Sunday, 29 January 2017

यह हैं असली नायिकाएँ

यह हैं असली नायिकाएँ


भंसाली का कहना है कि पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है ।इतिहास की अगर बात की जाए तो  राजपूताना इतिहास में चित्तौड़ की  रानी पद्मिनी का नाम बहुत ही आदर और मान सम्मान के साथ लिया जाता है।
भारतीय इतिहास में कुछ औरतें आज भी वीरता और सतीत्व की मिसाल हैं जैसे सीता द्रौपदी संयोगिता और पद्मिनी। यह चारों नाम केवल हमारी जुबान पर नहीं आते बल्कि इनका नाम लेते ही जहन में इनका चरित्र कल्पना के साथ जीवंत हो उठते है।
रानी पद्मिनी का नाम सुनते ही एक ऐसी खूबसूरत वीर राजपूताना नारी की तस्वीर दिल में उतर आती है जो चित्तौड़ की आन बान और शान के लिए 16000 राजपूत स्त्रियों के साथ  जौहर में कूद गई थीं। आज भी रानी पद्मिनी और जौहर दोनों एक दूसरे के पर्याय से लगते हैं। इतिहास गवाह है कि जब अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ के महल में प्रवेश किया था तो वो जीत कर भी हार चुका था क्योंकि एक तरफ रानी पद्मिनी को जीवित तो क्या मरने के बाद भी वो हाथ न लगा सका ।
लेकिन भंसाली तो रानी पद्मिनी नहीं पद्मावती पर फिल्म बना रहे हैं । बेशक उनके कहे अनुसार वो एक काल्पनिक पात्र हो सकता है लेकिन जिस काल खण्ड को वह अपनी फिल्म में दिखा रहे हैं वो कोई कल्पना नहीं है। जिस चित्तौड़ की वो बात कर रहे हैं वो आज भी इसी नाम से जाना जाता है। जिस राजा रतनसिंह की पत्नी के रूप में रानी पद्मावती की  " काल्पनिक कहानी" वे दिखा रहे हैं वो राजा रतन सिंह कोई कल्पना नहीं हमारे इतिहास के वीर योद्धा हैं। और 'लास्ट बट नौट द लीस्ट ' जो अलाउद्दीन खिलजी आपकी इस फिल्म में पद्मावती पर फिदा है उसके नाम भारतीय इतिहास का सबसे काला पन्ना और खुद मुग़ल इतिहास में सबसे क्रूर शासक के नाम से दर्ज है।
तो सोचने वाली बात यह है कि यह कैसी काल्पनिक कहानी है जिसका केवल ' एक ' ही पात्र काल्पनिक है ? कोई भी कहानी या तो कल्पना होती है या सत्य घटना पर आधारित होती है । भंसाली शायद भूल रहे हैं कि  यदि अतीत की किसी सत्य घटना में किसी कल्पना को जोड़ा जाता है तो इसी को  'तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना ' या फिर 'इतिहास से छेड़छाड़ करना ' कहा जाता है।
चलो मान लिया जाए कि रानी पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है लेकिन भंसाली शायद यह भी भूल गए कि काल्पनिक होने के बावजूद रानी पद्मावति एक भारतीय  रानी थी जो किसी भी सूरत में स्वप्न में भी  किसी क्रूर मुस्लिम आक्रमण कारी पर मोहित हो ही नहीं सकती थी।
हमारे इतिहास की यह स्त्रियाँ ही हर भारतीय नारी की आइकान हैं । रानी पद्मिनी जैसी रानियाँ किसी पटकथा का पात्र नहीं असली नायिकाएँ हैं , वे किवदन्तियाँ नहीं हैं आज भी हर भारतीय नारी में जीवित हैं।
डॅा नीलम महेंद्र

