Tuesday, 21 November 2017

खुशियों का पैमाना बनती जा रही शराब

खुशियों का पैमाना बनती जा रही शराब


वैसे तो हमारे देश में अनेक समस्याएँ हैं जैसे गरीबी बेरोजगारी भ्रष्टाचार आदि लेकिन एक समस्या जो हमारे समाज को दीमक की तरह खाए जा रही है,वो है शराब।
दरअसल आज इसने हमारे समाज में जाति, उम्र, लिंग, स्टेटस, अमीर, गरीब,हर प्रकार के बन्धनों को तोड़ कर अपना एक ख़ास मुकाम बना लिया है।
समाज का हर वर्ग आज इसकी आगोश में है।
अब यह केवल गम भुलाने का जरिया नहीं है,बल्कि खुशियों को जाहिर करने का पैमाना भी बन गया है।
आनंद के क्षण, दोस्तों का साथ, किसी भी प्रकार का सेलिब्रोशन,कोई भी पार्टी, जन्मदिन हो या त्यौहार ये सब पहले बड़ों के आशीष और ईश्वर को धन्यवाद देकर मनाए जाते थे लेकिन आज शराब के बिना सब अधूरे हैं।
हमारे समाज की बदलती मानसिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शराब ही इस पृथ्वी की एकमात्र चीज़ है जिसके लिए इसे न पीने वाले से दुनिया भर के सवाल पूछे जाते हैं और उस बेचारे को इसे न पीने के अनेकों तर्क देने पड़ते हैं।
कारण ,विज्ञापनों के मायाजाल और उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारे जीवन की परिभाषाएँ ही बदल दी हैं।

