Monday, 25 September 2017

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफल सरकार आखिर राष्ट्रीय मोर्चों पर असफल क्यों

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफल सरकार आखिर राष्ट्रीय मोर्चों पर असफल क्यों


मार्च 2017 में उप्र के चुनावी नतीजों के बाद देश भर के विभिन्न मीडिया सर्वे में जुलाई तक जिस मोदी को एक  ऐसे तूफान का नाम दिया जा था जिसे रोक पाना किसी भी पार्टी के लिए "मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन है", वही मीडिया सर्वे सितम्बर माह के आते आते मोदी के तेजी से दौड़ते विजयी रथ को ब्रेक लगाते दिखाई दे रहे हैं।
अगर उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों की बात की जाए तो पिछले साल की तुलना में मोदी सरकार से संतुष्ट लोगों की संख्या में 2% की गिरावट आई है (46% से 44%) वहीं दूसरी तरफ इस सरकार से असंतुष्ट लोगों की संख्या में  3% से 36% की वृद्धि हुई है
कल तक जो सोशल मीडिया मोदी की तारीफों से भरा रहता था आज वो ही विपक्षी दलों द्वारा मोदी सरकार के दुष्प्रचार का सबसे बड़ा जरिया बन गया है।
बात यहाँ तक कही जा रही है कि ‘द टेलीग्राफ‘ के अनुसार संघ के एक अन्दरूनी सर्वे में यह बात सामने आई है कि 2019  में मोदी की चुनावी राह में बिछे फूलों की जगह काँटों ने ले ली है।
तो आखिर इन दो महीनों में ऐसा क्या हो गया

