Friday, 27 October 2017

सरकार की प्रथम जबाबदेही जनता के प्रति है लोकसेवकों के प्रति नहीं

सरकार की प्रथम  जबाबदेही जनता के प्रति है लोकसेवकों के प्रति नहीं

वैसे तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है। अगर परिभाषा की बात की जाए तो यहाँ जनता के द्वारा जनता के लिए और जनता का ही शासन है लेकिन राजस्थान सरकार के एक ताजा अध्यादेश ने लोकतंत्र की इस परिभाषा की धज्जियां उड़ाने की एक असफल कोशिश की। हालांकी जिस प्रकार विधानसभा में बहुमत होने के बावजूद वसुन्धरा सरकार इस अध्यादेश को कानून बनाने में कामयाब नहीं हो सकी, दर्शाता है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें वाकई में बहुत गहरी हैं जो कि एक शुभ संकेत है।
लोकतंत्र की इस जीत के लिए न सिर्फ विपक्ष की भूमिका प्रशंसनीय है जिसने सदन में अपेक्षा के अनुरूप काम किया बल्कि हर वो शख्स हर वो संस्था भी बधाई की पात्र है जिसने इसके विरोध में आवाज उठाई और लोकतंत्र के जागरूक प्रहरी का काम किया।
राजस्थान सरकार के इस अध्यादेश के द्रारा यह सुनिश्चित किया गया था कि बिना सरकार की अनुमति के किसी भी लोकसेवक के विरुद्ध मुकदमा दायर नहीं किया जा सकेगा साथ ही मीडिया में भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करने वाले सरकारी कर्मचारियों के नामों का खुलासा करना भी एक दण्डनीय अपराध माना जाएगा।
जहाँ अब तक गजेटेड अफसर को ही लोक सेवक माना गया था अब सरकार की ओर से लोक सेवा के दायरे में पंच सरपंच से लेकर विधायक तक को शामिल कर लिया गया है।
इस तरह के आदेश से जहाँ एक तरफ सरकार की ओर से लोक सेवकों (चाहे वो ईमानदार हों या भ्रष्ट ) को अभयदान देकर उनके मनोबल को ऊँचा करने का प्रयास किया गया वहीं दूसरी तरफ देश के आम आदमी के मूलभूत अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का भी प्रयत्न किया गया।
भाजपा की एक सरकार द्वारा इस प्रकार के फैसले न सिर्फ विपक्ष को एक ठोस मुद्दा उपलब्ध करा दिया है बल्कि देश की जनता के सामने भी  वो स्वयं ही कठघड़े में खड़ी हो गई है। आखिर लोकतंत्र में लोकहित को ताक पर रखकर लोकसेवकों के हितों की रक्षा करने वाले ऐसे कानून का क्या औचित्य है।
इस तुगलगी फरमान के बाद राहुल गाँधी ने ट्वीट किया कि हम 2017 में जी रहे हैं 1817 में नहीं।
आखिर एक आदमी जब सरकारी दफ्तरों और पुलिस थानों से परेशान हो जाता है तो उसे न्यायालय से ही इंसाफ की एकमात्र आस रहती है लेकिन इस तरह के तानाशाही कानून से तो उसकी यह उम्मीद भी धूमिल हो जाती।
इससे भी अधिक खेदजनक विषय यह रहा कि जिस पार्टी  की एक राज्य सरकार ने इस प्रकार के अध्यादेश को लागू करने की कोशिश की उस पार्टी की केन्द्रीय सरकार द्वारा इस प्रकार के विधेयक का विरोध करने के बजाय उसका बचाव किया। केंद्र सरकार की ओर से केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और उनके राज्य मंत्री पी पी चौधरी का कहना था कि इस विधेयक का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों का बचाव, नीतिगत निष्क्रियता से बचना और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर रोक लगाना है। इन शिकायतों की वजह से अधिकारी कर्तव्यों के निर्वहन में परेशानी महसूस कर रहे थे। राजस्थान सरकार द्वारा एक अध्ययन की ओर से बताया गया कि लोकसेवकों के विरुद्ध दायर मामलों में से 73% से अधिक झूठे प्रकरणों के होते हैं।
जब देश के प्रधानमंत्री अपने हर भाषण में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेन्स की बात करते हों, प्रेस की आजादी के सम्मान की बातें करते हों, देश में पारदर्शिता के पक्षधर हों, जवाबदेही के हिमायती हों, और अपनी सरकार को आम आदमी की सरकार कहते हों, तो उन्हीं की सरकार द्वारा ऐसे बेतुके अध्यादेश का समर्थन करना देश के जहन में अपने आप में काफी सवाल खड़े करता है।
सत्ता तो शुरू से ही ताकतवर के हाथों का खिलौना रही है शायद इसीलिए आम आदमी को कभी भी सत्ता से नहीं बल्कि  न्यायपालिका से न्याय की आस अवश्य रही है। लेकिन जब न्यायपालिका के ही हाथ बाँध दिए जाएं तो?
अगर सरकार की नीयत साफ है और वो ईमानदार अफसरों को बचाना चाहती है तो क्यों नहीं वो ऐसा कानून लाती कि सरकार का कोई भी सेवक अगर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं करता है तो उसके खिलाफ बिना डरे शिकायत करें त्वरित कार्यवाही होगी क्योंकि सरकार देश के नागरिकों के प्रति जवाबदेह हैं लोकसेवकों के प्रति नहीं। लोकसेवक अपने नाम के अनुरूप जनता के सेवक बनके काम करने के लिए ही हैं।
 लेकिन अगर शिकायत झूठी पाई गई तो शिकायत कर्ता के खिलाफ इस प्रकार कठोर से कठोर कानूनी प्रक्रिया के तहत ऐक्शन लिया जाएगा कि भविष्य में कोई भी  किसी लोकसेवक के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज  करने की हिम्मत नहीं कर पायेगा ।
इस प्रकार न सिर्फ झूठी शिकायतों पर अंकुश लगेगा और असली दोषी को सजा मिलेगी बल्कि पूरा इंसाफ भी होगा।
इस देश में न्याय की जीत तभी होगी जब हमारी न्याय प्रणाली का मूल  यह होगा  कि क़ानून की ही आड़ में  देश का   कोई भी गुनहगार गुनाह करके छूटने न पाए और कोई भी पीड़ित न्याय से वंचित न रहे।
डाँ नीलम महेंद्र