Saturday, 28 January 2017

घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब

घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव किसी भी लोकतंत्र का महापर्व होते हैं ऐसा कहा जाता है। पता नहीं यह गर्व का विषय है या फिर विश्लेषण का कि हमारे देश में इन महापर्वों का आयोजन लगा ही रहता है । कभी लोकसभा  कभी विधानसभा तो कभी नगरपालिका के चुनाव। लेकिन अफसोस की बात है कि चुनाव अब नेताओं के लिए व्यापार बनते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों के चुनावी मैनाफेस्टो व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार के प्रोमोशन के लिए बाँटे जाने वाले पैम्पलेट !
और आज इन पैम्पलेट , माफ कीजिए चुनावी मैनिफेस्टो में  लैपटॉप स्मार्ट फोन जैसे इलेक्ट्रौनिक उपकरण  से  लेकर प्रेशर कुकर जैसे बुनियादी आवश्यकता की वस्तु बाँटने से शुरू होने वाली बात घी , गेहूँ और पेट्रोल  तक पंहुँच गई।

कब तक हमारे नेता गरीबी की आग को पेट्रोल और घी से बुझाते रहेंगे?
सबसे बड़ी बात यह कि यह मेनिफेस्टो उन पार्टीयों के हैं जो इस समय सत्ता में हैं।
राजनैतिक दलों की निर्लज्जता और इस देश के वोटर की बेबसी दोनों ही दुखदायी हैं। क्यों कोई इन नेताओं से नहीं पूछता कि  इन पांच सालों या फिर स्वतंत्रता के बाद इतने सालों के शासन में तुमने क्या किया?

उप्र की समाजवादी पार्टी हो या पंजाब का भाजपा अकाली दल गठबंधन दोनों को सत्ता में वापस आने के लिए या फिर अन्य पार्टियों को  राज्य के लोगों को आज इस प्रकार के प्रलोभन क्यों देने पड़ रहे हैं?
लेकिन बात जब पंजाब में लोगों को घी बाँटने की हो तो मसला बेहद गंभीर हो जाता है क्योंकि पंजाब का तो नाम सुनते ही जहन में हरे भरे लहलहाते फसलों से भरे खेत उभरने लगते हैं और घरों के आँगन में बँधी गाय भैंसों के साथ खेलते खिलखिलाते बच्चे  दिखने से लगते हैं। फिर वो पंजाब जिसके घर घर में दूध दही की नदियाँ बहती थीं , वो पंजाब जो अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाता था जो अपने घर आने वाले मेहमान को दूध दही घी से ही पूछता था आज  उस पंजाब के वोटर को उन्हीं चीजों को सरकार द्वारा मुफ्त में देने की स्थिति क्यों और कैसे आ गई?
सवाल तो बहुत हैं पर शायद जवाब किसी के पास भी नहीं।
जब हमारा देश आजाद हुआ था तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था तो आज इस देश के हर नागरिक पर औसतन 45000 से ज्यादा का कर्ज क्यों है?
जब अंग्रेज हम पर शासन करते थे तो भारतीय रुपया डालर के बराबर था तो आज वह 68.08 रुपए के स्तर पर कैसे आ गया?
हमारा देश कृषी प्रधान देश है तो स्वतंत्रता के इतने सालों बाद भी आजतक  किसानों को 24 घंटे बिजली एक चुनावी वादा भर क्यों है?
चुनाव दर चुनाव पार्टी दर पार्टी वही वादे क्यों दोहराए जाते हैं?
क्यों आज 70 सालों बाद भी पीने का स्वच्छ पानीगरीबी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी जरूरतें ही मैनिफेस्टो का हिस्सा हैं?
हमारा देश इन बुनियादी आवश्यकताओं से आगे क्यों नहीं जा पाया?
और क्यों हमारी पार्टियाँ रोजगार के अवसर पैदा करके हमारे युवाओं को स्वावलंबी बनाने से अधिक मुफ्त चीजों के प्रलोभन देने में विश्वास करती हैं?
यह वाकई में एक गंभीर मसला है कि जो वादे राजनैतिक पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो में करती हैं वे चुनावों में वोटरों को लुभाकर वोट बटोरने तक ही क्यों सीमित रहते हैं।चुनाव जीतने के बाद ये पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो को लागू करने के प्रति कभी भी गंभीर नहीं होती और यदि उनसे उनके मैनिफेस्टो में किए गए वादों के बारे में पूछा जाता है तो सत्ता के नशे में अपने ही वादों को  'चुनावी जुमले ' कह देती हैं।
इस सब में समझने वाली बात यह है कि वे अपने मैनिफेस्टो को नहीं बल्कि अपने वोटर को हल्के में लेती हैं।
आम आदमी तो लाचार है चुने तो चुने किसे आखिर में सभी तो एक से हैं। उसने तो अलग अलग पार्टी   को चुन कर भी देख लिया लेकिन सरकारें भले ही बदल गईं मुद्दे वही रहे।
पार्टी और नेता दोनों  ही लगातार तरक्की करते गए लेकिन वो सालों से वहीं के वहीं खड़ा है। क्योंकि बात सत्ता धारियों द्वारा भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दिखाए जाने वाले सपनों की है।
मुद्दा वादों  को हकीकत में बदलने का सपना दिखाना नहीं उन्हें सपना ही रहने देना है।
चुनाव आयोग द्वारा चुनाव से पहले आचार संहिता लागू कर दी जाती है। आज जब विभिन्न राजनैतिक दल इस प्रकार की घोषणा करके वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं तो यह देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि पार्टियाँ अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा करें और जो पार्टी सत्ता में आने के बावजूद अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा नहीं कर पाए वह अगली बार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दी जाए।
जब तक इन राजनैतिक दलों की जवाबदेही अपने खुद के मेनीफेस्टो के प्रति तय नहीं की जाएगी हमारे नेता भारतीय राजनीति को किस स्तर तक ले जाएंगे इसकी कल्पना की जा सकती है। इस लिए चुनावी आचार संहिता में आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ नए कानून जोड़ना अनिवार्य सा दिख रहा है।
डॉ नीलम महेंद्र