कुछ मीठा हो जाए, ठंडा मतलब कोका कोला, खूब जमेगा रंग जब मिलेंगे तीन यार,जैसी बातें जब वो लोग कहते हैं जिन्हें आज का युवा अपना आइकान मानता हैं तो उसका असर हमारे बच्चों पर कितना गहरा पड़ता है यह इन उत्पादों की वार्षिक सेल रिपोर्ट बता देती है।
और इस सबका हमारी संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ रहा है वो आज के भौतिवादी युग में जीवन जीने के इस आधुनिक मंत्र से लगाया जा सकता है कि, "जिंदगी न मिलेगी दोबारा" इसलिए  "जी भर के जी ले मेरे यारा"
क्या हम लोग समझ पा रहे हैं कि इस नए मंत्र से इन कम्पनियों का बढ़ता मुनाफ़ा हमारे समाज के घटते स्वास्थ्य और चरित्र के गिरते स्तर का द्योतक बनता जा रहा है?
विभिन्न अध्ययनों से यह बात साबित हो चुकी है कि  हमारे आस पास बढ़ते बलात्कार और अपराध का एक महत्वपूर्ण कारण शराब है।
कितनी ही महिलाओं और बच्चों को शराब का नशा वो जख्म दे गया जिनके निशान उनके शरीर पर से समय ने भले ही मिटा दिए हों लेकिन रूह तो आज भी घायल है। (यह सिद्ध हो चुका है कि घरेलू हिंसा में शराब एक अहम कारण है)
कितने बच्चे ऐसे हैं जिनका पिता के साथ प्यार दुलार का उनका हक शराब ने ऐसा छीना कि वे अपने बचपन की यादों को भुला देना चाहते हैं।
तो फिर इतना सब होते हुए भी ऐसा क्यों है कि हम इससे मुक्त होने के बजाय इसमें डूबते ही जा रहे हैं?
ऐसा नहीं है कि सरकारें इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाती परेशानी यह है कि अपेक्षित नतीजे नहीं निकलते।
विश्व की अगर बात की जाए तो सबसे पहले संयुक्त   राज्य अमेरिका ने 1920 में अपने संविधान में 18 वाँ संशोधन करके मद्य पेय के निर्माण एवं बिक्री पर राष्ट्रीय प्रतिबंध लगा कर इसके सेवन पर रोक लगाने के प्रयास किए थे जिसके परिणामस्वरूप लोग अवैध स्रोतों से शराब खरीदने लगे और वहाँ पर शराब के अवैध निर्माताओं एवं विक्रेताओं की समस्या उत्पन्न हो गई। अन्ततः 1933 में संविधान संशोधन को ही निरस्त कर दिया गया।
यूरोप के अन्य देशों में भी 20 वीं सदी के मध्य शराब निषेध का दौर आया था जिसे लोकप्रिय समर्थन नहीं मिलने की स्थिति में रद्द करना पड़ा। कुछ मुस्लिम देश जैसे साउदी अरब और पाकिस्तान में आज भी इसे बनाने या बेचने पर प्रतिबंध है क्योंकि इस्लाम में इसकी मनाही है।
भारत की अगर बात करें तो भले ही गुजरात और बिहार में शराबबंदी लागू हो ( यह व्यवहारिक रूप से कितनी सफल है इसकी चर्चा बाद में) लेकिन आन्ध्रप्रदेश,तमिलनाडु, मिज़ोरम और हरियाणा में यह नाकाम हो चुकी है।
केरल सरकार ने भी 2014 में राज्य में शराब पर प्रतिबंध की घोषणा की थी जिसके खिलाफ  बार एवं होटल मालिक सुप्रीम कोर्ट गए  लेकिन कोर्ट ने सरकार के फैसले को बहाल रखकर इस प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त राज्य में पर्यटन को देखते हुए केवल पाँच सितारा होटलों में इसकी अनुमति प्रदान की।
तो सरकार भले ही शराब बिक्री से मिलने वाले बड़े राजस्व का लालच छोड़ कर इस पर प्रतिबंध लगा दे लेकिन उसे इस मुद्दे पर जनसमर्थन नहीं मिल पाता। बल्कि हरियाणा जैसे राज्य में जहाँ महिलाओं के दबाव में सरकार इस प्रकार का कदम उठाती है, उस राज्य के मुख्यमंत्री को मात्र दो साल में अपने निर्णय को वापस लेना पड़ता है। कारण कि जो महिलाएं पहले इस बात से परेशान थीं कि शराब उनका घर बरबाद कर रही है अब इस मुश्किल में थीं कि घर के पुरुष अब शराब की तलाश में सीमा पार जाने लगे थे। जो पहले रोज कम से कम रात में घर तो आते थे अब दो तीन दिन तक गायब रहने लगे थे। इसके अलावा दूसरे राज्य से चोरी छिपे शराब लाकर तस्करी के आरोप में पुलिस के हत्थे चढ़ जाते थे तो इन्हें छुड़ाने के लिए औरतों को थाने के चक्कर काटने पड़ते थे सो अलग।
जिन राज्यों में शराबबंदी लागू है वहाँ की व्यहवहारिक सच्चाई सभी जानते हैं। इन राज्यों में शराब से मिलने वाला राजस्व सरकारी खजाने में न जाकर प्रइवेट तिजोरियों में जाने लगा है और जहरीली शराब से होने वाली मौतों की समस्या अलग से उत्पन्न हो जाती है।
इसलिए मुद्दे की बात तो यह है कि इतिहास गवाह है, कोई भी देश कानून के द्वारा इस समस्या से नहीं लड़ सकता।
चूंकि यह नैतिकता से जुड़ी सामाजिक समस्या है तो इसका हल समाज की नैतिक जागरूकता से ही निकलेगा। और समाज में नैतिकता का उदय एकाएक संभव नहीं है, किन्तु इसका विकास अवश्य किया जा सकता है। नैतिकता से परिपूर्ण समाज ही इसका स्थायी समाधान है कानूनी बाध्यता नहीं।
डाँ नीलम महेंद्र

Thursday, 16 November 2017

क्या हार्दिक मान सम्मान की परिभाषा भी जानते हैं?

क्या हार्दिक मान सम्मान की परिभाषा भी जानते हैं?


मैं वो भारत हूँ जो समूचे विश्व के सामने अपने गौरवशाली अतीत पर इठलाता हूँ।
गर्व करता हूँ अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति पर जो समूचे विश्व को अपनी ओर आकर्षित करती है।
अभिमान होता है उन आदर्शों पर जो हमारे समाज के महानायक हमें विरासत में देकर गए हैं।
कोशिश करता हूँ उन आदर्शों को अपनी हवा में आकाश में और मिट्टी में आत्मसात करने की ताकि इस देश की भावी पीढ़ियाँ अपने आचरण से मेरी गरिमा और विरासत को आगे ले कर जाएं।
लेकिन आज मैं आहत हूँ
क्षुब्ध हूँ
व्यथित हूँ
घायल हूँ
आखिर क्यों इतना बेबस हूँ?
किससे कहूँ कि देश की राजनीति आज जिस मोड़ पर पहुंच गई है या फिर पहुँचा दी गई है उससे मेरा दम घुट रहा है?
मैं चिंतित हूँ यह सोच कर कि गिरने का स्तर भी कितना गिर चुका है।
जिस देश में दो व्यक्तियों के बीच के हर रिश्ते के बीच भी एक गरिमा होती है वहाँ आज व्यक्तिगत आचरण सभी सीमाओं को लांघ चुका है?
लेकिन
भरोसा है कि जिस देश की मिट्टी ने अपने युवा को कभी सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस,राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिंह जैसे आदर्श दिए थे, उस देश का युवा आज किसी हार्दिक पटेल या जिग्नेश जैसे युवा को अपना आदर्श कतई नहीं मानेगा।