Monday, 23 October 2017

साहब यह पागलपन नहीं जूनून है !

आलोचना करना आसान है, उदाहरण प्रस्तुत करना मुश्किल।


सोशल मीडिया के इस दौर में आज एक वाक्य काफी चर्चा में है कि “विकास पागल हो गया है।
विकास की बात बाद में, पहले पागलपन की बात करते हैं।
इस बात से तो हम सभी सहमत होंगे कि दिन में आठ घंटे काम करके कोई महान नहीं बनता और सफल होने के लिए पागलपन की हद तक का जुनून होना चाहिए।
वर्षों पहले आइन्सटीन ने इस पागलपन के जुनून से ही सापेक्षता के सिद्धांत की खोज की थी।
अभी कुछ साल पहले बिहार के माउन्टेन मैन दशरथ माँझी भी इसी पागलपन का शिकार हुए थे जब उन्होंने केवल एक छेनी और हथौड़े से अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट कर एक सड़क बना डाली।

शायद वो भी पागलपन का एक जुनून ही था जब 2016 में सूखे की भयंकर मार झेल रहे महाराष्ट्र के लातूर में ट्रेन से पानी भेजा गया था।
और गुजरात के समुद्री तट पर रोल आँफ रोल आँन फेरी सेवा भी शायद पागलपन का ताजा उदाहरण ही है जिसमें 360 किमी की दूरी को 31 किमी के दायरे में समेट कर 8 घंटे के सफर को एक घंटे का कर दिया गया है जो कि  अब अन्य राज्यों के लिए रोल माँडल बनने जा रही है।
ऐसे पागलपन की फेहरिस्त काफी लम्बी है लेकिन
अब हम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं विकास की।
तो जनाब इसे क्या कहियेगा कि इक्कीसवीं सदी के भारत में 60 सालों से भी अधिक समय तक राज करने वाली पार्टी विकास के नाम पर आज भी बिजली सड़क और पानी जैसे मुद्दों पर ही अटकी है ? वो यह कैसे भूल सकती है कि इस मुद्दे पर आज अगर वो भाजपा की तीन साल पुरानी सरकार पर एक अंगुली उठा रही है तो उसी की तीन अंगुलियाँ खुद उसकी तरफ इशारा करके उसके 60 सालों के शासन का हिसाब भी मांग रही हैं।
जब मोदी 2014 में शौचालय निर्माण और स्वच्छता की बात करते हैं तो आप इसका मजाक उड़ाते हैं लेकिन यह नहीं बता पाते कि 1947 से लेकर 2014 तक हमारा देश इन मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित क्यों रहा?
जब मोदी विकास के नाम पर डिजिटल इंडिया की बात करते हैं तो आप पिछड़ेपन के नाम पर बेसिक इन्फ्रास्टक्चर की कमियाँ  गिनाने लगते हैं लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि इस इन्फ्रास्टक्चर को आप क्यों खड़ा नहीं कर पाए जबकि कम्प्यूटर इंटरनेट और मोबाइल जैसी सुविधाएँ तो आपके शासन काल में भी थीं?
आज  मोदी न्यू इंडिया की बात करते हैं लेकिन आप 'इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा की सोच से आगे बढ़ ही नहीं पाए।
पागलपन की बात करें तो आप उस विकास को पागल कह रहे हैं जिसने 2001 में भूकंप से होने वाली भारी तबाही के बावजूद गुजरात को  'इंडिया का ग्रोथ इंजन ' बना दिया।
इस सब के बावजूद जब कुछ लोग गुजरात मॉडल पर अंगुली उठाते हैं तो एक सवाल उनसे कि क्या उनके पास इससे बेहतर कोई हिमाचल प्रदेश मॉडल, कर्नाटक मॉडल है या फिर निकट भविष्य में क्या वे कोई पंजाब मॉडल दे पाएंगे?
अब गुजरात मॉडल पर सवाल उठाने वालों के लिए कुछ 'तथ्य'
पूरे देश में जहाँ बिजली सड़क और पानी आज भी चुनावी मुद्दे हैं, वहाँ गुजरात के गांव गांव में चौबीस घंटे बिजली पानी की आपूर्ति के साथ साथ सड़कें भी मौजूद हैं।
2002
तक जो गुजरात बिजली की कमी से लड़ रहा था आज बिजली के क्षेत्र में सरप्लस में है।
2012
