सरकारी मशीनरी सवालों के घेरे में है 
2014 में माननीय नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से उन्होंने सम्पूर्ण देश में एक बदलाव की पहल की। शुरुआत स्वच्छता अभियान शौचालयों निर्माण जैसे कदमों से हुई 
इस देश के भौतिक स्वरूप की सफाई के बाद अब उसकी आत्मा और उसके मस्तिष्क की सफाई की बारी है  ।अब उस लोकतंत्र की जड़ों की सफाई होनी चाहिए जिसमें चुनावों में जातीय गणित और काले धन की दीमक लग चुकी है।
उस सरकार रूपी मस्तिष्क की सफाई होनी चाहिए जो घोटालों के बोझ तले दब चुकी  है।

भ्रष्टाचार एवं काले धन पर प्रहार करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने जब 8 नवम्बर को नोट बंदी की घोषणा की तो देश की जनता ने उनके इस निर्णय का स्वागत किया ।
पूरे देश में आम आदमी को एक आस बन्धी कि शायद काला धन और भ्रष्टाचार  ,जो इस देश के साथ साथ आम आदमी के जीवन को भी दीमक की तरह खाए जा रहे थे  ,अब खत्म होगा 
पूरी सहनशीलता के साथ इस देश के हर  नागरिक ने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन में अपना सहयोग दिया  लेकिन जैसे जैसे दिन निकलते जा रहे हैं वैसे वैसे वह अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है 
उसे 'आम, द मैंगो पीपल ' और  'ख़ास , द वी आई पी ' के बीच का अंतर एक बार फिर समझ में आने लगा 
उसे जनता और नेता के बीच का अंतर एक बार फिर समझ में आने लगा
उसे व्यापारी और ब्यूरोक्रे्ट्स में अंतर समझ में आने लगा
उसे सिस्टम के अन्दर और सिस्टम के बाहर होने का अंतर समझ में आने लगा
उसे  ' कानून से बड़ा कोई नहीं है  ' इस बात का व्यवहारिक अर्थ समझ में आने लगा
उसे  'काले धन ' का 'अर्थ ' भी अब शायद समझ में आने लगा है
वह समझता था कि काला धन केवल वो पैसा नहीं है जो एक व्यापारी टैक्स के रुप में बचाता है  , उसकी नज़र में  तो काले धन का यह एक छोटा सा हिस्सा मात्र था । वो यह नहीं समझ पा रहा कि जो पैसा वो सरकारी विभागों में घूस देने के बाद अपनी व्यापार में से टैक्स के रूप में बचा रहा था उससे आतंकवाद कैसे पनप सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री ने तो कहा था कि काले धन का उपयोग देश के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में प्रयोग होता है   वह आदमी जो लाइन में खड़ा भ्रष्टाचार खत्म होने की आशा में था वह तो छोटी मोटी टैक्स की चोरी जरूर करता था लेकिन आतंकवाद का मददगार तो कभी नहीं था 
वह यह तो समझ पा रहा है कि सबकुछ डीजिटल हो जाने से एवं कैशलैस इकोनोमी से व्यापार में पारदर्शिता आ जाएगी लेकिन क्या इससे देश में व्याप्त  पूरा भ्रष्टाचार और काला धन खत्म हो जाएगा  ?
इसका मतलब काला धन केवल देश के व्यापारियों की वजह से था  ?
और भ्रष्टाचार  ! उसे भी यही व्यापारी करता था जबरदस्ती घूस दे देकर ?
इस देश को आज भी सरकार और उसकी मशीनरी के कामों में पारदर्शिता का इंतजार है।
कितना हास्यास्पद है कि 8 नवंबर से लेकर