Sunday, 22 January 2017

बवाल की राजनीति करते नेता

बवाल की राजनीति करते नेता


बचपन में  हमें एक कौमा के प्रयोग से किसी वाक्य का अर्थ कैसे बदला जाता है इस उदाहरण से  समझाया गया था , 'रुको, मत जाओ ' , और  'रुको मत, जाओ'
कुछ इसी प्रकार का प्रयोग इस चुनावी मौसम में
जयपुर फेस्टीवल में  संघ प्रचारक मनमोहन वैद्य के आरक्षण के सम्बन्ध में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर के साथ पूरे देश की मीडिया और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने किया।
कार्यक्रम का संचालन राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ पर किताब लिख रहीं प्रज्ञा तिवारी कर रही थीं और उन्‍होंने मनमोहन वैद्य से इस देश की राजनीति में एक बेहद ही  'संवेदनशीलमुद्दे पर प्रश्न पूछा ।
लेकिन शायद वैद्य इस प्रश्न में छिपी 'विस्फोटक सामग्री ' और किसी  'विस्फोट' का इंतजार करती मीडिया के इरादे भांप नहीं पाए इसलिए इसे एक साधारण सा प्रश्न समझ कर उतनी ही सरलता से इसका उत्तर दे दिया ।
इस सवाल का जवाब देते हुए मनमोहन वैद्य ने कहा कि" हमारे समाज में जो पिछड़ा वर्ग है उनके साथ केवल किसी जाति विशेष में पैदा होने के कारण जो भेदभाव किया गया उसे दूर करने के लिए हमारे संविधान में आरक्षण का प्रावधान है जो कि एक सेवा है लेकिन इसके आगे अन्य आरक्षण देना अलगाववाद बढ़ाने वाली बात है इसलिए सबको समान अवसर दिए जाएं इसके उपाय अन्य तरीके  ढूँढे जांए

