Tuesday, 8 August 2017

क्यों हम बेटियों को बचाएँ

क्यों हम बेटियों को बचाएँ



मुझे मत पढ़ाओ , मुझे मत बचाओ,, मेरी इज्जत अगर नहीं कर सकते ,तो मुझे इस दुनिया में ही मत लाओ
मत पूजो मुझे देवी बनाकर तुम ,मत कन्या रूप में मुझे 'माँ' का वरदान कहो
अपने अंदर के राक्षस का पहले तुम खुद ही संहार करो। 
एक बेटी का दर्द
चंडीगढ़ की सड़कों पर जो 5 ता० की रात हुआ वो देश में पहली  बार तो नहीं हुआ।
और ऐसा भी नहीं है कि हम इस घटना से सीख लें और यह इस प्रकार की आखिरी घटना ही हो।
बात यह नहीं है कि यह सवाल कहीं नहीं उठ रहे कि रात बारह बजे दो लड़के एक लड़की का पीछा क्यों करते हैं,बल्कि सवाल तो यह उठ रहे हैं कि रात बारह बजे एक लड़की घर के बाहर क्या कर रही थी।
बात यह भी नहीं है कि वे लड़के नशे में धुत्त होकर एक लड़की को परेशान कर रहे थे,
बात यह है कि ऐसी घटनाएं इस देश की सड़कों पर आए दिन और आए रात होती रहती हैं।
बात यह नहीं है कि इनमें से अधिकतर घटनाओं का अंत पुलिस स्टेशन पर पीड़ित परिवार द्वारा न्याय के लिए अपनी आवाज़  उठाने के साथ नहीं होता।
बात यह है कि ऐसे अधिकतर मामलों का अन्त पीड़ित परिवार द्वारा घर की चार दीवारी में अपनी जख्मी आत्मा की चीखों को दबाने के साथ होता है।
बात यह नहीं है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में न्याय के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है,
बात यह है कि इस देश में अधिकार भी भीख स्वरूप दिये जाते है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा पहलू यह है कि वर्णिका कुंडु जिन्होंने रिपोर्ट लिखवाई है,एक आईएएस अफ्सर की बेटी हैं, यानी उनके पिता इस सिस्टम का हिस्सा हैं।
जब वे और उनके पिता उन लड़कों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे तब तक उन्हें नहीं पता था कि वे एक राजनैतिक परिवार का सामना करने जा रहे हैं लेकिन जैसे ही यह भेद खुला कि लड़के किस परिवार से ताल्लुक रखते हैं तो पिता को यह आभास हो गया था कि न्याय की यह लड़ाई कुछ लम्बी और मुश्किल होने वाली है।
उनका अंदेशा सही साबित भी हुआ।
न सिर्फ लड़कों को थाने से ही जमानत मिल गई बल्कि एफआईआर में लड़कों के खिलाफ लगी धाराएँ भी बदल कर केस को कमजोर करने की कोशिशें की गईं।
जब उनके साथ यह व्यवहार हो सकता है तो फिर एक आम आदमी इस सिस्टम से क्या अपेक्षा करे?
जब एक आईएएस अफ्सर को अपने पिता का फर्ज निभाने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो एक साधारण पिता क्या उम्मीद करे?
वर्णिका के पिता ने तो आईएएस लाबी से समर्थन जुटा कर इस केस को सिस्टम वर्सिस पालिटिक्स करके इसके रुख़ को बदलने की कोशिश की है लेकिन एक आम पिता क्या करता?
जब एक लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा ऐसा काम करता है तो वह पार्टी अपने नेता के बचाव में आगे आ जाती है क्योंकि वह सत्ता तंत्र में विश्वास करती है लोकतंत्र में नहीं,वह तो सत्ता हासिल करने का एक जरिया मात्र है।
उसके नेता यह कहते हैं कि पुत्र की करनी की सजा पिता को नहीं दी जा सकती तो बिना योग्यता के पिता की राजनैतिक विरासत उसे क्यों दे दी जाती है।
आप अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए भाषण को भी नकार देते हैं जो कहते हैं कि हम अपनी बेटियों से तो तरह तरह के सवाल पूछते हैं,उन पर पाबंदियां भी लगाते हैं लेकिन कभी बेटे से कोई सवाल कर लेते, कुछ संस्कारों के बीज उनमें डाल देते, कुछ लगाम बेटों पर लगा देते  तो बेटियों पर बंदिशें नहीं लगानी पड़तीं।
यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर अपने नेताओं और स्वार्थों को रखती है?
यह कैसी व्यवस्था है जहाँ अपने अधिकारों की बात करना एक "हिम्मत का काम" कहा जाता है।
हम एक ऐसा देश क्यों नहीं बना सकते जहाँ हमारी बेटियाँ भी बेटों की तरह आजादी से जी पाँए ?
हम अपने भूतपूर्व सांसदों विधायकों नेताओं को आजीवन सुविधाएं दे सकते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकते।
हम नेताओं को अपने ही देश में अपने ही क्षेत्र में जेड प्लस सेक्यूरिटी दे सकते हैं लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षा तो छोड़िये न्याय भी नहीं  ?
देश निर्भया कांड को भूला नहीं हैं और न ही इस सच्चाई से अंजान है कि हर रोज़ कहीं न कहीं कोई न कोई बेटी किसी न किसी अन्याय का शिकार हो रही है। उस दस साल की मासूम और उसके माता पिता का दर्द कौन समझ सकता है जो किसी और की हैवानियत का बोझ इस अबोध उम्र में उठाने के लिए मजबूर है। जिसकी खिलौनों से खेलने की उम्र थी वो खुद किसी अपने के ही हाथ का खिलौना बन गई। जिसकी हँसने खिलखिलाने की उम्र थी वो आज दर्द से कराह रही है।जो खुद एक बच्ची है लेकिन माँ बनने के लिए मजबूर है।
क्यों हम बेटियों को बचाएँ ? इन हैवानों के लिए?
हम अपने बेटों को क्यों नहीं सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाएँ ?
बेहतर यह होगा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के बजाय
बेटी बचानी है तो पहले बेटों को सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाओ ।उन्हें बेटियों की इज्जत करना तो सिखाओ।
डॉ नीलम महेंद्र