आज तक देश में काले धन और भ्रष्टाचार पर वार करने के उद्देश्य से उठाए गए कदम केवल और केवल आम आदमी से टैक्स वसूली को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं चाहे वो कैशलैस का कान्सेप्ट  हो या फिर बैंकों में रकम जमा करना हो  । उसमें भी कानून का पालन केवल छोटे कारोबारियों या फिर छोटी नौकरी करने वाले लोगों तक सीमित है क्योंकि बड़े बड़े व्यापारी या फिर औद्योगिक घराने अथवा कारपोरेट हाउस और ब्यूरोक्रेट्स का काला धन तो स्वयं बैंक वाले ही सफेद कर चुके हैं 
रही बात नेताओं की  , तो राजनैतिक पार्टियों को आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 ए के तहत न सिर्फ आयकर से छूट प्राप्त है बल्कि चंदा लेने की कोई सीमा नहीं है और आज की स्थिति में भी उनके लिए अपने एकाउंट में पैसा जमा करने की भी कोई लिमिट नहीं है और न ही उनसे कोई पूछताछ की जाएगी  जबकि  एक आम आदमी के खाते में 2.5 लाख से अधिक की हर रकम का उसे जवाब देना होगा।
राजनैतिक दल तो ऐसी किसी जवाबदेही की सीमा में ही नहीं है क्योंकि वे आरटीआई के दायरे में ही नहीं हैं 
हमारे संविधान की शुरुआत , " हम भारत के लोग  " से होती है और उसमें इस देश के हर नागरिक के लिए समान कानून हैं और कानून से ऊपर कोई नहीं है तो फिर हमारे राजनेता और उनके दल इस देश के कानून से ऊपर कैसे हो सकते हैं 
आयकर छूट के लिए राजनैतिक दलों को भारतीय लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29 ए के तहत रजिस्टर्ड होना ज़रूरी है । कोई आश्चर्य नहीं कि भारत में 1900 से अधिक राजनैतिक दल पंजीकृत हैं जिसमें से 400 ने आज तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है।
और वैसे भी किस कानून की बात करते हैं  " हम भारत के लोग  " ?
वो कानून जो 8 नवंबर के बाद बैंक वालों की मिली भगत से तोड़े गए !
या फिर उस कानून की जिसको संसद में हमारे ही द्वारा चुने गए सांसद संविधान में  संशोधन करा के राजनैतिक पार्टियों को तरह तरह की छूट दिलवाते हैं  !
या फिर वो कानून जिन्हें पैसे वालों के हाथों की कठपुतली बनते आज तक देखते आया है यह देश  !
भ्रष्टाचार हमारे देश में आज कोई समस्या नहीं वरन् स्वयं सिस्टम बन चुका है
क्या हमारे प्रधानमंत्री जो कि संघ के एक मामूली कार्यकर्ता से यहाँ तक पहुँचे हैं इस तथ्य से नावाकिफ हैं कि भ्रष्टाचार किस हद तक सिस्टम में शामिल हो चुका है  ?
आज जब पूरे देश के सामने बैंक अधिकारियों द्वारा  करोड़ों के काले धन को सफेद करने के रोज नए मामले सामने आ रहे हैं तो इस देश का आम आदमी क्या समझे या फिर वह अपने आप को क्या समझाए ?
अगर प्रधानमंत्री की नोट बंदी की नीयत सही थी  तो आज देश का आम आदमी उस भ्रष्टाचार रूपी दानव पर प्रहार चाहता है जिसने अपनी शक्ति बैंकों में दिखाई  ,
  वह उस काले धन पर वार चाहता है जो इस देश के एक छोटे से छोटे सरकारी बाबू तक के पास से मिलता है किसी राज्य के मुख्य सचिव की बात तो छोड़ ही दीजिए।
  वह उस काले धन पर वार चाहता है जो इस देश के नेताओं और उनकी राजनैतिक पार्टियों के पास है।
जब तक सरकार बनाने वाले नेताओं को इस आंदोलन से मुक्त रखा जाएगा
जब तक सरकार के नौकरशाहों को सिस्टम के भीतर रहने के कारण कानून से खेलने की छूट दी जाएगी इस देश से भ्रष्टाचार और काला धन खत्म करने की बात एक बार फिर इस देश की भोली भाली जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ के अलावा और कुछ नहीं होगा 
जब तक इस देश की आत्मा ( चुनाव) और उसके मस्तिष्क ( सरकार और उसकी मशीनरी)  की सफाई नहीं होगी  केवल शरीर  ( देश की जनता) को साफ करने से कुछ नहीं होगा।
क्योंकि प्रधानमंत्री शायद इतना तो समझते ही होंगे कि जब शरीर मस्तिष्क के आदेश मानने से मना करता देता है तो उस अवस्था को पक्षाघात अथवा पैरेलिसिस कहते हैं एक प्रकार का विद्रोह जो कि घातक सिद्ध होता है 
तो बिना आत्मा और मस्तिष्क की सफाई के केवल बाहरी  शरीर की सफाई करके इस देश की जनता जिसने अभी तक सहनशीलता का परिचय दिया है उससे आखिर इस सहनशीलता की अपेक्षा आखिर कब तक  ?