देश की जनता जो मोदी के हर निर्णय को सर आँखों पर इस कदर बैठाती थी कि उसे  'अन्धभक्त' तक का दर्जा दे दिया गया था आज देश हित में दूरगामी प्रभाव वाले पेट्रोल की बढ़ती कीमत को सहजता के साथ स्वीकार नहीं कर पा रहीं है।
घरेलू मोर्चे पर सरकार की परफोर्मेन्स की अगर बात की जाए तो देश में बढ़ती हुई महंगाई के बावजूद भारत का आम आदमी आज भी इस बात को मानता है कि देश की बागडोर ईमानदार हाथों में है और मोदी द्वारा लिए गए  फैसले जैसे नोटबंदी, जीएसटी, डिजिटल इंडिया, स्वच्छता अभियान, शौचालयों का निर्माण ,मेक इन इंडिया, ये सभी देश हित में लिए गए वो फैसले  थे जिनके नतीजे आशा के अनुरूप नहीं निकले (क्योंकि ये सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए)
इसके परिणामस्वरूप नोटबंदी तक जो आम आदमी परेशानियों का सामना करने के बावजूद मोदी सरकार के इस कदम में उनके साथ था, जीएसटी के आते आते उसके सब्र का बांध टूटने लगा और मध्यम वर्ग खास तौर पर व्यापारी वर्ग का इस सरकार से मोह भंग होने लगा। उसे लगने लगा कि अपने प्रधानमंत्री द्वारा बनाए गए जिन कानूनों का पालन करने के लिए वो हर प्रकार की तकलीफों का सामना करने के लिए तैयार है उन कानूनों की धज्जियां वे ही लोग उड़ा रहे हैं जिन पर उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
वहीं अगर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकार के काम की समीक्षा की जाए तो तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक, डोकलाम विवाद,ब्रिक्स सम्मेलन और यूएन  में पाकिस्तान और आतंकवाद पर, विश्व का भारत के  साथ होना ,एक तरफ सालों से अमेरिका के साथ ठंडे सम्बन्धों में गर्माहट तो दूसरी तरफ रूस के साथ सम्बन्धों को बरकरार रखना,इजरायल,साउदी अरब, ईरान आदि देशों से सम्बन्ध स्थापित कर देश के युवाओं के लिए नई राहों के अवसर खोलना ,स्वतंत्रता के 70 सालों पुराना बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद सुलझाना,ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिन पर काम करके इस सरकार ने विश्व पटल पर भारत का नाम पहुंचाया है।
यानी कूटनीति,विदेश नीति,और राजनीति के मंचों पर सफल होने वाली सरकार घरेलू नीतियों में बाजी हार गई।
या फिर ऐसा भी कहा जा सकता है कि जो सरकार अन्तराष्ट्रीय मोर्चों पर सफल हो रही है वो घरेलू मोर्चे पर असफल हो रही है।
अब जो आदमी उपर्युक्त तथ्यों से सहमत होगा वो बहुत ही आसानी से इसके कारण को भी समझ लेगा कि भूल मोदी से कहाँ हुई।
दरअसल उन्होंने इस देश के नौकरशाहों को समझने में भूल कर दी। इस देश में सालों से फैले भ्रष्टाचार की जड़ों की गहराई आँकने में भूल कर दी।
देश तो मोदी और उनके फैसलों में मोदी के साथ था लेकिन वे लोग जिन पर मोदी के फैसलों को अमल में लाने की जिम्मेदारी थी, जिन पर देश बदलने की जिम्मेदारी थीवो खुद तो नहीं बदले लेकिन अपने कारनामों से मोदी के फैसलों के परिणाम जरूर बदल दिए। बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से कैसे सारा काला धन सफेद हो गया वो पूरा देश जानता है।
जनधन खातों का दुरुपयोग खाताधारक ने किया या फिर बैंकों ने यह जगजाहिर है।
शौचालय निर्माण के नाम पर जो फर्जीवाड़ा हुआ है वो उस गरीब ने किया है जिसके नाम पर शौचालय निर्माण के पैसे तो ले लिए गए लेकिन शौचालय का नामोनिशान नहीं है या फिर उस अधिकारी ने जिस पर इसकी जिम्मेदारी थी?
और क्या इस अधिकारी के सीनियर को इस बात की जानकारी नहीं थी या फिर वो भी इस फर्जीवाड़े में शामिल था?
पहले स्वच्छता अभियान और अब स्मार्ट सिटी के नाम पर जो गोरखधंधा हो रहा है क्या वो इस देश की आम जनता कर रही है?
कुल मिलाकर इन तीन सालों में काम उन्हीं मोर्चों पर हुआ जिन पर पीएमओ का सीधा दखल था और जिन मोर्चों की जिम्मेदारी आगे सौंप दी गई वो सालों पुरानी परंपरानुसार  फाइलों में दफन कर दी गई।
2014
में जिस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सवार होकर  मोदी जीतकर आए थे,आज  वो ही मुद्दा मोदी की जीत में रुकावट बनकर खड़ा  है फर्क है तो इतना कि पहले सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते थे लेकिन आज सरकार खुद भले ही पाक साफ है लेकिन अपने नौकरशाहों के कारण वो कटघड़े में है।
इस बात से तो उनके विरोधी भी इंकार नहीं कर सकते कि जिस देश में वोटों की राजनीति होती हो और राजनैतिक पार्टियों की नजर में जिस देश का नागरिक वोट बैंक से अधिक और कुछ भी न हो उस देश के प्रधानमंत्री के लिए नोटबंदी करना और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर बात करना वाकई में कब एक  "साहसिक फैसले" से  "आत्मघाती फैसले" में बदल जाते हैं पता नहीं चलता उस देश में मोदी ने ऐसे फैसले लेने का जोखिम उठाया।
अगर इस देश में कुर्सी पर बैठा हर नेता और नौकरशाह ईमानदारी से अपना काम करता तो यह तीन साल इस देश की तकदीर बदलने के लिए एक मजबूत नींव का काम करते लेकिन इनकी बेईमानी ने देश की तकदीर भले ही नहीं बदली मोदी की कार्यशैली के प्रति लोगों की सोच अवश्य बदल दी।
अब अगर मोदी को  लोगों का भरोसा बरकरार रखना है तो उन्हें पहले अपने  नौकरशाहों को जीतना होगा, देश और  जनता के प्रति उनकी जवाबदेही तय करनी होगी नहीं तो जिस सपनों के भारत का सपना उन्होंने देखा और दिखाया है कहीं वो सपना ही न रह जाए।
डॉ नीलम महेंद्र