इसलिए  नहीं कि किसी सीडी में हार्दिक आपत्तिजनक कृत्य करते हुए दिखाई दे रहे हैं बल्कि इसलिए कि वे इसे अपनी मर्दानगी का सुबूत बता रहे हैं।
इसलिए नहीं कि जिग्नेश उनका समर्थन करते हुए कहते हैं कि
यह तो हमारा मूलभूत अधिकार है बल्कि इसलिए कि ये लोग अवैधानिक और अनैतिक आचरण में अन्तर नहीं कर पा रहे।
इसलिए नहीं कि हर वो काम जो कानूनन अपराध की श्रेणी में नहीं आता उसे यह जायज ठहरा रहे हैं बल्कि इसलिए कि कानून की परिभाषा पढ़ाते समय ये मर्यादाओं की सीमा नजरअंदाज करने पर तुले हैं।
इसलिए नहीं कि वे यह तर्क दे रहे हैं कि सीडी के द्वारा मेरे निजी जीवन पर हमले का सुनियोजित षड्यंत्र है बल्कि इसलिए कि लोगों का नेतृत्व करने वाले का निजी जीवन एक खुली किताब होता है, वे इस बात को भूल रहे हैं, क्योंकि जब एक युवा किसी को अपना नेता मानता है तो वह उसे एक व्यक्ति नहीं बल्कि व्यक्तित्व के रूप में देखता है।
इसलिए नहीं कि वे शर्मिंदा नहीं हो रहे हैं बल्कि इसलिए कि वे आक्रामक हो रहे हैं।
पश्चताप की भावना के बजाय बदले की भावना दिखा रहे हैं यह कहते हुए  कि बीजेपी में भी कई लोग हैं मैं उनकी भी सीडी लेकर आऊंगा।
इसलिए नहीं कि यह कुतर्क दिया जा रहा है कि दो वयस्क आपसी रजामंदी से जो भी करें उसमें कुछ गलत नहीं है बल्कि इसलिए कि दो वयस्कों के बीच जो सम्बन्ध भारतीय संस्कृति में विवाह नामक संस्कार का एक हिस्सा मात्र है आज वे उसे विवाह के बिना भी जीवन शैली का हिस्सा बनाने पर तुले हैं !
और सबसे अधिक व्यथित उस पुरुषवादी सोच से हूँ कि "गुजरात की महिलाओं का अपमान किया जा रहा है" ।  क्या हार्दिक मान सम्मान की परिभाषा भी जानते हैं? जो हार्दिक ने किया क्या वो सम्मानजनक था? यही है भारतीय संस्कृति और उनके संस्कार जिनके आधार पर वह गुजरात की जनता से समर्थन मांग रहे हैं?
पिछड़ेपन के नाम पर आरक्षण का अधिकार मांग कर युवाओं का नेता बनने की कोशिश करने वाला वाला एक 24 साल का युवक देश के युवाओं के सामने किस प्रकार का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
देखना चाहूँगा कि वो पाटीदार समाज
क्या इस पटेल को स्वीकार कर पायेगा जिसने इस देश की राजनीति को विश्व  इतिहास में सबसे आदर्श व्यक्तित्वा वाली शख्सियत भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल दिये?
जो लोग सत्ता के बाहर रहते हुए ऐसे आचरण में लिप्त हैं वे सत्ता से मिलने वाली ताकत में क्या खुद को संभाल पाएंगे या फिर उसके नशे में डूब जाएंगे?
मैं व्यथित जरूर हूँ लेकिन निराश नहीं हूँ।
आशावान हूँ कि मेरा देशवासी इस बात को समझेगा कि जो व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों से ही नहीं लड़ सकता वो समाज की बुराइयों से क्या लड़ेगा?
डाँ नीलम महेंद्र