डॉ नीलम महेंद्र

Sunday, 18 December 2016

क्यों न स्त्री होने का उत्सव मनाया जाए

क्यों न स्त्री होने का उत्सव मनाया जाए 



स्त्री ईश्वर की एक खूबसूरत कलाकृति  !
यूँ तो समस्त संसार एवं प्रकृति ईश्वर की बेहतरीन
रचना है किन्तु स्त्री उसकी अनूठी रचना है  , उसके दिल के बेहद करीब 
इसीलिए तो उसने उसे उन शक्तियों से लैस करके इस धरती पर भेजा जो स्वयं उसके पास हैं  मसलन प्रेम एवं ममता से भरा ह्दय , सहनशीलता एवं धैर्य से भरपूर व्यक्तित्व  ,क्षमा करने वाला ह्रदय , बाहर से फूल सी कोमल किन्तु भीतर से चट्टान सी इच्छाशक्ति से परिपूर्ण और सबसे महत्वपूर्ण , वह शक्ति जो एक महिला को ईश्वर ने दी है  , वह है उसकी सृजन शक्ति 
सृजन  , जो केवल ईश्वर स्वयं करते हैं  ,मनुष्य का जन्म जो स्वयं ईश्वर के हाथ है उसके धरती पर आने का जरिया स्त्री को बनाकर उस पर अपना भरोसा जताया ।
उसने स्त्री और पुरुष दोनों को अलग अलग बनाया है और वे अलग अलग ही हैं 
अभी हाल ही में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने लिंग भेद खत्म करने के लिए  'ही' और 'शी' के स्थान पर' ज़ी ' शब्द का प्रयोग करने के लिए कहा है 
यूनिवर्सिटी ने स्टूडेन्ट्स के लिए नई गाइड लाइन जारी की है  'ज़ी' शब्द का प्रयोग अकसर ट्रांसजेन्डर लोगों द्वारा किया जाता है  ।यूनिवर्सिटी का कहना यह है कि इससे ट्रांसजेन्डर स्टूडेन्ट्स असहज महसूस नहीं करेंगे साथ ही लै्गिक समानता भी आएगी तो वहाँ पर विषय केवल स्त्री पुरुष नहीं वरन् ट्रान्स्जेन्डरस में भी लिंग भेद खत्म करने के लिए उठाया गया कदम है 
समाज से लिंग भेद खत्म करने के लिए किया गया यह कोई पहला प्रयास  नहीं है ।लेकिन विचार करने वाली बात यह है कि इतने सालों से सम्पूर्ण विश्व में इतने प्रयासों के बावजूद आज तक तकनीकी और वैज्ञानिक तौर पर इतनी तरक्की के बाद भी महिलाओं की स्थिति आशा के अनुरूप क्यों नहीं है  ? प्रयासों के अनुकूल परिणाम प्राप्त क्यों नहीं हुए  ?
क्योंकि इन सभी प्रयासों में स्त्री ने सरकारों और समाज से अपेक्षा की किन्तु जिस दिन वह खुद को बदलेगी , अपनी लड़ाई स्वयं लड़ेगी वह जीत जाएगी 
महिला एवं पुरुषों की समानता  , महिला सशक्तिकरण  , समाज में उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए भारत समेत सम्पूर्ण विश्व में अनेकों प्रयास किया गए हैं 