Tuesday, 1 August 2017

देश तो देशवासी बनातें हैं

देश तो देशवासी बनातें  हैं

“इतिहास केवल गर्व महसूस करने के लिए नहीं होता सबक लेने के लिए भी होता है क्योंकि जो अपने इतिहास से सीख नहीं लेते वो भविष्य के निर्माता भी नहीं बन पाते।“

भारत के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार "मन की बात" कार्यक्रम से पूरे देश से सीधा संपर्क साधा है वो वाकई काबिले तारीफ है।
इस कार्यक्रम के द्वारा वे न सिर्फ देश के हर वर्ग से मुखातिब होकर उन्हें देश को उनसे जो अपेक्षाएँ हैं,उनसे अवगत कराते हैं बल्कि अपनी सरकार की नीतियों,उनके उद्देश्य एवं देश को उनसे होने वाले लाभ से भी रूबरू कराते हैं।
इस बार उनकी मन की बात का केंद्र 'अगस्त का महीने ' रहा।
वो महीना जिसमें असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई, अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगे,और हमें लगभग 200 सालों की गुलामी से आजादी मिली।
यह वो महीना है जिसमें हमें एक  लम्बे संघर्ष के बाद "स्वराज" तो मिल गया लेकिन  "सुराज" का आज भी देश को इंतजार है।
दुनिया 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी का जश्न देखती है  लेकिन इस 'एक दिन ' के लिए हमने लगभग सौ सालों तक जो कुर्बानियाँ दीं उनका दर्द तो केवल हम ही महसूस कर सकते हैं।
दरअसल हमारी सफलता को तो दुनिया देखती है लेकिन इस दिन के पीछे के त्याग और बलिदान को  कोई देख नहीं पाता।
1857
में रानी लक्ष्मीबाई की तलवार से जो चिंगारी भड़की थी, वो 9 अगस्त 1942 तक एक लौ बन चुकी थी।
वो लौ जिसकी अगन में देश का बच्चा बूढ़ा जवान, सभी जल रहे थे।
पूरे भारत में धधकने वाली इस ज्वाला के तेज के आगे अंग्रेज टिक नहीं पाए और 1947 में वो ऐतिहासिक लम्हा भी आया जिसकी चाह में इस माटी के वीरों ने अपनी जान की परवाह भी नहीं की थी।
लेकिन क्या यह आजादी का पल केवल एक नारे से आया?
  "
अंग्रेजों भारत छोड़ो"   यह नारा डॉ युसुफ मेहर अली ने  दिया, "करो या मरो" का नारा गाँधीजी ने दिया और अंग्रेज चले गए?
नहीं,हम सभी जानते हैं कि केवल भाषण और नारों से काम नहीं चलता।
ठोस धरातल पर जमीनी स्तर पर काम करने से बात बनती है।
उस समय भी यही हुआ,
नारा हमारे नेताओं ने दिया लेकिन आवाज हर मुख से निकली,
उस यज्ञ में आहुति हर आत्मा ने दी,
जिस से जो बन पाया, उसने वो किया,
उस समय जब अंग्रेजी हुकूमत ने कांग्रेस को एक "गैरकानूनी संस्था" घोषित कर दिया और सभी बड़े नेताओं को या तो जेल में डाल दिया या फिर नजरबंद कर दिया, आंदोलन की बागडोर इस देश के आम आदमी ने अपने हाथों में ले ली।