Friday, 10 November 2017

क्या विश्व महाविनाश के लिए तैयार है

क्या विश्व महाविनाश के लिए तैयार है 


अमेरीकी विरोध के बावजूद उत्तर कोरिया द्वारा लगातार किए जा रहे हायड्रोजन बम परीक्षण के परिणाम स्वरूप ट्रम्प और किम जोंग उन की जुबानी जंग लगातार आक्रामक होती जा रही है।
स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब जुलाई में किम जोंग ने अपनी इन्टरकाँन्टीनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
क्योंकि न तो ट्रम्प ऐसे उत्तर कोरिया को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जिसकी इन्टरकाँटीनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइलें न्यूयॉर्क की तरफ तनी खड़ी हों और न ही उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम बन्द करने के लिए।
इस समस्या से निपटने के लिए ट्रम्प का एशिया  दौरा महत्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि इस यात्रा में उनकी विभिन्न एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से उत्तर कोरिया पर चर्चा होने का भी अनुमान है।
मौजूदा परिस्थितियों में चूंकि दोनों ही देश एटमी हथियारों से सम्पन्न हैं तो इस समय दुनिया एक बार फिर न्यूक्लियर हमले की आशंका का सामना करने के लिए अभिशप्त है।
निश्चित ही विश्व लगभग सात दशक पूर्व द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए न्यूक्लियर हमले और उसके परिणामों को भूल नहीं पाया है और इसलिए उम्मीद है कि स्वयं को महाशक्ति कहने वाले राष्ट्र मानव जाति के प्रति अपने दायित्वों को अपने अहं से ज्यादा अहमियत देंगे।
यह बात सही है कि अमेरिका 1985 से ही उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को बंद करने की  कोशिश में लगा है। इसके बावजूद अमेरिका द्वारा उत्तर कोरिया पर लगाए गए प्रतिबंध या फिर उसकी किसी भी प्रकार की कूटनीति अथवा धमकी का असर किम जोंग पर कम ही पड़ता दिखाई दे रहा है। 