अब अगले दिन के अखबारों की हेडलाइन देखिए
  "
खत्म हो आरक्षण : संघ "
"
आरक्षण खत्म हो, संविधान में सेक्यूलर शब्द पर पुनर्विचार की आवश्यकता  : वैद्य" । आदि आदि
नेताओं से इस प्रकार की प्रतिक्रिया अपेक्षित होती है लेकिन मीडिया ! उसने यह अज्ञानतावश किया है ऐसा सोचना मूर्खता ही होगी लेकिन सोचिए अगर यह सोच समझ कर किया गया है तो किस मकसद से किया गया?
मीडिया  और राजनेता दोनों ही अपने अपने स्वार्थों  की रक्षा करने में देश को लगातार गुमराह करने में लगे हैं।
अगर आप इस खेल को समझना चाहते हैं तो आपको अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस विषय पर सोचना होगा। क्योंकि यहाँ बात किसी राजनैतिक दल के समर्थन या विरोध की न होकर इस देश के  हित की है।
इसके लिए आपको केवल इतना करना है कि उनके द्वारा कहे गए शब्दों को एक बार अपनी आँखें बंद कर के फिर से सुनें लेकिन यह कल्पना करते हुए कि लालूप्रसाद यादव बोल रहे हैं।
क्या लालूप्रसाद यादव के मुख से भी हम उस वाक्य का यही अर्थ निकालेंगे?
चलिए एक बार फिर हम आँखें बंद करके इस वाक्य को सुनने की कोशिश करते हैं लेकिन इस बार हम अपनी कल्पना में इसे सुश्री मायावती जी के पावन मुख से सुनने की कोशिश करते हैं। क्या हुआ? क्या अब भी हमने इसका वो ही अर्थ निकाला जो मनमोहन वैद्य अथवा एक संघ प्रचारक के मुख से सुनने के बाद निकाला गया?
दरअसल शब्द इतने महत्वपूर्ण नहीं होते जितना यह तथ्य कि यह किसके मुख से निकले हैं ।
किन्तु  विषय यहाँ यह है कि एक आम आदमी अपने पूर्वाग्रहों के बन्धन में बंध कर किसी भी वक्तव्य को समझे इसमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन दुर्भागय यह है कि उसे हमारे देश में न सोचने का न समय दिया जाता है न ही मौका।
इससे पहले कि वह किसी बयान को पढ़ या सुन कर समझ भी पाए , मूल बयान के विरोध या पक्ष में  (सुविधानुसार) इतनी प्रतिक्रियाएँ और बयानों की बाढ़ आ जाती हैं कि मूल बयान को तो लोग न पढ़ पाते हैं न समझ पाते हैं अगर कुछ समझ पाते हैं तो केवल इतना कि 'कुछ विवादित ' हो गया है। और फिर हर व्यक्ति का झुकाव अपने पसंद की पार्टी या फिर नेता की तरफ हो जाता है।
इस देश के हर नागरिक को हक है अपनी पसंद का नेता या फिर पार्टी को चुनने का लेकिन आज इस देश का कुछ मीडिया और नेता  बहुत ही चतुराई से इस आम आदमी की सोच को ही बदलने का काम कर रहा है। जिस प्रकार बच्चों की सोच को विज्ञापन प्रभावित करते हैं उसी प्रकार  खबरों का  प्रस्तुतीकरण भी हमारी सोच को प्रभावित करता है।
इसलिए आज आवश्यक हो गया है कि आम आदमी अपने अधिकारों को समझे , खबर को निष्पक्ष रूप से पढ़े और खुद अपने विचार बनाए कि उसके लिए और देश के लिए क्या हितकर है।
अगर आप उनके बयान को गौर से पढ़ें और समझें, उन्होंने केवल यह कहा है कि इस देश के हर नागरिक को समान अवसर दिए जाँए तो इसमें गलत क्या है? यह तो हमारे संविधान में ही लिखा है।
जिन दलितों के हिमायती आज लालू और मायावती बन रहे हैं आज सालों के आरक्षण और इनके जैसे नेताओं के होते हुए भी इनकी स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो पाया? वे आज तक 'शोषित ' क्यों हैं?
क्यों आप उन्हें समान अवसर दिलवाकर उनकी सामाजिक स्थिति सुधारने के पक्षधर नहीं हैं लेकिन 'आरक्षण ' के जाल में बाँधकर 'शोषित वर्ग ' ही रखने के पक्षधर हैं  ?
एक बयान पर आपको इतना गुस्सा आ गया कि आप " राजनीति भुलवाने" पर उतारू हो गईं और लालू " धोने " पर इतने सालों से इस तबक़े की दयनीय स्थिति पर कभी इतना गुस्सा क्यों नहीं आया और कहा कि अगर हम  सत्ता में आएंगे तो इस वर्ग को पाँच सालों में ही इस काबिल बना देंगे कि इन्हें आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी?
हे दलितों, सालों से होने वाला तुम्हारा शोषण हम खत्म करेंगे, न शोषण रहेगा न आरक्षण  ?
लेकिन आप यह इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि वह आप जैसे लोग ही हैं जो सालों से इन गरीब लोगों का शोषण कर रहे हैं उनकी आज्ञानता का फायदा उठाकर । सच्चाई यह है कि आप जैसे राजनेता इन्हें दलित या शोषित नहीं केवल अपना
"वोट बैंक" समझते हैं इसलिए आपकी राजनीति  'आरक्षण' से आगे चलकर 'विकास और समान अवसर ' की बातें समझ नहीं पाती ।
डॉ नीलम महेंद्र