Friday, 22 September 2017

क्यों ना हम पहले आपने अन्दर के रावण को मारें

क्यों ना हम पहले आपने अन्दर के रावण को मारें



“रावण को हराने के लिए  पहले खुद राम बनना पड़ता है ।“
विजयादशमी यानी अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि जो कि विजय का प्रतीक है।
वो विजय जो श्रीराम ने पाई थी रावण पर, वो रावण जो प्रतीक है बुराई का, अधर्म का ,अहम् का, अहंकार का और पाप का,
वो जीत जिसने पाप के साम्राज्य का जड़ से नाश किया।
लेकिन क्या बुराई हार गईं?
पाप का नाश हो गया?
क्या रावण वाकई मर गया?
युगों से साल दर साल पूरे देश में रावण का पुतला जलाकर दशहरे का त्यौहार मनाया जाता है।
अगर रावण सालों पहले मारा गया था तो फिर वो आज भी हमारे बीच जीवित कैसे है?
अगर रावण मर गया था तो वो कौन है जिसने अभी हाल ही में एक सात साल के मासूम की बेरहमी से जान लेकर एक माँ की गोद ही उजाड़ दी?
वो कौन है जो आए दिन हमारी अबोध बच्चियों को अपना शिकार बनाता है?
वो कौन है जो हमारी बेटियों को दहेज के लिए मार देता है?
वो कौन है जो पैसे और पहचान के दम पर किसी और के हक को मार कर उसकी जगह नौकरी ले लेता है?
वो कौन है जो सरकारी पदों का दुरुपयोग करके भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है?
वो कौन है जो किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति के दर्द को नजरंदाज करते हुए घटना का वीडिओ बनाना ज्यादा जरूरी समझता है बजाए उसे अस्पताल ले जाने के ?
एक वो रावण था जिसने सालों कठिन तपस्या करके ईश्वर से शक्तियां अर्जित की और फिर इन शक्तियों के दुरुपयोग से अपने पाप की लंका का निर्माण किया था।
और एक आज का रावण है जो पैसे पद वर्दी अथवा ओहदे रूपी शक्ति को अर्जित करके उसके दुरुपयोग से पूरे समाज को ही पाप की लंका में बदल रहा है।
क्या ये रावण नहीं है जो आज भी हमारे ही अन्दर हमारे समाज में जिंदा है?
हम बाहर उसका पुतला जलाते हैं लेकिन अपने भीतर उसे पोषित करते हैं।
उसे पोषित ही नहीं करते बल्कि आजकल तो हमें राम से ज्यादा रावण आकर्षित करने लगा है
हमारे समाज में आज नायक की परिभाषा में राम नहीं रावण फिट बैठ रहा है
किस साजिश के तहत हमारी भावी पीढ़ी को राम नहीं  रावण बनने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है?
रावण जो कि प्रतीक है बुराई का अहंकार का अधर्म का आज तक जीवित इसलिए है कि हम उसके प्रतीक एक पुतले को जलाते हैं न कि उसे।
जबकि अगर हमें रावण का सच में नाश करना है तो हमें उसे ही जलाना होगा उसके प्रतीक को नहीं।
वो रावण जो हमारे ही अन्दर है लालच के रूप में, झूठ बोलने की प्रवृत्ति के रूप में, अहंकार के रूप में, स्वार्थ के रूप में,वासना के रूप में,आलस्य के रूप में, उस शक्ति के रूप में जो आती है पद और पैसे से,ऐसे कितने ही रूप हैं जिनमें छिपकर रावण हमारे ही भीतर रहता है, हमें उन सभी को जलाना होगा।
इसका नाश  हम  कर सकते हैं और हमें ही करना भी होगा।
जिस प्रकार अंधकार का नाश करने के लिए एक छोटा सा दीपक ही काफी है, उसी प्रकार हमारे समाज में व्याप्त इस रावण का नाश करने के लिए एक सोच ही काफी हैं।
अगर हम अपने आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान बनाएंगे ,उन्हें नैतिकता का ज्ञान देंगे,स्वयं राम बनकर उनके सामने उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो इतने सारे रामों के बीच क्या रावण टिक पाएगा?
क्यों हम साल भर इंतजार करते हैं रावण वध के लिए?
वो सतयुग था जब एक ही रावण था लेकिन आज कलयुग है, आज अनेक रावण हैं।
उस रावण के दस सिर थे लेकिन हर सिर का एक ही चेहरा था जबकि आज के रावण का सिर भले ही एक है पर चेहरे अनेक हैं,
चेहरों पे चेहरे हैं जो नकाबों के पीछे छिपे हैं।
इसलिए इनके लिए एक दिन काफी नहीं है, इन्हें रोज मारना हमें अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।
उस रावण को प्रभु श्रीराम ने तीर से मारा था,
आज हम सबको राम बनकर उसे संस्कारों से,ज्ञान से और अपनी इच्छाशक्ति से मारना होगा।
डॉ नीलम महेंद्र 