ब्रिटिश शासन का विरोध रुका नहीं, बल्कि और उग्र हो गया।
सरकारी सेवकों ने त्यागपत्र नहीं दिए लेकिन कांग्रेस के साथ अपनी राजभक्ति खुलकर घोषित कर दी,
सैनिकों ने सेना में रहते हुए ब्रिटिश सरकार के आदेशों के खिलाफ खुली बगावत की और  भारतीयों पर गोलियां चलानी बंद कर दी,
छात्रों ने शिक्षण संस्थानों में हड़ताल कर दी,जुलूस निकाले,जगह जगह पर्चे बाँटे और भूमिगत कार्यकर्ताओं के लिए संदेशवाहक का कार्य किया,
कृषकों ने  सरकार समर्थक जमींदारों को लगान देना बन्द कर दिया,
राजे महाराजाओं ने जनता का सहयोग किया और अपनी प्रजा की सम्प्रभुता स्वीकार कर ली
महिलाएं और छात्राएं भी पीछे नहीं थीं, उनकी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रही।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश के हर नागरिक ने जिस भी रूप में वो अपन योगदान दे सकता था,दिया।
हर दिल में वो ज्वाला थी जो ज्वालामुखी बनी तब जाकर हम गुलामी के अंधेरे से निकल कर स्वतंत्रता के सूर्योदय को देख पाए।
यही ज्वाला आज फिर से देश के हर ह्रदय में जगनी चाहिए।
आज हमारा देश एक बार फिर अंधकार के साये में कैद होता जा रहा हैं।
हमारे समाज में कुछ बुराइयाँ हैं जो देश को आगे बढ़ने से रोक रही हैं
ये बुराइयाँ हैं ,भ्रष्टाचार ,आतंकवाद ,जातिवाद ,सम्प्रदायवाद ,
गरीबी,जगह जगह फैली गन्दगी के,बेरोजगारी ,अबोध बालिकाओं के साथ होने वाले अत्याचार आदि ।
यह सभी इस देश की नींव को खोखला करने में लगी हैं।
देश के प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात में पूरे देश का आह्वान किया है कि इस बार अगस्त मास में हम सभी इन बुराइयों के खिलाफ एक महाभियान चलाँए और
एक नए भारत के निर्माण का संकल्प लें।
लेकिन नए भारत का निर्माण तभी संभव हो पाएगा जब  देश के प्रधानमंत्री के मन की बात इस देश के हर नागरिक के मन की बात बनेगी।
जब  एक अग्नि देश के हर दिल में जलेगी
जब देश का हर व्यक्ति बच्चा बूढ़ा जवान अपने मन में खुद से वादा करेगा कि मुझे इन बुराइयों को इस देश से भगाना है।
मुझे आज फिर से देश के लिए इससे लड़ना है।
एक ऐसा देश बनना है जहाँ
धर्म हो इंसानियत,
जाति हो मानवता ,
योग्यता हो ईमानदारी,
सबला हो हर नारी।
हर नागरिक को बराबरी का दर्जा संविधान में नहीं व्यवहार में हासिल हो,
और कानून चेहरों के मोहताज न हों
जहाँ देश का कोई भी व्यक्ति परेशान न हो।
जहाँ स्वराज के साथ सुराज भी हो।
डॉ नीलम महेंद्र