कई सच छुपाए गए तो कई अधूरे बताए गए

कई सच छुपाए गए तो कई अधूरे बताए गए


अपनी आजादी की कीमत तो हमने भी चुकाई है
तुम जैसे अनेक वीरों को खो के जो यह पाई है।

कहने को तो हमारे देश को 15 अगस्त 1947 में आजादी मिली थी लेकिन क्या यह पूर्ण स्वतंत्रता थी?
स्वराज तो हमने हासिल कर लिया था लेकिन उसे ' सुराज ' नहीं बना पाए ।
क्या कारण है कि हम आज तक आजाद नहीं हो पाए सत्ता धारियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं से जिनकी कीमत आज तक पूरा देश चुका रहा है?
आजादी के समय से  ही नेताओं द्वारा अपने निजी स्वार्थों को राष्ट्र हित से ऊपर रखा जाने का जो सिलसिला आरंभ हुआ था वो आज तक जारी है।
राजनीति के इस खेल में न सिर्फ इतिहास को तोड़ा मरोड़ा गया बल्कि कई सच छुपाए गए तो कई अधूरे बताए गए।
22 अगस्त 1945, जब टोक्यो रेडियो से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 18 अगस्त, ताइवान में एक प्लेन क्रैश में मारे जाने की घोषणा हुई , तब से लेकर आज तक उनकी मौत इस देश की अब तक की सबसे बड़ी अनसुलझी पहेली बनी हुई है।
किन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मृत्यु के लगभग 70 सालों बाद भी यह एक रहस्य है या फिर किसी स्वार्थ वश इसे रहस्य बनाया गया है ?
उनकी 119 वीं जयन्ति पर जब मोदी सरकार ने जनवरी2016 में उनसे जुड़ी गोपनीय फाइलों को देश के सामने रखा, ऐसी उम्मीद थी कि अब शायद रहस्य से पर्दा उठ जाएगा लेकिन रहस्य बरकरार है।