में  नैशनल ग्रिड के फेल हो जाने पर जब देश के 19 राज्य दो दिन तक अंधेरे में डूबे थे तब गुजरात न केवल अपनी खुद की रोशनी से जगमगा रहा था, बल्कि गाँवों में शत प्रतिशत बिजली की आपूर्ति करने वाला देश का पहला राज्य बनने की ओर बढ़ रहा था।
कृषि के क्षेत्र में गुजरात के विकास दर की अगर बात करें तो 2001-2011.के  बीच यह 11.2% थी जबकि पूरे देश की कृषि विकास दर 2002 - 2007 के बीच 2.13% थी और 2007 -2012 के दर्मियान 3.44% थी। वह भी तब जब गुजरात का 70% इलाका सूखाग्रस्त है, राज्य की एकमात्र साबरमति नदी भी 1999 में सूख गई थी और वर्षा के मामले में गुजरात कोई चेरापुंजी नहीं है यह हम सभी जानते हैं। मप्र से नर्मदा का पानी गुजरात में लाकर उसे खुशहाल करना पागलपन नहीं है तो क्या है?
चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में अहमदाबाद का सिटी अस्पताल एशिया का सबसे बड़ा अस्पताल है।
टूरिज्म के क्षेत्र में गुजरात के पास कोई ताजमहल, बर्फ से ढके पहाड़, खूबसूरत झीलें या झरने नहीं हैं अगर कुछ है तो गिर के शेर या फिर कच्छ का रन उसके बावजूद गुजरात का पर्यटन में 4% की विकास दर को लाना जो कि पूरे देश के पर्यटन के विकास दर का दुगना है, इस पागलपन के बारे में अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
गुजरात में स्थित जामनगर रिफाइनरी विश्व की सबसे बड़ी रिफाइनरी है।
महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से यह मुम्बई से भी बेहतर है और 2002 के बाद गुजरात से एक भी दंगे की खबर नहीं आई है।
व्यापार के क्षेत्र में गुजरात में कोई मुम्बई (भारत की आर्थिक राजधानी), चेन्नई(देश की हेल्थ कैपिट) , बैंगलोर (देश का आईटी हब) या फिर कोलकाता जैसा शहर नहीं है जो अपने कंधे पर पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था को तार दे उसके बावजूद आज गुजरात से  देश ही नहीं विश्व के मानचित्र पर सूरत और अहमदाबाद जैसे शहर देना शायद पागलपन की पराकाष्ठा है।
गुजरात के विकास में मोदी ने प्राकृतिक संसाधनों की कमी को आड़े आने नहीं दिया बल्कि वाइब्रेन्ट गुजरात के कन्सेप्ट से औद्योगीकरण को बढ़ावा देकर न सिर्फ रोजगार के अवसर पैदा किए बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी गति प्रदान की।
और पागलपन की सबसे बड़ी बात तो यह है कि जब पूरा देश  भ्रष्टाचार से लाचार था और यूटीआई, सटैम्प पेपर, ताज कारिडोर, सत्यम, खाद्यान्न, आदर्श, 2 जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ जैसे घोटालों के बोझ तले विकास का दम घुट रहा था, तब गुजरात  तरक्की के नए सोपान चढ़ता जा रहा था।
यह पागलपन नहीं तो और क्या है कि अब तक के अपने शासन काल में चाहे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में हो  या फिर देश के प्रधानमंत्री के रूप में, उनपर या फिर उनकी सरकार पर आज तक भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने नहीं आया है।
उनके शासन काल में पहले गुजरात और अब पूरा देश अगर किसी चीज़ में पीछे है तो वो है भ्रष्टाचार और घोटाले जिसकी वजह से कुछ 'खास लोगों का विकास' रुक गया है शायद इसीलिए वे कह रहे हैं कि विकास पागल हो गया है।
अफसोस इस बात का है कि वे इस देश के दिल की आवाज को नहीं सुन पा रहे हैं जो चीख चीख कर कह रहा है कि अगर यह पागलपन है तो अच्छा है और अगर विकास पागल हो गया है तो उसे पागल ही रहने दो, क्योंकि देश की सेहत के लिए यह पागलपन लाभदायक है ।
डाँ नीलम महेंद्र