Monday, 31 July 2017

आजादी आपनी सोच में लायें

आजादी आपनी सोच में लायें


भारत हर साल 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।
यह दिन जहां हमारे आजाद होने की खुशी लेकर आता है वहीं इसमें भारत के खण्ड खण्ड होने का दर्द भी छिपा होता है।
वक्त के गुजरे पन्नों में भारत से ज्यादा गौरवशाली इतिहास किसी भी देश का नहीं हुआ।
लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप से ज्यादा सांस्कृतिक राजनैतिक सामरिक और आर्थिक हमले भी इतिहास में शायद किसी देश पर नहीं हुए।
और कदाचित किसी देश के इतिहास के साथ इतना अन्याय भी कहीं नहीं हुआ।
वो देश जिसे इतिहास में 'विश्व गुरु' के नाम से जाना जाता हो, उस देश के प्रधानमंत्री को आज  "मेक इन इंडिया" की शुरूआत करनी पड़रही है।
'सोने की चिड़िया' जैसे नाम जिस देश को कभी दिया गया हो, उसका स्थान आज विश्व के विकासशील देशों में है।
शायद हमारा वैभव और हमारी  समृद्धि की कीर्ति ही हमारे पतन का कारण भी बनी।
भारत के ज्ञान और सम्पदा के चुम्बकीय आकर्षण से विदेशी आक्रमणता लूट के इरादे से इस ओर आकर्षित हुए।
वे आते गए और हमें लूटते गए।
हर आक्रमण के साथ चेहरे बदलते गए लेकिन उनके इरादे वो ही रहे
वो मुठ्ठी भर होते हुए भी हम पर हावी होते गए
हम वीर होते हुए भी पराजित होते गए
क्योंकि हम युद्ध कौशल से जीतने की कोशिश करते रहे
और वे जयचंदों के छल से हम पर विजय प्राप्त करते रहे
हम युद्ध भी ईमानदारी से लड़ते थे और वे किसी भी नियम को नहीं मानते थे
इतिहास गवाह है, हम दुशमनों से ज्यादा अपनों से हारे हैं शायद इसीलिए किसी ने कहा है,
" हमें तो अपनों ने लूटा , ग़ैरों में कहाँ दम था,
हमारी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था  "
जो देश अपने खुद की गलतियों से नहीं सीखा पाता वो स्वयं इतिहास बन जाता है
हमें भी शायद अपनी इसी भूल की सज़ा मिली जो हमारी वृहद सीमाएं आज इतिहास बन चुकी हैं।
वो देश जिसकी सीमाएं उत्तर में हिमालय दक्षिण में हिन्द महासागर पूर्व में इंडोनेशिया और पश्चिम में ईरान तक फैली थीं ,आज  सिमट कर रह गईं और इस खंडित भारत को हम आजाद भारत कहने के लिए विवश हैं।
अखंड भारत का स्वप्न सर्वप्रथम आचार्य चाणक्य ने देखा था और काफी हद तक चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर इसे यथार्थ में बदला भी था। तब से लेकर लगभग 700 ईसवी तक भारत ने इतिहास का स्वर्णिम काल अपने नाम किया था।
लेकिन 712 ईस्वी में सिंध पर पहला अरब आक्रमण हुआ फिर 1001 ईस्वी से महमूद गजनी , चंगेज खान ,अलाउद्दीन खिलजी ,मुहम्मद तुगलक ,तैमूरलंग , बाबर और उसके वंशजों द्वारा भारत पर लगातार हमले और अत्याचार हुए।
1612 ईस्वी में जहाँगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की इजाज़त दी।
यहाँ इतिहास ने एक करवट ली और व्यापार के बहाने अंग्रेजों ने पूरे भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।
लेकिन इतने विशाल देश पर नियंत्रण रखना इतना आसान भी नहीं था यह बात उन्हें समझ में आई 1857 की क्रांति से ।