Saturday, 16 September 2017

साहब भारत इसी तरह तो चलता है

साहब भारत इसी तरह तो चलता है


वैसे तो भारत में राहुल गाँधी जी के विचारों से बहुत कम लोग इत्तेफाक रखते हैं (यह बात 2014 के चुनावी नतीजों ने जाहिर कर दी थी)  लेकिन अमेरिका में बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में जब उन्होंने वंशवाद पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में  "भारत इसी तरह चलता है  " कहा, तो सत्तारूढ़ भाजपा और कुछ खास लोगों ने भले ही उनके इस कथन का विरोध किया हो लेकिन देश के आम आदमी को शायद इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा होगा। काबिले तारीफ बात यह है कि वंशवाद को स्वयं भारत के एक नामी राजनैतिक परिवार के व्यक्ति ने अन्तराष्ट्रीय मंच पर बड़ी साफगोई के साथ स्वीकार किया, क्या यह एक छोटी बात है?
यूँ तो हमारे देश में वंश या  'घरानों' का आस्तित्व शुरू से था लेकिन उसमें परिवारवाद से अधिक योग्यता को तरजीह दी जाती थी जैसे संगीत में ग्वालियर घराना,किराना घराना, खेलों में पटियाला घराना,होलकर घराना,रंजी घराना,अलवर घराना आदि लेकिन आज हमारा समाज इसका सबसे विकृत रूप देख रहा है।
अभी कुछ समय पहले उप्र के चुनावों में माननीय प्रधानमंत्री को भी अपनी पार्टी के नेताओं से अपील करनी पड़ी थी कि नेता अपने परिवार वालों के लिए टिकट न मांगें। लेकिन पूरे देश ने देखा कि उनकी इस अपील का उनकी अपनी ही पार्टी के नेताओं पर क्या असर हुआ। आखिर पूरे देश में ऐसा कौन सा राजनैतिक दल है जो अपनी पार्टी
के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले एक साधारण से कार्यकर्ता को टिकट देने का जोखिम उठाता है?
क्या यह सही नहीं है कि आज भी एक साधारण या निम्न परिवार के किसी भी नौजवान के लिए किसी भी क्षेत्र के सिंडीकेट को तोड़ कर सफलता प्राप्त करना  इस देश में आम बात नहीं है? क्योंकि अगर ये आम बात होती तो ऐसे ही किसी युवक या युवती की सफलता अखबारों की हेडलाडन क्यों बन जाती हैं कि एक फल बेचने वाले के बेटे या बेटी ने फलाँ मुकाम हासिल किया?
क्या वाकई में एक आम प्रतिभा के लिए और किसी 'प्रतिभा' की औलाद के लिए, हमारे समाज में समान अवसर मौजूद हैं?
क्या कपूर खानदान के
रणबीर कपूर और बिना गोडफादर के रणवीर सिंह या नवाजुद्दीन सिद्दीकी  जैसे किसी नोन फिल्मी बैकग्राउंड वाले लड़के या लड़की को फिल्मी दुनिया में समान अवसर प्राप्त हैं?
क्या अभिषेक बच्चन को भी अमिताभ बच्चन जितना संघर्ष अपनी पहली फिल्म के लिए करना पड़ा था?
भले ही कल भारत वो देश था जहाँ राजा भरत ने अपने नौ पुत्रों के होते हुए भी अपना उत्तराधिकारी अपनी प्रजा के एक सामान्य युवक भूमन्यू को बनाया क्योंकि उन्हें अपने बाद अपने देश और प्रजा की चिंता अपने वंश से अधिक थी। लेकिन आज का कटु सत्य तो यही है कि हमारे समाज में आज हर क्षेत्र में आपकी तरक्की आपकी प्रतिभा से नहीं आपकी पहचान से होती है। आपकी योग्यता और बड़ी बड़ी डिग्रीयाँ बड़े बड़े नामों से हार जाती हैं।