महिलाएं भी स्वयं अपना मुकाबला पुरुषों से करके यह सिद्ध करने के प्रयास करती रही हैं कि वे किसी भी तरह से पुरुषों से कम नहीं हैं 
भले ही कानूनी तौर पर उन्हें समानता के अधिकार प्राप्त हैं किन्तु क्या व्यवहारिक रूप से समाज में महिलाओं को समानता का दर्जा हासिल है  ?
केवल लड़कों जैसे जीन्स शर्ट पहन कर घूमना या फिर बाल कटवा लेना अथवा स्कूटर बाइक कार चलाना , रात को देर तक बाहर रहने की आजादी जैसे अधिकार मिल जाने से महिलाएँ  पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त कर लेंगी  ? इस प्रकार की बराबरी करके महिलाएँ स्वयं अपना स्तर गिरा लेती हैं।
हनुमान जी को तो   उनकी शक्तियों का एहसास जामवंत जी ने कराया था  , लेकिन आज महिलाओं को  अपनी शक्तियों एवं क्षमताओं का एहसास स्वयं  कराना होगा उन्हें यह समझना होगा कि शक्ति का स्थान शरीर नहीं ह्दय होता है , शक्ति का अनुभव एक मानसिक अवस्था है , हम उतने ही शक्तिशाली होते हैं जितना कि हम स्वयं को समझते हैं 
जब ईश्वर ने ही दोनों को एक दूसरे से अलग बनाया है तो  यह विद्रोह वह समाज से नहीं स्वयं ईश्वर से कर रही हैं 
यह  हर स्त्री के समझने का विषय है कि
स्त्री की पुरुष से भिन्नता ही उसकी शक्ति है उसकी खूबसूरती है उसे वह अपनी शक्ति के रूप में ही स्वीकार करे अपनी कमजोरी न बनाए 
अत: बात समानता की नहीं स्वीकार्यता की हो  !
बात 'समानता ' के अधिकार के बजाय " सम्मान के अधिकार" की हो ।
और इस सम्मान की शुरूआत स्त्री को ही करनी होगी   स्वयं से 
सबसे पहले वह अपना खुद का सम्मान करे अपने स्त्री होने का उत्सव मनाए ।
स्त्री यह अपेक्षा भी न करे कि उसे केवल इसलिए सम्मान दिया जाए क्योंकि वह एक स्त्री है  ,
यह सम्मान   किसी संस्कृति या कानून अथवा समाज से भीख में मिलने वाली भौतिक चीज़ नहीं है 
स्त्री समाज को अपने आस्तित्व का एहसास कराए कि वह केवल एक भौतिक शरीर  नहीं वरन् एक बौद्धिक शक्ति है , एक  स्वतंत्र आत्मनिर्भर व्यक्तित्व है जो अपने परिवार और समाज की शक्ति हैं न कि कमजोरी  जो सहारा देने वाली है न कि सहारा लेने वाली ।
सर्वप्रथम वह खुद को अपनी देह से ऊपर उठकर स्वयं स्वीकार करें तो ही वे इस देह से इतर अपना आस्तित्व समाज में स्वीकार करा पाएंगी 
हमारे समाज में ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जिन्होंने इस पुरुष प्रधान समाज में भी मुकाम हासिल किए हैं  , इंदिरा गाँधी  चन्दा कोचर  इंन्द्रा नूयी  सुषमा स्वराज  , जयललिता  अरुंधती भट्टाचार्य , किरण बेदी , कल्पना चावला आदि 
स्त्री के  स्वतंत्र सम्मान जनक आस्तित्व की स्वीकार्यता  एक मानसिक अवस्था है एक विचार है एक एहसास है एक   जीवनशैली है जो जब संस्कृति में परिवर्तित होती है जिसे  हर सभ्य समाज   अपनाता है तो निश्चित ही यह सम्भव हो सकता है।
बड़े से बड़े संघर्ष की शुरुआत  पहले कदम से होती है और जब वह बदलाव  समाज के विचारों  आचरण एवं नैतिक मूल्यों से जुड़ा हो तो इस परिवर्तन की शुरुआत समाज की इस सबसे छोटी इकाई से अर्थात् हर एक परिवार से ही हो सकती है 
यह एक खेद का विषय है कि भारतीय संस्कृति में  महिलाओं को देवी का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद हकीकत में महिलाओं की स्थिति दयनीय है 
आज भी कन्या भ्रूण हत्याएँ हो रही हैं  , बेटियाँ दहेज रूपी दानव की भेंट चढ़ रही हैं  कठोर से कठोर कानून इन्हें नहीं रोक पा रहे हैं  तो बात कानून से नहीं बनेगी 
हर व्यक्ति को हर घर को हर बच्चे को समाज की  छोटी से छोटी ईकाई को इसे अपने विचारों में अपने आचरण में अपने व्यवहार में अपनी जीवन शैली में समाज की संस्कृति में शामिल करना होगा।
यह समझना होगा कि बात समानता नहीं सम्मान की है
तुलना नहीं स्वीकार्यता की है
स्त्री परिवार एवं समाज का हिस्सा नहीं पूरक है।
अत: सम्बोधन भले ही बदल कर 'ज़ी' कर दिया जाए लेकिन ईश्वर ने जिन नैसर्गिक गुणों के साथ  "ही" और  "शी" की रचना की है उन्हें न तो बदला जा सकता है और न ही ऐसी कोई कोशिश की जानी चाहिए 
डाँ नीलम महेंद्र