ट्रम्प की चिंता समझी जा सकती है लेकिन समस्या का हल ढूंढने के लिए किम जोंग और उनकी सोच को समझना ज्यादा जरूरी है।
और इसे समझने के लिए उत्तर कोरिया का इतिहास समझना आवश्यक है।
दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक  कोरिया पर जापान का कब्जा था। इस युद्ध में जापान की हार के बाद कोरिया का विभाजन किया गया जिसके परिणामस्वरूप उत्तर कोरिया जिसे सोवियत रूस और चीन का समर्थन मिला और दक्षिण कोरिया जिसे अमेरिका का साथ मिला ऐसे दो राष्ट्रों का उदय हुआ।
जहाँ एक तरफ अमेरिकी सहयोग से दक्षिण कोरिया आज विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और विश्व के लगभग 75% देशों के साथ उसके व्यापारिक संबंध हैं,
वहीं उत्तर कोरिया आज भी एक दमनकारी सत्तावादी देश है जिस पर किम जोंग और उनके परिवार का शासन है। रूस और चीन के सहयोग के बावजूद उत्तर कोरिया का विकास समिति ही रहा क्योंकि एक तरफ इसकी मदद करने वाला सोवियत रूस 1990 के दशक में खुद ही विभाजन के दौर से गुजर रहा था इसलिए इसे रूस से मिलने वाली आर्थिक सहायता बन्द हो गई वहीं दूसरी तरफ इस देश ने उसी दौर में भयंकर सूखे का भी सामना किया जिसमें उसके लाखों नागरिकों की मौत हुई और साथ ही देश की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई।
रही चीन की बात तो उसने उत्तर कोरिया के सामरिक महत्व को समझते हुए इसे केवल अमेरिका को साधने का साधन मात्र बनाए रखा।  उत्तर कोरिया के साथ अपने व्यापार को चीन ने केवल अपने स्वार्थों तक ही सीमित रखा, उसे इतना भी नहीं बढ़ने दिया कि उत्तर कोरिया खुद एक सामर्थ्यवान अर्थव्यवस्था बन जाए।
नतीजन आज उत्तर कोरिया के सम्पूर्ण विश्व में केवल चीन के ही साथ सीमित व्यापारिक संबंध हैं।
इन हालातों में दुनिया को किम जोंग तर्कहीन और सनकी लग सकते हैं लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो उनका मौजूदा व्यवहार केवल अपनी सत्ता और सल्तनत को बचाने के लिए है। क्योंकि किम ने  सद्दाम हुसैन और मुअम्मर अल-गद्दाफ़ी का हश्र देखा है।
इसलिए इन हथियारों से किम  शायद केवल इतना ही सुनिश्चित करना चाहते हैं कि किसी भी देश की उन पर आक्रमण करने की न तो हिम्मत हो और न ही कोशिश करे।
अब देखा जाए तो अपने अपने नजरिये से दोनों ही सही हैं।
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि विकसित देशों की सुपर पावर बनने की होड़ और उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने वर्तमान परिस्थितियों को जन्म दिया है।
इन हालातों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए एक साथ बैठेंगे तो वे किसका हल तलाशेंगे , "समस्या"  का या फिर "किम जोंग" का?
इस प्रश्न के ईमानदार उत्तर में ही शायद  समस्या और उसका समाधान दोनों छिपे हैं।
इसके लिए आवश्यक है कि सर्वप्रथम चर्चा में शामिल होने वाले राष्ट्र खुद को सुपर पावर की हैसियत से नहीं  पृथ्वी नाम के इस खूबसूरत ग्रह के संरक्षक के रूप में शामिल करें।
ईश्वर की बनाई इस धरती और उसमें पाए जाने वाले जीवन का वे एक हिस्सा मात्र हैं मालिक नहीं इस बात को समझें।
अपनी महत्वाकांक्षाओं के अलावा आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी उनके कुछ फर्ज हैं इस तथ्य को स्वीकार करें।
अवश्य ही हममें से कोई भी अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा उजड़ा चमन छोड़ कर नहीं जाना चाहेगा जहाँ की हवा पानी पेड़ पौधे फल अनाज मिट्टी सभी इस कदर प्रदूषित हों चुके हों कि इस धरती पर हमारे बच्चों के लिए आस्तित्व का संघर्ष ही सबसे बड़ा और एकमात्र संघर्ष बन जाए।
यह बात सही है कि हथियारों की दौड़ में हम काफी आगे निकल आए हैं लेकिन उम्मीद अब भी कायम है कि  "असंभव कुछ भी नहीं"
"जीना है तो हमारे हिसाब से जियो नहीं तो महाविनाश के लिए तैयार हो जाओ"  यह रवैया बदलना होगा और   " चलो सब साथ मिलकर इस धरती को और खूबसूरत बनाकर प्रकृति का कर्ज चुकाते हैं", इस मंत्र को अपनाना होगा।
जरूरत है सोच और नजरिया बदलने की परिस्थितियों अपने आप बदल जाएंगी।
डाँ नीलम महेंद्र

Friday, 3 November 2017

विश्व बैंक रिपोर्ट एक ठंडी हवा का झोंका बनकर आई है

विश्व बैंक रिपोर्ट एक ठंडी हवा का झोंका बनकर आई है

जब नोटबंदी और जीएसटी को देश की घटती जीडीपी और सुस्त होती अर्थव्यवस्था का कारण बताते हुए सरकार लम्बे अरसे से लगातार अपने विरोधियों के निशाने पर हो, और 8 नवंबर को विपक्ष द्वारा काला दिवस मनाने की घोषणा की गई हो, ऐसे समय में कारोबारी सुगमता पर विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट सरकार के लिए एक ठंडी हवा का झोंका बनकर आई है।
लेकिन जिस प्रकार कांग्रेस इस रिपोर्ट को ही फिक्सड कहते हुए अपनी हताशा जाहिर कर रही है वो निश्चित ही अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उसकी इस प्रकार की नकारात्मक रणनीति के परिणामस्वरूप आज न सिर्फ कांग्रेस खुद ही अपने पतन का कारण बन रही है बल्कि देशवासियों को पार्टी के रूप में कोई विकल्प और देश के लोकतंत्र को एक मजबूत विपक्ष भी नहीं दे पा रही है।
सरकार के  विरोधियों को उनका जवाब शायद वर्ल्ड बैंक की  "ईज आफ डूइंग बिजनेस"  रैंकिंग की ताजा रिपोर्ट में मिल गया होगा जिसमें इस बार भारत ने अभूतपूर्व 30 अंकों की उछाल दर्ज की है।
यह सरकार की आर्थिक नीतियों का परिणाम ही है कि 190 देशों की इस सूची में भारत 2014 में  142 वें पायदान पर था, 2017 में सुधार करते हुए  130 वें स्थान पर आया और अब पहली बार वह इस सूची में 100 वें रैंक पर है।
अगर अपने पड़ोसी देशों की बात करें तो महज 0.40 अंकों के सुधार के साथ चीन  78 वें पायदान  पर है, पाकिस्तान 147  और  बांग्लादेश  177 पर।
सरकार का लक्ष्य 2019 में  90 और  2020 तक  30 वें पायदान पर आना है।
प्रधानमंत्री का कहना है कि  "सुधार, प्रदर्शन और रूपांतरण के मंत्र की मार्गदर्शिका के अनुसार हम अपनी रैंकिंग में और सुधार के लिए और अधिक आर्थिक वृद्धि को पाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"

रिपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि भारत को इस साल सबसे अधिक सुधार करने वाले दुनिया के टाँप टेन देशों में शामिल किया गया है और बुनियादी ढांचे में सुधार करने के मामले में यह शीर्ष पर है।
भारत के लिए निसंदेह यह गर्व की बात है कि इस प्रतिष्ठित सूची में वह  दक्षिण एशिया और ब्रिक्स समूह का एकमात्र देश है।
2003 में जब यह रिपोर्ट जारी की गई थी, तब इसमें  5 मुद्दों के आधार पर  133 देशों की अर्थव्यवस्था को शामिल किया था लेकिन इस साल 11 बिन्दुओं के आधार पर  190 देशों की अर्थव्यवस्था में यह रैंकिंग की गई है।
चूंकि विश्व बैंक की यह रिपोर्ट हर साल 1 जून तक के प्रदर्शन पर आधारित होती हैं इसलिए इस साल एक जुलाई से लागू किए गए जीएसटी और उसके प्रभाव को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
वर्ल्ड बैंक के साउथ एशिया के उपाध्यक्ष डिक्सन का कहना है कि यह रिपोर्ट संकेत देती है कि भारत के दरवाजे कारोबार के लिए खुले हैं और अब यह विश्व स्तर पर व्यापार करने के लिए पसंदीदा स्थान के रूप में कड़ी टक्कर दे रहा है।
मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मोदी ने गुजरात को व्यापार की दृष्टि से  "गेटवे आफ इंडिया" बना दिया था। देश के लगभग सभी बड़े औद्योगिक घराने अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात को उसकी आर्थिक नीतियों के कारण निवेश के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य मानते थे।  विश्व बैंक की यह ताजा रिपोर्ट इस बात का सुबूत है कि अपनी नई आर्थिक नीतियों के सहारे भारत आज व्यापार और निवेश की दृष्टि से दुनिया की नजरों में पहले के मुकाबले कहीं अधिक आकर्षक और उपयोगी सिद्ध हो रहा है। आने वाले समय में शायद भारत विदेशी निवेश की दृष्टि से "गोटवे आफ द वर्ल्ड"  बन जाए
दिल्ली और मुंबई के कॉर्पोरेट जगत से मिली जानकारी के आधार पर तैयार की गयी इस रिपोर्ट के अनुसार जहाँ पहले नया व्यवसाय शुरू करने के लिए व्यक्ति को बैंक से लोन लेने से लेकर विभिन्न  कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए महीनों पसीना बहाने के साथ साथ अपनी मेहनत की कमाई भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ानी पड़ती थी। आज अधिकतर प्रक्रिया आनलाईन करके लालफीताशाही पर भी लगाम लगाने की काफी हद तक सफल कोशिश की गई है।
कर्ज लेना आसान बनाकर न सिर्फ देश में  'स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया'   के द्वारा उद्यमिता को बढ़ावा दिया गया बल्कि विदेशी निवेश को भी आकर्षित किया गया

देश में अब तक छोटे निवेशकों के हितों को अनदेखा किया जाता था लेकिन अब सेबी द्वारा छोटे निवेश में भी सुरक्षा देने के लिहाज से कई कदम उठाए गए  जिनके आधार पर भारत ने इस क्षेत्र में नौ पायदान ऊपर आते हुए चौथी रैंकिंग हासिल की।
टैक्स सुधारों के परिणामस्वरूप पहले की 172 रैंकिंग के मुकाबले इस बार 53 अंकों की उछाल के साथ भारत 119 वें स्थान पर है।
हालांकि आयात निर्यात जैसे क्षेत्र में भारत सरकार को अभी और काम करना है लेकिन दस में से आठ क्षेत्रों में सुधार के साथ यह कहा जा सकता है कि विरोध करने वाले जो भी कहें, देश प्रगति की राह पर चल पड़ा है।
डाँ नीलम महेंद्र