आगे बढ़ने के लिए  'बस नाम ही काफी है '
शेखस्पीयर ने बरसों पहले कहा था कि  "नाम में क्या रखा है" लेकिन सच्चाई यह है कि नाम अगर भारत देश में गाँधी हो, मध्यप्रदेश या राजिस्थान में सिंधिया हो, पंजाब में बादल हो,यूपी और बिहार में यादव हो,महाराष्ट्र में ठाकरे हो,कश्मीर में अब्दुल्ला या मुफ्ती मुहम्मद हो,हरियाणा में चौटाला हो ( लिस्ट बहुत लम्बी है) तो इंसान के नसीब ही बदल जाते हैं।
नाम की बात जीवित इंसानों तक ही सीमित हो ऐसा भी नहीं है। अभी हाल ही में अन्नाद्रमुक ने अपनी ताजा बैठक में दिवंगत जयललिता को पार्टी का स्थायी महासचिव बनाने की घोषणा की। यानी कि वे मृत्यु के उपरांत भी पार्टी का नेतृत्व करेंगी  !
संभवतः दुनिया में मरणोपरांत भी किसी पार्टी का नेतृत्व करने की इस प्रकार की पहली घटना का साक्षी बनने वाला भारत पहला देश है और जयललिता पहली नेत्री।
कदाचित यह वंशवाद केवल राजनीति में ही हो ऐसा भी नहीं है। कला संगीत सिनेमा खेल न्यायपालिका व्यापार डाक्टरों हर जगह इसका आस्तित्व है।
सिनेमा में व्याप्त वंशवाद के विषय में कंगना बोल ही चुकी हैं।
देश में चलने वाले सभी प्राइवेट अस्पतालों को चलाने वाले डाक्टरों के बच्चे आगे चलकर डाक्टर ही बनते हैं।क्या आज डाक्टरी सेवा कार्य से अधिक एक पारिवारिक पेशा नहीं बन गया है? क्या इन अस्पतालों को चलाने वाले डाक्टर अस्पताल की विरासत अपने यहाँ काम करने वाले किसी काबिल डाक्टर को देते हैं ? जी नहीं वो काबिल डाक्टरों को अपने अस्पताल में नौकरी पर रखते हैं और अपनी नाकाबिल संतानों को डाक्टर की डिग्री व्यापम से दिलवा देते हैं।
आज जितने भी प्राइवेट स्कूल हैं वो शिक्षा देने के माध्यम से अधिक क्या एक
खानदानी  पेशा नहीं बन गए हैं? इनकी विरासत मालिक द्वारा क्या अपने स्कूल के सबसे योग्य टीचर को दी जाती है या फिर अपनी औलाद को?
क्या न्यायपालिका में कोलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति परिवारवाद और भाई भतीजावाद के आधार पर नहीं होती?
और जब वंशवाद और परिवारवाद के इस तिलिस्म को तोड़ कर एक साधारण से परिवार का व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का जज बनता है या फिर कोई अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बनता है या
कोई चाय बेचने वाला  प्रधानमंत्री बनता है या  फिर स्मृति ईरानी मानव संसाधन मंत्री बनी थीं या फिर निर्मला सीतारमन रक्षा मंत्री बनती हैं तो वो हमारे न्यूज़ चैनलों की  "ब्रेकिंग न्यूज़"  बन जाती है, यही सच्चाई है।
डॉ नीलम महेंद्र