Sunday, 15 October 2017

क्यों न दिवाली कुछ ऐसे मनायें

क्यों न दिवाली कुछ ऐसे मनायें

दिवाली यानी रोशनी, मिठाईयाँ, खरीददारी , खुशियाँ और वो सबकुछ जो एक बच्चे से लेकर बड़ों तक के चेहरे पर मुस्कान लेकर आती है।
प्यार और त्याग की मिट्टी से गूंथे अपने अपने घरौंदों को सजाना भाँति भाँति के पकवान बनाना नए कपड़े और पटाखों की खरीददारी !
दीपकों की रोशनी और पटाखों का शोर
बस यही दिखाई देता है चारों ओर।
हमारे देश और हमारी संस्कृति की यही खूबी है।
त्यौहार के रूप में मनाए जाने वाले जीवन के ये दिन न सिर्फ उन पलों को खूबसूरत बनाते हैं बल्कि  हमारे जीवन को अपनी खुशबू से महका जाते हैं।
हमारे सारे त्यौहार न केवल एक दूसरे को खुशियाँ बाँटने का जरिया हैं बल्कि वे अपने भीतर बहुत से सामाजिक संदेश देने का भी जरिया हैं।
भारत में हर धर्म के लोगों के दीवाली मानने के अपने अपने कारण हैं

जैन लोग दीवाली मनाते हैं क्योंकि इस दिन उनके गुरु श्री महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था।