इसलिए उन्होंने "फूट डालो और राज करो" की नीति अपनाते हुए धीरे धीरे भारत को तोड़ना शुरू किया।
1857 से 1947 के बीच अंग्रेजों ने भारत को सात बार तोड़ा ।
1876 में अफगानिस्तान
1904 में नेपाल
1906 में भूटान
1914 में तिब्बत
1935 में श्रीलंका
1937 में म्यांमार
1947 में बांग्लादेश और पाकिस्तान
लेकिन हम भारतवासी अंग्रेजों की इस कुटिलता को नहीं समझ पाए कि उन्होंने हमारे देश की भौगोलिक सीमाओं को ही नहीं तोड़ा, बल्कि हमारे समाज, हमारी भारतीयता, इस देश की आत्मा को भी खण्डित कर गए। 
जाते जाते वे इस बात के बीज बो गए कि भविष्य में भी भारत कभी एक न रह पाए।बहुत ही चालाकी से वे हिन्दू समाज को जाती क्षेत्र और दल के आधार पर जड़मूल तक विभाजित कर गए।
जरा सोचिए कि क्यों जब हमसे आज हमारा परिचय पूछा जाता है तो हमारा परिचय ब्राह्मण बनिया ठाकुर मराठी कायस्थ दलित कुछ भी हो सकता है लेकिन भारतीय नहीं होता ?
अंग्रेजों के इस बीज को खाद और पानी दिया हमारे नेताओं ने जो देश के विकास की नहीं वोट बैंक की राजनीति करते आ रहे हैं।
जब  इक्कीसवीं सदी के इस ऊपर से, एक किन्तु भीतर ही भीतर विभाजित भारत की यह तस्वीर अंग्रेज देखते होंगे तो मन ही मन अपनी विजय पर गर्व महसूस करते होंगे।
हम भारत के लोग 15 अगस्त को किस बात का जश्न मनाते हैं?
आजादी का?
लेकिन सोचो कि हम आजाद कहाँ हैं?
हमारी सोच आज भी गुलाम है !
हम गुलाम हैं अंग्रेजी सभ्यता के जिसका अन्धानुकरण हमारी युवा पीढ़ी कर रही है।
हम गुलाम हैं उन जातियों के जिन्होंने हमें आपस में बाँटा हुआ है और हमें एक नहीं होने देती ।
हम गुलाम हैं अपनी सरकार की उन नीतियों की जो इस देश के नागरिक को उसके धर्म और जाति के आधार पर आंकती हैं उसकी योग्यता के आधार पर नहीं
हम गुलाम हैं उस तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के जिसने हमें बाँटा हुआ है धर्म के नाम पर
हम गुलाम हैं हर उस सोच के जो हमारे समाज को तोड़ती है और हमें एक नहीं होने देती।
हम आज भी गुलाम हैं अपने निज स्वार्थों के जो देश हित से पहले आते हैं।
अगर हमें वाकई में आजादी चाहिए तो सबसे पहले अपनी उस सोच अपने अहम से हमें आजाद होना होगा जो हमें अपनी पहचान "केवल भारतीय" होने से रोक देती है।
हमें आजाद होना पड़ेगा उन स्वार्थों से जो देश हित में रुकावट बनती हैं।
अब वक्त आ गया है कि हम अपनी आजादी को भौगोलिक अथवा राजनैतिक दृष्टि तक सीमित न रखें।
हम अपनी आज़ादी अपनी सोच में लाएँ । जो सोच और जो भौगोलिक सीमाएं हमें अंग्रेज दे गए हैं उनसे बाहर निकलें।
विश्व इतिहास से सीखें कि जब जर्मनी का एकीकरण हो सकता है, जब बर्लिन की दीवार गिराई जा सकती है, जब इटली का एकीकरण हो सकता है, तो भारत का क्यों नहीं?
चन्द्रशेखर आजाद भगतसिंह सुखदेव महारानी लक्ष्मीबाई मंगल पांडे रामप्रसाद बिस्मिल सुभाष चंद्र बोस अश्फाकउल्लाह खान ने अपनी जान अखंड भारत के लिए न्योछावर की थी खण्डित भारत के लिए नहीं।
जिस दिन हम भारत को उसकी खोई हुई अखंडता लौटा देंगे उस दिन हमारी ओर से हमारे वीरों को सच्चे श्रद्धांजलि अर्पित होगी।

डॉ नीलम महेंद्र