Tuesday, 12 September 2017

देश में न्याय की उम्मीद जगाते हाल के फैसले

देश में न्याय की उम्मीद जगाते हाल के फैसले


अभी हाल ही में भारत में कोर्ट द्वारा जिस प्रकार से फैसले दिए जा रहे हैं वो देश में निश्चित ही एक सकारात्मक बदलाव का संकेत दे रहे हैं।
24
साल पुराने मुम्बई बम धमाकों के लिए अबु सलेम को आजीवन कारावास का फैसला हो या 16 महीने के भीतर ही बिहार के हाई प्रोफाइल गया रोडरेज केस में आरोपियों को दिया गया उम्र कैद का फैसला हो , देश भर में लाखों अनुनाईयों और राजनैतिक संरक्षण प्राप्त डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम का केस हो या फिर देश के अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े तीन तलाक का मुकदमा हो।
इन सभी में कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों ने देश के लोगों के मन में न्याय की धुंधली होती तस्वीर के ऊपर चढ़ती धुंध को कुछ कम करने का काम किया है।
देश के जिस आम आदमी के मन में अबतक यह धारणा बनती जा रही थी कि कोर्ट कचहरी से न्याय की आस में जूते चप्पल घिसते हुए पूरी जिंदगी निकाल कर अपनी भावी पीढ़ी को भी इसी गर्त में डालने से अच्छा है कि कोर्ट के बाहर ही कुछ ले दे कर समझौता कर लिया जाए।
वो आम आदमी जो लड़ने से पहले ही अपनी हार स्वीकार करने के लिए मजबूर था आज एक बार फिर से अपने हक और न्याय की आस लगाने लगा है।
जिस प्रकार आज उसके पास उम्मीद रखने के लिए कोर्ट के हाल के फैसले हैं इसी प्रकार कल उसके पास उम्मीद खोने के भी ठोस कारण थे।
उसने न्याय को बिकते और पैसे वालों को कानून का मजाक उड़ाते देखा था।
उसने एक अभिनेता को अपनी गाड़ी से कई लोगों को कुचलने के बाद और हिरण का शिकार करने के बावजूद उसे कोर्ट से बाइज्जत बरी होते देखा था।
उसने दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड में 18 साल बाद आए फैसले में आरोपियों को सज़ा देने के बजाए दिल्ली सरकार को मुआवजा देकर छोड़ने का फैसला  देखा था।
उसने भोपाल गैस त्रासदी में लाखों लोगों के प्रभावित होने और 3787 लोगों के मारे जाने के बावजूद ( हालांकि अनाधिकृत संख्या 16000 के ऊपर है) उस पर आने वाला बेमतलब का फैसला देखा था।
उसने जेसिका लाल की हत्या के हाई प्रोफाइल आरोपीयों को पहले कोर्ट से बरी होते लेकन फिर मीडिया और जनता के दबाव के बाद उन्हें दोषी मानते हुए अपना ही फैसला पलट कर दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाते देखा था।
उसने न्यायालयों में मुकदमों के फैसले आते तो बहुत देखे थे लेकिन न्याय होता अब देख रहा है।
उसने इस देश में एक आम आदमी को न्याय के लिए संघर्ष करते देखा है।
उसने इस देश की न्यायिक प्रणाली की दुर्दशा पर खुद चीफ जस्टिस को  रोते हुए देखा है।
जिस कानून से वह न्याय की उम्मीद लगाता है उसी कानून के सहारे उसने अपराधियों को बच के निकलते हुए देखा है।
दरअसल हमारे देश में कानूनों की कमी नहीं है लेकिन उनका पालन करने और करवाने वालों की कमी जरूर है।
कल तक हम कानून से खेलने वाला एक ऐसा समाज बनते जा रहे थे जहाँ पीड़ित का संघर्ष पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाने के साथ ही शुरू हो जाता था।
राम रहीम से पीड़ित साधवी का उदाहरण हमारे सामने है।उन्हें अपनी पहचान छिपाते हुए देश के सर्वोच्च व्यक्ति माननीय प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी पीड़ा बयान करनी पड़ी थी फिर भी न्याय मिलने में 15 साल और भाई का जीवन लग गया।
यह वो देश है जहाँ बलात्कार की पीड़ित एक  अबोध बच्ची को कानूनी दाँवपेंचों का शिकार हो कर 10 वर्ष की आयु में एक बालिका को जन्म देना पड़ता है।
जहाँ साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को सुबूतों के अभाव के बावजूद सालों जेल में रहना पड़ता है ।
जान मार्शल जो कि अमेरिका के चौथे चीफ जस्टिस थे,उनका कहना था कि ' न्याय व्यवस्था की शक्ति प्रकरणों का निपटारा करने,फैसला देने या किसी दोषी को सजा सुनाने में नहीं है,यह तो आम आदमी का भरोसा और विश्वास जीतने में निहित है।'
जबकि भारत में इसके विपरीत मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति किरुबकरन को एक अवमानना  मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय न्याय व्यवस्था के विषय में कहना पड़ा कि देश की जनता पहले ही न्यायपालिका से कुण्ठित है अतः पीड़ित लोगों में से मात्र 10% अर्थात अतिपीड़ित ही न्यायालय तक पहुँचते हैं।
बात केवल अदालतों से न्याय नहीं मिल पाने तक सीमित नहीं थी, बात न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाले समय की भी है लेकिन यह एक अलग विषय है जिस पर चर्चा फिर कभी।
जब कोर्ट में न्याय के बजाय तारीखें मिलती हैं तो सिर्फ उम्मीद नहीं टूटती हिम्मत टूटती है, सिर्फ पीड़ित व्यक्ति नहीं हारता उसका परिवार नहीं हारता लेकिन यह हार होती है उस न्याय व्यवस्था की जो अपने देश के हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की भी रक्षा नहीं कर पाती।
कहते हैं कानून अँधा होता है लेकिन  हमारे देश में तो पिछले कुछ समय से वो अंधा ही नहीं बहरा भी होता जा रहा था। उसे न्याय से महरूम हुए लोगों की चीखें भी सुनाई नहीं दे रही थीं।
किन्तु  आज फिर से इस देश के जनमानस को इस देश की कानून व्यवस्था पर भरोसा होने लगा है कि न्याय की देवी की आँखों पर जो  पट्टी अबतक  इसलिए  बंधी थी  कि वह सबकुछ देख कर अनदेखा कर देती थी  लेकिन अब  इसलिए बंधी होगी कि उसके सामने कौन खड़ा है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होगा और उनकी नज़र में सब बराबर हैं यह   केवल एक जुमला नहीं यथार्थ होगा।
डॉ नीलम महेंद्र