यह अजीब सी बात है कि उनकी मौत की जांच के लिए 1956 में शाहनवाज समिति और 1970 में खोसला समिति दोनों के ही अनुसार नेताजी उक्त विमान दुर्घटना में मारे गये थे  इसके बावजूद उनके परिवार की जासूसी  कराई जा रही थी क्यों?
जबकि 2005 में गठित मुखर्जी आयोग ने ताइवान सरकार की ओर से बताया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी !जब दुर्घटना ही नहीं तो मौत कैसी ?
उन्हें 1945 के बाद भी उन्हें रूस और लाल चीन में देखे जाने की बातें पहली दो जांच रिपोर्टों पर प्रश्न चिह्न लगाती हैं।
इस देश का वो स्वतंत्रता सेनानी जिसके जिक्र के बिना स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अधूरा है वो  किसी गुमनाम मौत का हकदार कदापि नहीं था। 
इस देश को हक है उनके विषय में सच जानने का, एक ऐसा वीर योद्धा  जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की नाक में जीते जी ही नहीं बल्कि अपनी मौत की खबर के बाद भी दम करके रखा था ।
उनकी मौत की खबर पर न सिर्फ अंग्रेज बल्कि खुद नेहरू को भी यकीन नहीं था जिसका पता उस पत्र से चलता है जो उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली को लिखा था, 27 दिसंबर 1945  कथित दुर्घटना के चार महीने बाद। खेद का विषय यह है कि इस चिठ्ठी में नेहरू ने भारत के इस महान स्वतंत्रता सेनानी को ब्रिटेन का 'युद्ध बंदी ' कह कर संबोधित किया, हालांकि कांग्रेस द्वारा इस प्रकार के किसी भी पत्र का खंडन किया गया है।
नेताजी की प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी का कहना है कि अगर मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट बिना सम्पादित करे सामने रख दी जाए तो सच सामने आ जाएगा ।
बहरहाल फाइलें तो खुल गईं हैं सच सामने आने का इंतजार है।
जिस स्वतंत्रता को अहिंसा से प्राप्त करने का दावा किया जाता है उसमें 'तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा ' का नारा देकर आजाद हिन्द फौज से अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजाने वाले नेताजी को इतिहास में अपेक्षित स्थान मिलने का आज भी इंतजार है।
मात्र 15 वर्ष की आयु में  सम्पूर्ण विवेकानन्द साहित्य पढ़ लेने के कारण उनका व्यक्तित्व न सिर्फ ओजपूर्ण था अपितु राष्ट्र भक्ति से ओत प्रोत भी था। यही कारण था कि अपने पिता की इच्छा के विपरीत आईसीएस में चयन होने के बावजूद उन्होंने देश सेवा को चुना और भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने की कठिन डगर पर चल पड़े। उन्हें अपने इस फैसले पर आशीर्वाद मिला अपनी माँ प्रभावति के उस पत्र द्वारा जिसमें उन्होंने लिखा  " पिता, परिवार के लोग या अन्य कोई कुछ भी कहे मुझे अपने बेटे के इस फैसले पर गर्व है  "
20 जुलाई 1921 को गाँधी जी से वे पहली बार मिले और शुरू हुआ उनका यह सफर जिसमें लगभग 11 बार अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें कारावास में डाला।
कारावास से बाहर रहते हुए अपनी वेश बदलने की कला की बदौलत अनेकों बार अंग्रेजों की नाक के नीचे से फरार भी हुए।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 1938 में जिन गाँधी जी ने नेता जी को काँग्रेस का अध्यक्ष बनाया , उनकी कार्यशैली और विचारधारा से असन्तोष के चलते आगे चलकर उन्हीं गाँधी जी का विरोध नेता जी को सहना पड़ा ।
लेकिन उनके करिश्माई व्यक्तित्व के आगे गाँधी जी की एक न चली।
किस्सा कुछ यूँ है कि गाँधी जी नेता जी को अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे लेकिन कांग्रेस में कोई नेताजी को हटाने को तैयार नहीं था तो बरसों बाद कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ। गाँधी जी ने नेहरू का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे किया किन्तु हवा के रुख को भाँपते हुए नेहरू जी ने मौलाना आजाद का नाम आगे कर दिया । मौलाना ने भी हार के डर से अपना नाम वापस ले लिया । अब गाँधी जी ने पट्टाभि सीतारमैया का नाम आगे किया। सब जानते थे कि गाँधी जी सीतारमैया के साथ हैं इसके बावजूद नेता जी को 1580 मत मिले और गाँधी जी के विरोध के बावजूद सुभाष चन्द्र बोस 203 मतों से विजयी हुए। लेकिन जब आहत गाँधी जी ने इसे अपनी 'व्यक्तिगत हार' करार दिया तो नेताजी ने अपना स्तीफा दे दिया और अपनी राह पर आगे बढ़ गए।
यह उनका बड़प्पन ही था कि 6 जुलाई 1944 को आजाद हिन्द रेडियो पर आजाद हिन्द फौज की स्थापना एवं उसके उद्देश्य की घोषणा करते हुए गाँधी जी को राष्ट्र पिता सम्बोधित करते हुए न सिर्फ उनसे आशीर्वाद माँगा किन्तु उनके द्वारा किया गया अपमान भुलाकर उनको सम्मान दिया।
बेहद अफसोस की बात है कि अपने विरोधियों को भी सम्मान देने वाले नेताजी अपने ही देश में राजनीति का शिकार बनाए गए लेकिन फिर भी उन्होंने आखिर तक हार नहीं मानी।
वो नेताजी जो अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध अपने देश को न्याय दिलाने के लिए अपनी आखिरी सांस तक लड़े उनकी आत्मा आज स्वयं के लिए न्याय के इंतजार में हैं ।
ऐसे महानायकों के लिए ही कहा जाता है कि धन्य है वो धरती जिस पर तूने जन्म लिया, धन्य है वो माँ जिसने तुझे जन्म दिया।
डॉ नीलम महेंद्र