सिख दीवाली अपने गुरु हर गोबिंद जी के बाकी हिंदू गुरुओं के साथ जहाँगीर की जेल से वापस आने की खुशी में मनाते हैं।
बौद्ध दीवाली मनाते हैं क्योंकि इस दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था।
और हिन्दू दीवाली मनाते हैं अपने चौदह वर्षों का बनवास काटकर प्रभु श्रीराम के अयोध्या वापस आने की खुशी में।
हम सभी हर्षोल्लास के साथ हर साल दीवाली मनाते हैं लेकिन इस बार इस त्यौहार के पीछे छिपे संदेशों  को अपने जीवन में उतारकर कुछ नई सी दीवाली मनाएँ। एक ऐसी दीवाली जो खुशियाँ ही नहीं खुशहाली लाए। आज हमारा समाज जिस मोड़ पर खड़ा है दीवाली के संदेशों को अपने जीवन में उतारना बेहद प्रासंगिक होगा।
तो इस बार दीवाली पर हम किसी रूठे हुए अपने को मनाकर या फिर किसी अपने से अपनी नाराजगी खुद ही भुलाकर खुशियाँ के साथ मनाएँ।
दीवाली हम मनाते हैं राम भगवान की रावण पर विजय की खुशी में यानी बुराई पर अच्छाई की जीत, तो इस बार हम भी अपने भीतर की किसी भी एक बुराई पर विजय पाएँ , चाहे वो क्रोध हो या आलस्य या फिर कुछ भी।
दीवाली हम मनाते हैं गणेश और लक्ष्मी पूजन करके तो हर बार की तरह इस बार भी इनके प्रतीकों की पूजा अवश्य करें लेकिन साथ ही किसी जरूरतमंद ऐसे नर की मदद करें जिसे स्वयं नारायण ने बनाया है शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि " नर में ही नारायण हैं"
और किसी शायर ने भी क्या खूब कहा है,
घर से मस्जिद है बहुत दूर तो कुछ ऐसा किया जाए
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।
तो इस बार किसी बच्चे को पटाखे या नए कपड़े दिलाकर उसकी मुस्कुराहट के साथ दीवाली की खुशियाँ मनाएँ और इस दीवाली अपने दिल की आवाज को पटाखों के शोर में दबने न दें।
दीवाली हम मनाते हैं दीपक जलाकर। अमावस की काली अंधेरी रात भी जगमगा उठती है तो क्यों न इस बार अपने घरों को ही नहीं अपने दिलों को रोशन करें और दीवाली दिलवाली मनाएँ जिसकी यादें हमारे जीवन भर को महकाएँ।
दीवाली का त्यौहार हम मनाते हैं अपने परिवार और दोस्तों के साथ। ये हमें सिखाते हैं कि अकेले में हमारे चेहरे पर आने वाली मुस्कुराहट अपनों का साथ पाकर कैसे ठहाकों में बदल जाती है।
यह हमें सिखाती है कि जीवन का हर दिन कैसे जीना चाहिए, एक दूसरे के साथ मिलजुल कर मौज मस्ती करते हुए एक दूसरे को खुशियाँ बाँटते हुए और आज हम साल भर त्यौहार का इंतजार करते हैं जीवन जीने के लिए,एक दूसरे से मिलने के लिए,खुशियाँ बाँटने के लिए।
लेकिन इस बार ऐसी दीवाली मनाएँ कि यह एक दिन हमारे पूरे साल को महका जाए और रोशनी का यह त्यौहार केवल हमारे घरों को नहीं बल्कि हमारे और हमारे अपनों जीवन को भी रोशन कर जाए।
हमारी छोटी सी पहल से अगर हमारे आसपास कोई न हो निराश,तो समझो दीवाली है।
हमारे छोटे से प्रयास  से जब दिल दिल से मिलके दिलों के दीप जलें और उसी रोशनी से,
हर घर में हो प्रकाश तो समझो दीवाली है।
डाँ नीलम महेंद्र