Monday, 4 September 2017

35A जैसे दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए

35A जैसे दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए


भारत का हर नागरिक गर्व से कहता कि कश्मीर हमारा है लेकिन फिर ऐसी क्या बात है कि आज तक हम कश्मीर के नहीं हैं?
भारत सरकार कश्मीर को सुरक्षा सहायता संरक्षण और विशेष अधिकार तक  देती है लेकिन  फिर भी भारत के नागरिक के कश्मीर में कोई मौलिक अधिकार भी नहीं है?
आज पूरे देश में 35A पर जब बात हो रही हो और मामला कोर्ट में विचाराधीन हो तो कुछ बातें देश के आम आदमी के जहन में अतीत के साए से निकल कर आने लगती हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के यह शब्द भी याद आते हैं कि,
" कश्मीरियत जम्हूरियत और इंसानियत से ही कश्मीर समस्या का हल निकलेगा " ।
किन्तु बेहद निराशाजनक तथ्य यह है कि यह तीनों ही चीजें आज कश्मीर में कहीं दिखाई नहीं देती।
कश्मीरियत, आज आतंकित और लहूलुहान है।
इंसानियत की कब्र आतंकवाद बहुत पहले ही खोद चुका है
और जम्हूरियत पर अलगवादियों का कब्जा है।
और मूल प्रश्न यह है कि जम्मू कश्मीर राज्य को आज तक विशेष दर्जा प्रदान करने वाली  धारा 370 और 35A लागू होने के बावजूद कश्मीर
आज तक  'समस्या' क्यों है? कहीं समस्या का मूल ये ही तो नहीं हैं?
जब भी देश में इन धाराओं पर कोई भी बात होती है तो फारूख़ अब्दुल्लाह हों या महबूबा मुफ्ती कश्मीर के हर स्थानीय नेता का रुख़ आक्रामक और भाषण भड़काऊ क्यों हो जाते हैं?

आज सोशल मीडिया के इस दौर में धारा 370 और  37A 'क्या है' यह तो अब तक सभी जान चुके हैं लेकिन यह 'क्यों हैं ' इसका उत्तर अभी भी अपेक्षित है।
धारा  370 जो कि भारतीय संविधान के 21 वें भाग में समाविष्ट है और जिसके शीर्षक शब्द हैं  "जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध है अस्थायी प्रावधान" ,
वो 370 जो खुद एक अस्थायी प्रावधान है,उसकी  आड़ में 14 मई 1954 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अनुशंसा पर तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा 35A को 'संविधान के परिशिष्ट दो ' में स्थापित किया गया था।
2002 में अनुच्छेद 21 में संशोधन करके 21A को उसके बाद जोड़ा गया था तो अनुच्छेद 35A को अनुच्छेद 35 के बाद क्यों नहीं जोड़ा गया उसे परिशिष्ट में स्थान क्यों दिया गया?
जबकि संविधान में अनुच्छेद 35 के बाद 35a भी है लेकिन उसका जम्मू कश्मीर से कोई लेना देना नहीं है।
इसके अलावा जानकारों के अनुसार जिस प्रक्रिया द्वारा 35 A को संविधान में समाविष्ट किया गया वह प्रक्रिया ही अलोकतांत्रिक है एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 का भी उल्लंघन है जिसमें निर्धारित प्रक्रिया के बिना संविधान में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
एक तथ्य यह भी कि जब भारत में विधि के शासन का प्रथम सिद्धांत है कि  'विधि के समक्ष' प्रत्येक व्यक्ति समान है और प्रत्येक व्यक्ति को  'विधि का समान ' संरक्षण प्राप्त होगा तो क्या देश के एक राज्य के  "कुछ" नागरिकों को विशेषाधिकार देना क्या शेष नागरिकों के साथ अन्याय नहीं है?
यहाँ  "कुछ" नागरिकों का ही उल्लेख किया गया है क्योंकि 35 A राज्य सरकार को यह अधिकार देती है कि वह अपने राज्य के  'स्थायी नागरिकों ' की परिभाषा तय करे।  इसके अनुसार  जो व्यक्ति 14 मई 1954 को राज्य की प्रजा था या 10 वर्षों से राज्य में रह रहा है वो ही राज्य का स्थायी नागरिक है।
इसका दंश झेल रहे हैं गोरखा समुदाय के लोग।
इसका दंश झेल रहे हैं वो परिवार जो 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से भारत में आए थे।
जहाँ देश के बाकी हिस्सों में बसने वाले ऐसे परिवार आज भारत के नागरिक हैं वहीं जम्मू कश्मीर में बसने वाले ऐसे परिवार आज 70 साल बाद भी शरणार्थी हैं।
इसका दंश झेल रहे हैं 1970 में प्रदेश सरकार द्वारा सफाई के लिए  विशेष आग्रह पर पंजाब से बुलाए जाने वाले वो सैकड़ों दलित परिवार जिनकी संख्या आज दो पीढ़ियाँ बीत जाने के बाद हजारों में हो गई है लेकिन ये आज तक न तो जम्मू कश्मीर के स्थाई नागरिक बन पाए हैं और न ही इन लोगों को सफाई कर्मचारी के आलावा कोई और काम राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है।
जहाँ एक तरफ जम्मू कश्मीर के नागरिक विशेषाधिकार का लाभ उठाते हैं इन परिवारों को उनके मौलिक अधिकार भी नसीब नहीं हैं।
जहाँ पूरे देश में दलित अधिकारों को लेकर तथाकथित मानवाधिकारों एवं दलित अधिकार कार्यकर्ता बेहद जागरूक हैं और मुस्तैदी से काम करते हैं वहाँ कश्मीर में दलितों के साथ होने वाले इस अन्याय पर सालों से मौन क्यों हैं?
ये परिवार जो सालों से राज्य को अपनी सेवाएं दे रहे हैं विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डाल सकते, इनके बच्चे व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं ले सकते।
क्या यही कश्मीरियत है?
क्या यही जम्हूरियत है?
क्या यही इंसानियत है?
वक्त आ गया है इस बात को समझ लेने का कि संविधान का ही उपयोग संविधान के खिलाफ करने की यह कुछ लोगों के स्वार्थों को साधने वाली पूर्व एवं सुनियोजित राजनीति है ।
क्योंकि अगर इस अनुच्छेद को हटाया जाता है तो इसका सीधा असर राज्य की जनसंख्या पर पड़ेगा और चुनाव में उन लोगों को वोट देने का अधिकार  मिलने से जिनका मत अभी तक कोई मायने नहीं रखता था निश्चित ही इनकी राजनैतिक दुकानें बन्द कर देगा।
आखिर ऐसा क्यों है कि जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा होते हुए भी एक कश्मीरी लड़की अगर किसी गैर कश्मीरी लेकिन भारतीय लड़के से शादी करती है तो वह अपनी जम्मू कश्मीर राज्य की नागरिकता खो देती है लेकिन अगर कोई लड़की किसी गैर कश्मीरी लेकिन पाकिस्तानी लड़के से निकाह करती है तो उस लड़के को कश्मीरी नागरिकता मिल जाती है।
समय आ गया है कि इस प्रकार के कानून किसके हक में हैं इस विषय पर खुली एवं व्यापक बहस हो।
कश्मीर के स्थानीय नेता जो इस मुद्दे पर भारत सरकार को कश्मीर में विद्रोह एवं हिंसा की बात करके आज तक विषय वस्तु का रुख़ बदलते आए हैं बेहतर होगा कि आज इस विषय पर ठोस तर्क प्रस्तुत करें कि इन दमनकारी कानूनों का बोझ देश क्यों उठाए ?
इतने सालों में इन कानूनों की मदद से आपने कश्मीरी आवाम की क्या तरक्की की?
क्यों आज कश्मीर के हालात इतने दयनीय है कि यहाँ के नौजवान को कोई भी 500 में पत्थर फेंकने के लिए खरीद पाता है?
देश आज जानना चाहता है कि इन विशेषाधिकारों का आपने उपयोग किया या दुरुपयोग?
क्योंकि अगर उपयोग किया होता तो आज कश्मीर खुशहाल होता
खेत खून से नहीं केसर से लाल होते
डल झील में लहू नहीं शिकारा बहती दिखतीं
युवा एके 47 नहीं विन्डोज़ 7 चला रहे होते
और चारु वलि खन्ना जैसी बेटियाँ आजादी के 70 साल बाद भी अपने अधिकारों के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए विवश नहीं होतीं।
डॉ नीलम महेंद्र