Friday, 13 October 2017

न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन

न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन


वीआईपी कल्चर खत्म करने के उद्देश्य से जब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मई 2017 में वाहनों पर से लालबत्ती हटाने सम्बन्धी आदेश जारी किया गया तो सभी ने उनके इस कदम का स्वागत किया था लेकिन एक प्रश्न रह रह कर देश के हर नागरिक के मन में उठ रहा था, कि क्या हमारे देश के नेताओं और सरकारी विभागों में एक लाल बत्ती ही है जो उन्हें 'अतिविशिष्ठ' होने का दर्जा या एहसास देती है?
हाल ही में रेल मंत्री श्री पीयूष गोयल ने अपने अभूतपूर्व फैसले से 36 साल पुराने प्रोटोकॉल को खत्म करके रेलवे में मौजूद वीआईपी कल्चर पर गहरा प्रहार किया। 1981 के  इस सर्कुलर को अपने नए आदेश में तत्काल प्रभाव से जब उन्होंने रद्द किया तो लोगों का अंदेशा सही साबित हुआ कि इस वीआईपी कल्चर की जड़ें बहुत गहरी हैं और इस दिशा में अभी काफी काम शेष है।
मंत्रालय के नए आदेशों के अनुसार  किसी भी अधिकारी को अब कभी गुलदस्ता और उपहार भेंट नहीं दिए जाएंगे। इसके साथ ही रेल मंत्री पीयूष गोयल ने वरिष्ठ अधिकारियों से एक्सेक्यूटिव श्रेणी के बजाय स्लीपर और एसी थ्री टायर श्रेणी के डब्बों में यात्रा करने को कहा है।रेलवे में मौजूद वीआईपी कल्चर यहीं पर खत्म हो जाता तो भी ठीक था लेकिन इस अतिविशिष्ट संस्कृति की जड़ें तो और भी गहरी थीं। सरकारी वेतन प्राप्त रेलवे की नौकरी पर लगे कर्मचारी रेलवे ट्रैक के बजाय बड़े बड़े अधिकारियों के बंगलों पर अपनी ड्यूटी दे रहे थे।
लेकिन अब रेल मंत्री के ताजा आदेश से सभी आला अधिकारियों को अपने घरों में घरेलू कर्मचारियों के रूप में लगे रेलवे के समस्त स्टाफ को मुक्त करना होगा। जानकारी के अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों के घर पर करीब 30 हजार ट्रैक मैन काम करते हैं, उन्हें अब रेलवे के काम पर वापस लौटने के लिए कहा गया है। पिछले एक माह में तकरीबन 6 से 7 हजार कर्मचारी काम पर लौट आए हैं और शीघ्र ही शेष सभी के भी ट्रैक पर अपने काम पर लौट आने की उम्मीद है।
क्या अभी भी हमें लगता है कि रेलवे में स्टाफ की कमी है ?
क्या हम अभी भी ट्रैक मेन्टेनेन्स के अभाव में होने वाले रेल हादसों की वजह जानना चाहते हैं

एक आम आदमी और उसकी सुरक्षा के प्रति कितने उत्तरदायी हैं ये अधिकारी इसका उत्तर जानना चाहते हैं?
इस प्रकार की वीआईपी संस्कृति या फिर कुसंस्कृति केवल एक ही सरकारी विभाग तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है।
देश के एक प्रसिद्ध अखबार के अनुसार मप्र के एक लैंड रिकॉर्ड कमिश्नर के बंगले पर 35 से ज्यादा सरकारी कर्मचारी उनका घरेलू काम करने में लगे थे जबकि इनका काम आरआई के साथ सीमांकन में मदद करना होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि उस राज्य में सीमांकन का काफी काम लम्बित है।
क्या इन अधिकारियों का यह आचरण 'सरकारी काम में बाधा' की श्रेणी में नहीं आता?
भारत की नौकरशाही को ब्रिटिश शासन के समय में स्थापित किया गया था जो उस वक्त विश्व की सबसे विशाल एवं सशक्त नौकरशाही थी।
स्वतंत्र भारत की नौकरशाही का उद्देश्य देश की प्रगति,जनकल्याण,सामाजिक सुरक्षा,कानून व्यवस्था का पालन एवं सरकारी नीतियों का लाभ आमजन तक पहुँचाना था। लेकिन सत्तर अस्सी के दशक तक आते आते भारतीय नौकरशाही दुनिया की  'भ्रष्टतम' में गिनी जाने लगी। अब भ्रष्टाचार,पक्षपात,,अहंकार जैसे लक्षण नौकरशाही के आवश्यक गुण बनते गए।
न जयप्रकाश आंदोलन कुछ कर पाया न ही अन्ना आंदोलन।
जो कानून, मानक विधियां और जो शक्तियां इन्हें कार्यों के सफल निष्पादन के लिए दी गई थीं, अब उनका उपयोग 'लालफीताशाही ' अर्थात फाइलों को रोकने के लिए, काम में विलम्ब करने के लिए किया जाने लगा। नेताओं के साथ इनके गठजोड़ ने इन्हें  "वीआईपी" बना दिया
और आज की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि जो लोग देश में नौकरियों की कमी का रोना रो रहे हैं वे सरकारी नौकरियों की कमी को रो रहे हैं क्योंकि प्रइवेट सेक्टर में तो कभी भी नौकरियों की कमी नहीं रही,लेकिन इन्हें वो नौकरी नहीं चाहिए जिसमें काम करने पर तनख्वाह मिले इन्हें तो वो नौकरी चाहिए जिसमें हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा। कोई आश्चर्य नहीं कि  हमारे समाज के नैतिक मूल्य इतने गिर गए हैं आज लोग अपने बच्चों को नौकरशाह बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं,देश की सेवा अथवा उसकी प्रगति में अपना योगदान देने के लिए नहीं बल्कि अच्छी खासी तनख्वाह के अलावा मिलने वाली मुफ्त सरकारी  सुविधाओं के बावजूद किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही न होने के कारण।
आखिर पहले पांचवां वेतन आयोग फिर छठा वेतन आयोग और अब सातवाँ वेतन आयोग, इन सभी में सुनिश्चित किया गया कि इनके वेतन और सुविधाएं इस प्रकार की हों कि इनके ईमानदारी से काम करने में कोई रुकावट न हो लेकिन क्या इनकी जवाबदेही भी निश्चित की गई?
पहले लाल बत्ती हटाना और अब रेल मंत्री का यह कदम स्वागत योग्य है किन्तु तब तक अधूरा है जब तक हर सरकारी पद पर बैठे  नेता या फिर अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं की जाती।
इन सभी को टारगेट के रूप में काम दिए जाएं जिनमें समय सीमा का निर्धारण कठोरता हो।
तय समय सीमा में कार्य पूरा करने वाले अधिकारी को तरक्की मिले तो समय सीमा में काम न कर पाने वाले अधिकारी को डिमोशन।
कुछ ऐसे नियम इनके लिए भी तय किए जाएं ताकि
जबतक वे उन नियमों का पालन नहीं करेंगे तबतक उन्हें कोई अधिकार भी न दिए जाएं।
जिस प्रकार देश के व्यापारी से सरकार हर साल असेसमेन्ट लेती है और अपने व्यापार में वो पारदर्शिता अपनाए इसकी अपेक्षा ही नहीं करती बल्कि कानूनों से सुनिश्चित भी करती है, नेताओं को भी हर पांच साल में जनता के दरबार में जाकर परीक्षा देनी पड़ती है, उसी प्रकार हर सरकारी कर्मचारी की सम्पत्ति का भी सालाना एसेसमेन्ट किया जाए, उनके द्वारा किए जाने वाले मासिक खर्च का उनकी मासिक आय के आधार पर आंकलन किया जाए, उनके बच्चों के देसी या विदेशी स्कूलों की फीस, उनके ब्रांडेड कपड़े और फाइव स्टार कल्चर, महंगी गाड़ियों को कौन स्पान्सर कर रहा है इसकी जांच हर साल कराई जाए। कुछ पारदर्शिता की अपेक्षा सरकारी अधिकारियों से भी की जाए तो शायद वीआईपी संस्कृति का जड़ सहित नाश हो पाए।
डाँ नीलम महेंद्र